बाबू गेन की शहादत को भूले युवा

-प्रखर पोस्ट ब्यूरो

स्वर्तकता संग्राम के दीने को निरंतर जताए रखने को तेल के रूप में अफ्ना खून देने वाले आजादी के दीवानों के लिए भारतीय इतिहास की किताबों में सैकड़ों जगह लिखा है कि शहीदों की चिताओं पर लगेंगे इर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का यही बाकी निज्ञां होगा, लेकिन यह क्या आज के साथ बीते कल वाली पीढ़ी भी नहीं जानती है कि मुंबई के मजदूर व स्वतंत्रता सेनानी बाबू गेनू कौन थे और उनका शहीदी दिवस कब है? लोग पूरी तरह कूतष्न हो चुके हैं, उन जैसे सैकड़ों को याद करने के लिए उनके पास समय नहीं है। यह जानकारी अगली पीढ़ी को ट्रांसफर करने में भी चूक हुई है, जो कि खुद को इतिहासकार लिखने व कहने वालों से बड़ी है। इससे पूर्व कि आंदोलन के किस्से मौखिक रूप से अगली पीढ़ी को पहुंच पाते कि माता-पिता को मूल स्वान पर छोड़कर बीवी-बच्चे लेकर लोग कमाने निकल चुके थे, जबकि पिछली पीढ़ी में इसी काम को घृणित चाकरी कहकर हमारे बुजुर्ग संबोषित करते रहे हैं। वे बुजुर्ग तो आजादी के दीवानों के किस्से अगली पीढ़ी को दे भी दिए, पर शहर पहुंच चुकी व भागम-भाग व दैनिक आर्थिक आपा-बापी में शहरीकरण के माहौल में पल रहे बच्चों को दे ही नहीं पाई और बच्चों ने भी इसे गैरजरूरी विषय समझा, जिससे तीसरी पीड़ी में ही ‘जहां संस्कारों का अकाल पैदा हो गया है, वहीं आजादी के मतवालों के नाम भी भूल गए। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि सहीयों को याद करने के हर स्तर से लगातार प्रयास होते रहें, नहीं तो गौरवशाली अतीत को भूलने वाली पीढ़ियों को भुलाने में समय कतई समय नहीं लगाता है। वैसे भी हाथी जैसी आबादी की वृद्धि दर के आगे हर प्रयास छोटा हाथी भी नहीं, बल्कि ऊंट के मुंह में जीरा ही साबित हो रहा है। भला हो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का, जिसने बाबू गेनू सईद को वलिदान दिवस 12 दिसंबर को न सिर्फ याद किया, बल्कि शहादत दिवस को स्वदेशी दिवस के रूप में मनाया व देश में सैकड़ों जगहों पर चित्र लगाकर बड़ी संख्या में स्वयंसेवकों ने पुष्पांजति अर्पित की और उनके व्यक्तित्व व कृतित्व को याद किया। ऐसे ही कारणों से संघ विरोधियों के बोलने पर पूर्ण पाबंदी लगा देनी चाहिए, क्योंकि सी साल की यात्रा में आपदा-विषया में मदद कर, जंगलों में स्कूल खोलकर व असहायों की सेवा कर संघ ने एक लकीर खींची है, जो कि बाकियों के लिए चुनौती है कि उससे बड़ी लकीर खींचें तो संघ स्वत्तः अंतर्ध्यान हो जाएगा। दरअसल 20वीं सदी के प्रारंभिक वर्षों में भारत अंग्रेजों की औपनिवेशिक हुकूमत से जूझ रहा था। लोग उनके आतंक के खिलाफ तरह-तरह से विरोध दर्ज करवा रहे थे। इस दौरान मुंबई में एक सामान्य मजदूर बाबू गेनू ने वीरता व देशभक्ति से देश को प्रेरित किया। विदेशी वस्त्रों के आयात के खिलाफ आवाज उठाते हुए उन्होंने प्राणों की आहुति दी थी। उनका जन्म पुणे के गांव महालुंगे पडवल में एक निर्धन किसान परिवार में एक जनवरी 1908 को हुआ था। वह महज दो साल के ही ये कि पिता की मौत हो गई थी। जीवन में निर्णायक मोड़ तब आया, जब पिता के निधन के कुछ ही महीने बाद बैल भी