KGMU ट्रॉमा सेंटर में मरीज बेहाल

लखनऊ। केजीएमयू के ट्रॉमा सेंटर में मरीजों की बढ़ती संख्या के बीच स्ट्रेचर की उपलब्धता एक बार फिर चिंता का विषय बन गई है। गंभीर मरीजों को कैजुअल्टी तक पहुंचाने और जांच के लिए ले जाने में स्ट्रेचर की कमी के कारण मरीजों और तीमारदारों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि, अस्पताल प्रशासन ने हाल ही में ट्रॉमा सेंटर में 40 अतिरिक्त स्ट्रेचर उपलब्ध कराए हैं, जिससे व्यवस्था में सुधार की उम्मीद है।

केजीएमयू ट्रॉमा सेंटर में करीब 400 बेड हैं और यहां लखनऊ के अलावा प्रदेश के दूसरे जिलों से भी बड़ी संख्या में गंभीर मरीज पहुंचते हैं। मरीजों की संख्या अधिक होने और बेड लंबे समय तक भरे रहने के कारण कई बार मरीजों को स्ट्रेचर पर ही उपचार देना पड़ता है। पहले भी अस्पताल में बेड और स्ट्रेचर की कमी को लेकर शिकायतें सामने आती रही हैं।

अस्पताल प्रशासन के अनुसार कैजुअल्टी में पहले करीब 100 स्ट्रेचर थे, जबकि 20 से 25 स्ट्रेचर परिसर के अलग-अलग हिस्सों में रखे जाते थे। मरीजों की जांच, एक्स-रे, सीटी स्कैन और अलग-अलग विभागों में शिफ्टिंग के दौरान स्ट्रेचर लंबे समय तक व्यस्त रहते थे। इससे नए मरीजों को स्ट्रेचर मिलने में देरी होती थी।

इसी समस्या को देखते हुए अगस्त में ट्रॉमा सेंटर में 40 नए स्ट्रेचर बढ़ाए गए। ट्रॉमा सेंटर के सीएमएस डॉ. प्रेमराज सिंह के मुताबिक अतिरिक्त स्ट्रेचर उपलब्ध होने से गंभीर मरीजों को कैजुअल्टी तक पहुंचाने और समय पर उपचार शुरू कराने में मदद मिलेगी।

दरअसल, केजीएमयू ट्रॉमा सेंटर पर मरीजों का दबाव लगातार बना रहता है। करीब 400 बेड की क्षमता के बावजूद गंभीर मरीजों की संख्या अधिक होने पर बेड खाली होने का इंतजार करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में कई मरीजों को स्ट्रेचर पर ही उपचार दिया जाता है। अस्पताल में नए 500 बेड वाले ट्रॉमा-2 सेंटर को भी शुरू करने की तैयारी चल रही है। इसके अप्रैल 2027 तक शुरू होने की उम्मीद जताई गई है। नए सेंटर से मौजूदा ट्रॉमा सेंटर पर मरीजों का दबाव कम होने की संभावना है। स्ट्रेचर की समस्या के साथ अस्पताल में उनके सही वितरण और समय पर उपलब्ध कराने को लेकर भी पहले शिकायतें सामने आती रही हैं। कई बार स्ट्रेचर मरीज के साथ दूसरे विभाग में चले जाते हैं और वापस आने में समय लगता है, जिससे कैजुअल्टी में उनकी उपलब्धता प्रभावित होती है।

अस्पताल प्रशासन की ओर से अतिरिक्त स्ट्रेचर उपलब्ध कराने के बाद अब चुनौती यह है कि इनका इस्तेमाल व्यवस्थित तरीके से हो और जरूरत के समय गंभीर मरीजों को बिना देरी के स्ट्रेचर मिल सके। ट्रॉमा सेंटर में लगातार बढ़ रहे मरीजों के दबाव को देखते हुए आने वाले समय में नए ट्रॉमा-2 सेंटर के संचालन को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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