
लखनऊ। पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता रहे कल्याण सिंह की पुण्यतिथि के मौके पर एक बार फिर लोधी समाज और उससे जुड़े राजनीतिक समीकरण चर्चा में हैं। 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा और समाजवादी पार्टी, दोनों की राजनीति में लोधी समाज को लेकर सक्रियता दिखाई दे रही है। कल्याण सिंह को उत्तर प्रदेश की राजनीति में लोधी समाज के प्रमुख नेताओं में गिना जाता है। उनके दौर में लोधी समुदाय का भाजपा के साथ मजबूत राजनीतिक जुड़ाव बना। अब उनके निधन के बाद इसी सामाजिक आधार को लेकर सपा भी अपनी रणनीति आगे बढ़ा रही है।
पुण्यतिथि के बहाने सियासी संदेश
कल्याण सिंह की पुण्यतिथि पर लखनऊ में आयोजित कार्यक्रम को भाजपा की ओर से लोधी समाज तक संदेश पहुंचाने के प्रयास के तौर पर देखा गया। कार्यक्रम में उनके परिवार और पार्टी से जुड़े नेताओं की मौजूदगी रही। दूसरी ओर, सपा भी लोधी समाज के बीच अपनी राजनीतिक पहुंच बढ़ाने के लिए लगातार कार्यक्रमों और प्रतीकों का सहारा ले रही है।
हाल के महीनों में सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने वीरांगना अवंती बाई लोधी की जयंती पर लखनऊ में उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण किया था। इसे सपा की उस रणनीति से जोड़कर देखा गया, जिसमें पार्टी अपने PDA सामाजिक समीकरण में लोधी समाज को भी अधिक जगह देने की कोशिश कर रही है।
BJP के पुराने आधार पर सपा की नजर
लोधी समाज को लंबे समय से भाजपा के प्रभाव वाले प्रमुख ओबीसी समूहों में माना जाता रहा है। कल्याण सिंह के राजनीतिक प्रभाव ने इस जुड़ाव को और मजबूत किया था। अब 2027 के चुनाव से पहले सपा इसी सामाजिक आधार में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रही है।हालांकि, लोधी समाज के राजनीतिक रुझान को एकरूप मानना उचित नहीं होगा। अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय नेतृत्व, उम्मीदवार और चुनावी मुद्दों के आधार पर राजनीतिक पसंद में बदलाव हो सकता है।
लखनऊ से निकल रहा बड़ा सियासी संदेश
कल्याण सिंह की पुण्यतिथि पर आयोजित कार्यक्रम और सपा की ओर से लोधी समाज के बीच बढ़ती सक्रियता ने 2027 से पहले यूपी की जातीय राजनीति को फिर चर्चा में ला दिया है। एक तरफ भाजपा कल्याण सिंह की राजनीतिक विरासत को सामने रख रही है, तो दूसरी ओर सपा लोधी समाज को अपने व्यापक सामाजिक समीकरण में जोड़ने की कोशिश कर रही है। ऐसे में पुण्यतिथि के कार्यक्रम महज श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं दिखते, बल्कि दोनों दलों की आगामी चुनावी रणनीति और सामाजिक पहुंच के संदर्भ में भी चर्चा का विषय बन रहे हैं।