मर गया था। ऐसे में मां गेनू, यो बड़े माइयों और बहन को पड़ोसियों की देख-रेख में छोड़कर मुंबई आ गई और घरेलू सहायिका का काम ढूंढ़ लिया। उसके बाद सूती मिल में काम मिल गया। इस तरह मां ने परिवार को पाला था, लिहाजा वह भी अल्पायु में मुंबई आकर मिल में काम करने लगे थे। इस तरह महज 22 साल की कच्ची उम्र मैं इस युवा ने देश के लिए जान देने में पांच मिनट भी नहीं लगाए थे। स्वदेशी आंदोलन के प्रतीक बने बाबू गेनू का भले ही इतिहास में विस्तृत उल्लेख न हो, लेकिन शहादत उनको स्वदेशी आंदोलन का अमर प्रतीक बनाती है। ब्रिटिश शासन भारतीय उद्योगों को कमजोर करने के लिए विदेशी कपड़े भारत लाता था। उन्होंने न केवल ब्रिटिश उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाई, बल्कि जनता को देशी कपड़ों और उत्पादों के प्रति जागरूक करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाबू गेनू जव बड़े हो रहे थे तो वेश में अंग्रेजों की मुखालफत जोरों पर थी। वह भी आंदोलन में हिस्सा लेने लगे। साइमन कमीशन के विरोध में जुलूस निकाला। 1930 में नमक सत्याग्रह में भी हिस्सा लिया और दो बार जेल गए। उन दिनों स्वदेशी चीजें इस्तेमाल व विदेशी के विरोध का आंदोलन उफान पर था। नियमित रोजगार न मिलने के बावजूद वह निष्क्रिय नहीं बैठे और औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध स्थानीय राजनीतिक आंदोलनों में सक्रिय रूप से शामिल रहे। यद्यपि ताला लाजपत राय, भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव जैसे व्यक्तित्वों के प्रति गहरी गचा रखते थे, फिर भी गांधी का उन पर सबसे अधिक प्रभाव था। गांधी के अहिंसा और सत्याग्रह के विचारों ने युवा कांतिकारी को गहराई से प्रभावित किया। घटना के मुताविक, 12 दिसंबर 1930 को मुंबई में एक लॉरी से विदेशी कपड़े ले जा रहे थे। बाबू ने उसे रोकने का प्रयास किया, जिसमें विदेशी कपड़े ले जा रहे थे। उनके इस साहसिक प्रयास को नाकाम करने के लिए ब्रिटिश पुलिस ने सीचे प्रदर्शनकारियों पर गोली चला दी, जिससे वह शहीद हो गए थे। अंग्रेजों की यही नीति थी कि एक को ऐसी सजा तो ताकि दूसरा कोई सिर न उठा सके, लेकिन होता इसके उलट था। चूंकि बाबू गेनू की राधायत पर ज्याया लिखा नहीं गया है तो दूसरे इतिहासकार बताते हैं कि मुंबई के कलया देवी इलाके में एक गोदाम था। आंदोलनकारियों को खबर मिली कि वहां से विदेशी माल लेकर वो ट्रक मुंबई के ही कोर्ट मार्केट जाने वाले हैं। इस काम को रोकने की जिम्मेदारी बाबू गेनू और उनके दल ‘तानाजी पथक’ को सौंपी गई। हनुमान रोड पर इसे रोकने की योजना का पता चलते ही वहां हुजूम इक‌ट्ठा हो गया। अंग्रेज अफसर क्रेजर ने यह देखकर भारी संख्या में पुलिस बुला ली। कुछ जगह फ्रेजर को मैनचेस्टर का कपड़ा व्यापारी कहा गया है। क्रांतिकारी ट्रकों के रास्ते में खड़े हो गए। पुलिस 10 को खींचकर दूर करती तो 20 और खड़े हो जाते। भांगवाड़ी के पास बाबू गेनू ट्रक के सामने खड़े होकर महात्मा गांधी के नाम के नारे लगा रहे थे, जिससे लेजर चिढ़ गया और ट्रक के आगे सीना तानकर खड़े युवक पर ट्रक चढ़ाने का आदेश दिया। ट्रक चालक बलवीर सिंह प्रदर्शनकारियों के पास आया और रुक