
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में टोल राजस्व को चूना लगाने वाले फर्जी FASTag नेटवर्क की जांच अब तेजी से आगे बढ़ रही है। लखनऊ के इटौंजा टोल प्लाजा से जुड़े इस मामले में एसटीएफ की जांच के दौरान अब तक 142 ऐसे वाहनों की पहचान हुई है, जिन्होंने कथित तौर पर फर्जी वाहन नंबर और कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर तैयार किए गए FASTag के जरिए टोल प्लाजा से सैकड़ों बार आवाजाही की। जांच एजेंसी को आशंका है कि इस पूरे खेल में कुछ टोलकर्मियों और अधिकारियों की भूमिका भी हो सकती है। हालांकि किसी की भूमिका को लेकर अंतिम निष्कर्ष विस्तृत जांच और बरामद डिजिटल साक्ष्यों के विश्लेषण के बाद ही सामने आएगा।
करोड़ों के राजस्व नुकसान की आशंका
जांच में सामने आया है कि फर्जी FASTag और दूसरे वाहनों के नंबरों के इस्तेमाल के जरिए टोल भुगतान व्यवस्था में हेरफेर किया गया। इससे सरकारी टोल राजस्व को करोड़ों रुपये का नुकसान होने की आशंका जताई जा रही है।
एसटीएफ अब यह पता लगाने में जुटी है कि 142 वाहनों ने कितनी बार इटौंजा टोल प्लाजा पार किया और इस दौरान वास्तविक टोल राजस्व में कितनी कमी हुई। इसके लिए पुराने रिकॉर्ड, FASTag से जुड़े विवरण और टोल प्लाजा के इलेक्ट्रॉनिक डेटा को खंगाला जा रहा है।
तीन अप्रैल को दर्ज हुई थी एफआईआर
इस मामले की शुरुआत 3 अप्रैल 2026 को हुई, जब आरटीओ की ओर से लखनऊ के सरोजनीनगर थाने में एफआईआर दर्ज कराई गई थी। बाद में मामले की गंभीरता को देखते हुए इसकी विवेचना एसटीएफ को सौंप दी गई।
जांच आगे बढ़ने के बाद एसटीएफ ने मामले से जुड़े लोगों की गिरफ्तारी शुरू की। कुछ समय पहले ट्रक मालिक रियाज, उसके भाई सिराज और इंडसइंड बैंक के दो एजेंटों को गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद करीब तीन दिन पहले चालक मुनीश को भी एसटीएफ ने गिरफ्तार किया। जांच एजेंसी अब इन आरोपियों से पूछताछ के आधार पर फर्जी FASTag तैयार करने, वाहनों के नंबरों में हेरफेर करने और टोल से गुजरने की पूरी प्रक्रिया की कड़ियां जोड़ रही है।
छह महीने तक नहीं मिला जरूरी डेटा
जांच में एक अहम पहलू टोल प्लाजा के डेटा से जुड़ा है। एसटीएफ ने लखनऊ-सीतापुर एक्सप्रेसवे प्राइवेट लिमिटेड से टोल प्लाजा के सीसीटीवी फुटेज, वाहनों की आवाजाही का रिकॉर्ड और अन्य जरूरी डेटा उपलब्ध कराने को कहा था।
रिपोर्ट के अनुसार, करीब छह महीने तक अपेक्षित डेटा उपलब्ध नहीं कराया गया। इसके बाद एसटीएफ ने अदालत से अनुमति लेकर मंगलवार को इटौंजा टोल प्लाजा पर कार्रवाई की। टीम ने वहां से डीवीआर, सर्वर और अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेज अपने कब्जे में ले लिए। अब इन उपकरणों से पुराने रिकॉर्ड और डिलीट अथवा उपलब्ध डिजिटल डेटा को रिकवर करने की कोशिश की जा रही है।
टोलकर्मियों और अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में
एसटीएफ की कार्रवाई के बाद टोल एजेंसी से जुड़े कर्मचारियों और अधिकारियों की भूमिका भी जांच के घेरे में आ गई है। जांच एजेंसी यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि फर्जी FASTag से वाहन लगातार टोल प्लाजा से गुजरते रहे तो सिस्टम में इसकी जानकारी क्यों नहीं पकड़ी गई। साथ ही यह भी जांच की जा रही है कि सीसीटीवी फुटेज और वाहनों से जुड़े डेटा को उपलब्ध कराने में देरी क्यों हुई। फिलहाल इन बिंदुओं पर एसटीएफ ने अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है। बरामद सर्वर, डीवीआर और दस्तावेजों की जांच के बाद तस्वीर और स्पष्ट होने की उम्मीद है।
एक जनवरी से तीन अप्रैल तक का डेटा खंगाला जा रहा
एसटीएफ को विशेष रूप से 1 जनवरी 2026 से 3 अप्रैल 2026 तक का टोल प्लाजा डेटा चाहिए। इस अवधि के रिकॉर्ड से यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि फर्जी FASTag वाले वाहनों ने कितनी बार टोल पार किया और उनके कारण सरकारी राजस्व को कितना नुकसान हुआ।जांचकर्ताओं के सामने एक चुनौती यह भी है कि फर्जी वाहन नंबरों का इस्तेमाल किए जाने के कारण वास्तविक वाहन मालिकों और चालकों तक पहुंचना आसान नहीं है। इसी वजह से एसटीएफ टोल प्लाजा के सीसीटीवी फुटेज, सर्वर डेटा और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को आपस में मिलाकर जांच आगे बढ़ा रही है।
एनएचएआई अधिकारी भी एसटीएफ के पास पहुंचे
अदालत की अनुमति के बाद टोल प्लाजा पर हुई कार्रवाई के दौरान एनएचएआई का एक अधिकारी भी एसटीएफ के पास पहुंचा और मामले में एनएचएआई की ओर से अपना पक्ष रखा। अब जांच एजेंसी जब्त किए गए सर्वर, डीवीआर और दस्तावेजों की पड़ताल कर रही है। इनसे फर्जी FASTag के नेटवर्क में शामिल लोगों और टोल प्लाजा से जुड़ी संभावित मिलीभगत के बारे में और जानकारी मिलने की उम्मीद है।
जांच बढ़ने के साथ खुल सकते हैं कई और नाम
फिलहाल इस मामले में कई गिरफ्तारियां हो चुकी हैं और 142 वाहनों की पहचान जांच का सबसे अहम हिस्सा बन गई है। एसटीएफ यह पता लगाने में जुटी है कि इन वाहनों को फर्जी FASTag कैसे उपलब्ध कराए गए, फर्जी दस्तावेज किस स्तर पर तैयार हुए और टोल प्लाजा के सिस्टम में इन्हें किस तरह इस्तेमाल किया गया।
जांच के दौरान यदि सर्वर और पुराने रिकॉर्ड से नए तथ्य सामने आते हैं तो मामले में और लोगों की भूमिका भी सामने आ सकती है। फिलहाल एसटीएफ डिजिटल डेटा और दस्तावेजों की जांच के आधार पर आगे की कार्रवाई कर रही है।



