नशामुक्ति केंद्रों पर सवाल, इलाज के नाम पर हजारों की फीस

लखनऊ। नशे की लत से छुटकारा दिलाने के नाम पर संचालित कई नशामुक्ति केंद्रों की व्यवस्थाओं को लेकर सवाल खड़े हुए हैं। कई केंद्रों के पंजीकरण की स्थिति स्पष्ट नहीं है, जबकि निर्धारित मानकों का भी पूरा पालन नहीं किया जा रहा। इसके बावजूद मरीजों से इलाज और रहने-खाने के नाम पर हर महीने हजारों रुपये लिए जा रहे हैं।

गोमतीनगर में एक नशामुक्ति केंद्र बेसमेंट में संचालित मिला। यहां मरीजों की ओपीडी भी बेसमेंट में ही चल रही है और भर्ती मरीजों को ऊपर के तल पर रखा जाता है। केंद्र में एक मरीज से करीब 25 हजार रुपये प्रतिमाह लिए जाने की बात सामने आई। इसमें रहने और खाने का खर्च शामिल बताया गया। निरीक्षण के दौरान बेसमेंट के बाहर तीन गैस सिलिंडर रखे मिले, जबकि आग से बचाव के इंतजाम भी पर्याप्त नहीं दिखे।सरोजनीनगर क्षेत्र के एक अन्य केंद्र में भी मरीजों से करीब 25 हजार रुपये मासिक शुल्क लिए जाने की जानकारी सामने आई है। वहीं, गोमतीनगर विस्तार स्थित एक केंद्र में जनरल वार्ड के लिए करीब 16 हजार रुपये शुल्क लिया जाता है। इसके अलावा डॉक्टर की विजिट और जांच का खर्च अलग से देना पड़ता है। इन खर्चों को मिलाकर मरीज का मासिक खर्च लगभग 22 हजार रुपये तक पहुंच जाता है।

एसी वार्ड का खर्च 40 हजार तक

गोमतीनगर विस्तार के केंद्र में एसी वार्ड के लिए हर महीने करीब 35 से 40 हजार रुपये तक खर्च बताया गया है। सूखा नशा करने वाले मरीजों का उपचार पांच से छह महीने तक चलने की बात कही गई है। ऐसे में इलाज, रहने और अन्य खर्च मिलाकर परिवार पर करीब दो लाख रुपये तक का आर्थिक बोझ पड़ सकता है।

पंजीकरण से लेकर स्टाफ तक जरूरी मानक

नशामुक्ति केंद्र के संचालन के लिए पंजीकरण जरूरी है। इसके अलावा केंद्र में एमबीबीएस डॉक्टर और काउंसलर की व्यवस्था होनी चाहिए। प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ और मरीजों की देखभाल के लिए कर्मचारी, साफ-सफाई, रसोई तथा सुरक्षित भवन की व्यवस्था भी मानकों में शामिल है। पुरुष और महिला मरीजों के लिए अलग-अलग ठहरने की व्यवस्था भी होनी चाहिए।

क्षेत्रीय मद्य निषेध अधिकारी रमेश कुमार के अनुसार कुछ महीने पहले अभियान चलाकर नशामुक्ति केंद्रों को चिह्नित किया गया था। जिन केंद्रों के दस्तावेज विभाग को उपलब्ध कराए जाते हैं, उनकी जांच की जाती है। अधिकारी के मुताबिक कई संचालक विभाग को जरूरी जानकारी उपलब्ध नहीं कराते हैं।

लखनऊ में सामने आया यह मामला नशामुक्ति केंद्रों की निगरानी, पंजीकरण और मरीजों से लिए जा रहे शुल्क की व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है।

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