गया। बद ने कहा कि मैं भी एक भारतीय हूं तो भाई की हत्या कैसे कर दूं। यह देखकर गुस्से से लाल हुए अब्रिज ने उसे स्टीयरिंग से बक्का देकर हटा दिया और खुद बैठ गया। इसके बावजूद बाबू गेनू नहीं इटे और लेट कर विरोध करने लगे तो लेजर ने उनके सिर पर ट्रक चढ़ा दिया था। पांच सेकंड में 22 साल के युवा के खून से पूरी सड़क तर-बतर हो गई। कल तक बाबू गेनू को जहां कोई नहीं जानता था, वहीं उनका नाम हर एक की जुबान पर चढ़ गया। अंतिम संस्कार में कन्हैया लाल मुंशी, लीलावती मुंशी व जमना दास मेहता जैसे दर्जनों बड़े नामों सहित भारी जनसमूह उमड़ पड़ा। इस घटना ने देश में हाहाकार मचा दिया। परिणामस्वरूप पूरे मुंबई में हड़तालों व प्रदर्शनों की श्रृंखला शुरू हो गई। नीचता की हद पार करते हुए ब्रिटिश सूचना निदेशक ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर हत्या को दुर्घटना बताया, जिससे देशवासियों का खून खौल उठा। कस्तूरबा गांधी बाद में उनके घर पहुंचीं उनकी मां को सांत्वना देने। उनकी मौत की जगह का नाम गेनू स्ट्रीट रख दिया गया। आज इस क्षेत्र में एक पुराना स्वदेशी बाजार लगता है। ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर कोई भी सार्वजनिक चर्चा मुख्यरूप से चंद नामों के इर्द-गिर्द घूमती है। इस दौरान कथित इतिहासकारों ने उन जमीनी कार्यकर्ताओं को भुला दिया, जिन्होंने अल्पायु में स्वतंत्र भारत की सामूहिक परिकल्पना के लिए जान हथेली पर लेकर घूमा करते थे। ऐसे ही एक नायक थे बाबू गेनू सईद, जो निरक्षर थे व सूती मिल के मजदूर थे और श्रम संघवादी थे। स्वदेशी जागरण मंच के सह संगठक कश्मीरी लाल लिखते हैं कि औपचारिक रूप से शिक्षित न होने के बावजूद भू-राजनीति और भू-आर्थिकी के अंतर्संबंध के साथ-साथ भारत के भू-रणनीतिक हितों को समझ रहे थे कि ब्रिटेन से कपड़ों के आयात का दीर्घकालिक कुप्रभाव देश पर जरूर पड़ेगा। गांधी के सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक तर्कों के महत्व को समझा। वह जानते थे कि भारत की आर्थिक व राजनीतिक स्वतंत्रता परस्पर जुड़ी हुई है, गुंथी हुई है और एकीकृत भी है। ऐसे महान पुरुष के जीवन में निहित संदेश को भला आने वाली पीढ़ियां कैसे नकार सकती हैं? नेताओं के पीछे नारे लगाने वाली व सोशल मीडिया पर डांस करने वाली पीढ़ी ऐसा करने का दुस्साहस कैसे कर सकती है कि दिन की रोशनी में सैकड़ों लोगों की भीड़ के सामने देश के लिए सीने पर ट्रक चढ़वा लिया हो। अपने तरह की इस अनूठी व अलबेली शहादत को इतना कम स्थान इतिहासकारों ने क्यों दिया? बाबू गेनू के विचार और आदर्श हमारी सामूहिक स्मृति से धुंधले पड़ते जा रहे हैं। ऐसे में बार-बार दोहराई जाने वाली इस कहावत को दोहराने को मन करता है कि अगर आप इतिहास को भूल जाते हैं तो आप उसे दोहराने के लिए मजबूर हो जाते हैं। गांव में उनकी मूर्ति लगा दी गई और बाकी देश ने खास मतलब नहीं रहा। मुंबई में बाबू गेनू रोड नाम की एक सड़क है, जिस पर उनके नाम की एक पट्टिका लगी है। नवी मुंबई में उनके नाम पर एक मैदान और पुणे में एक चौक भी है। हालांकि, अगर आप इन इलाकों में घूमने वाले किसी से भी पूछेंगे तो बहुत से लोग नहीं जानते होंगे कि वह कौन थे और उन्होंने देश के लिए क्या किया था? सच्चाई से मुंह मोड़ने वाली व अपने में मस्त सोशल मीडिया छाप वर्तमान पीढ़ी का भला भारत में भविष्य क्या हो सकता है, जो गौरवशाली अतीत को भुलाकर असीमित स्वतंत्रता दिन-रात आनंद ले रही है? भारत में केवल इन महान पुरुषों के नेक विचारों, निःस्वार्थ कार्यों व सर्वोच्च बलिदानों के कारण ही शान से जी रहे हैं। एक राष्ट्र इन महान पुरुषों के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए कम से कम खास मौकों पर उन्हें याद करने की जहमत तो उठा ही सकता है। दूसरा अधिक महत्वपूर्ण कारण यह है कि बाबू गेनू के जीवन और इतिहास का संदर्भ भारत में आज प्रचलित संदर्भ से काफी भिन्न प्रतीत हो सकता है। फिर भी यह अंतर स्पष्ट है। वैश्विक शक्तियों का एक सुनियोजित एजेंडा है, जिसके तहत वे दूसरों पर अपनी इच्छा, विचार, धारणाएं और मान्यताएं थोपती हैं। यदि ईसा के बाद पहली सहस्त्राब्दी में धर्म के माध्यम से राजनीतिक वर्चस्व स्थापित किया गया था तो दूसरी सहस्त्राब्दी में सेना के माध्यम से। आशंका यह है कि तीसरी सहस्त्राब्दी में आर्थिक हस्तक्षेप के माध्यम से ऐसा किया जा सकता है। दुर्भाग्य से मानव जाति का यह संक्षिप्त इतिहास इस बात की भयावह याद दिलाता है कि दुनिया दूसरों को किस नजरिए से देखती है और उनसे किस तरह पेश आती है। एक तरफ वे हैं, जिन्हें दबाना है और दूसरी तरफ वे हैं, जो दबाए जाएंगे। निश्चित रूप से दुनिया को देखने का हमारा नजरिया या दूसरों के नजरिए से देखने का हमारा अनुमान, बराबरी के नजरिए से देखने जैसा नहीं है। आधुनिक समय में यह मान लेना कि वैश्विक आर्थिक हित भू-राजनीतिक इरादों से पूरी तरह स्वतंत्र हैं या उनमें कोई षड्यंत्रकारी मकसद नहीं है, बचकाना ही कहा जाएगा। 12 दिसंबर का महत्व केवल उनके शौर्य को याद करने तक सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय समाज में देशी उत्पादों के समर्थन और विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार की भावना को भी उजागर करता है। उनकी शहादत ने मजदूर वर्ग, छात्रों और आम नागरिकों को प्रेरित किया कि वे अपने देश के आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों के लिए खड़े हों। बाबू गेनू का योगदान यह दिखाता है कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक अधिकार तक सीमित नहीं थी, बल्कि आर्थिक स्वतंत्रता भी उतनी ही महत्वपूर्ण थी। बाबू गेनू का नाम आज भी स्वदेशी आंदोलन और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक है। उनके बलिदान ने यह संदेश दिया कि साहस और देशभक्ति से किसी भी औपनिवेशिक शक्ति का सामना किया जा सकता है। स्वदेशी दिवस पर उन्हें याद करना न केवल उनके शौर्य को सम्मानित करना है, बल्कि यह भारतीय समाज के लिए अपने उत्पादों और संसाधनों के महत्व को समझने का अवसर भी है। बाबू गेनू की कहानी हमें यह याद दिलाती है कि देशभक्ति के छोटे-छोटे कदम भी बड़े बदलाव ला सकते हैं और उनके बलिदान का स्मरण हमें अपने समाज में स्वदेशी उत्पादों के प्रयोग और समर्थन के लिए प्रेरित करता है।

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