
कानपुर। नगर निगम में टेंडर और फर्म पंजीकरण से जुड़े विवाद की जांच अब और गहराती जा रही है। एसआईटी की टीम ठेकेदारों और संबंधित फर्मों की पृष्ठभूमि, उनके दस्तावेज, टेंडर प्रक्रिया और भुगतान से जुड़े रिकॉर्ड की बारीकी से जांच कर रही है। जांच का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना है कि कहीं फर्जी या संदिग्ध दस्तावेजों के आधार पर फर्मों को नगर निगम के विकास कार्य तो नहीं दिए गए और पूरी टेंडर प्रक्रिया में किसी तरह की अनियमितता या मिलीभगत तो नहीं हुई।
एसआईटी पहले ही नगर निगम मुख्यालय पहुंचकर मुख्य अभियंता कार्यालय समेत इंजीनियरिंग विभाग से जुड़ी कई फाइलों की पड़ताल कर चुकी है। टीम ने फर्म पंजीकरण, टेंडर और भुगतान से संबंधित दस्तावेजों को देखा और संबंधित अधिकारियों से पूछताछ भी की। जांच के दौरान कुछ फाइलों में कमियां सामने आने की बात कही जा रही है। अब इन कमियों की प्रकृति और उनके पीछे की वजह का पता लगाने के लिए दस्तावेजों को आपस में मिलाया जा रहा है- जांच के दायरे में उन फर्मों के रिकॉर्ड भी शामिल हैं, जिन पर टेंडर प्रक्रिया में अनियमितता के आरोप लगे हैं। एसआईटी यह जांच रही है कि फर्मों के पंजीकरण के समय जमा किए गए दस्तावेज वास्तविक और वैध थे या नहीं। इसके साथ ही यह भी देखा जा रहा है कि संबंधित कंपनियां नगर निगम के टेंडर में भाग लेने के लिए निर्धारित तकनीकी और वित्तीय मानकों को पूरा करती थीं या नहीं।
जांच एजेंसी इस पहलू पर भी ध्यान दे रही है कि कहीं एक ही समूह या उससे जुड़े लोगों की अलग-अलग फर्मों का इस्तेमाल टेंडर प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए तो नहीं किया गया। इसी क्रम में ब्लैकलिस्ट की गई फर्मों से जुड़े पुराने रिकॉर्ड, उनके पूर्व कार्यों और नगर निगम में उनके कामकाज का विवरण भी खंगाला जा रहा है। एसआईटी यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि जिन फर्मों पर पहले किसी तरह की कार्रवाई हुई थी, उन्हें बाद में नगर निगम के कामों में शामिल होने का अवसर कैसे मिला। मामले की जांच के दौरान गिरफ्तार किए गए ठेकेदारों से पूछताछ में कथित कमीशन व्यवस्था से जुड़ी जानकारी सामने आने की बात भी कही गई है। पुलिस के अनुसार, पूछताछ में कथित तौर पर विकास कार्यों के कुल बजट को लेकर 40-20-40 के बंटवारे की बात सामने आई। आरोप है कि कुल बजट का करीब 40 प्रतिशत हिस्सा अधिकारियों और कर्मचारियों को कथित कमीशन के रूप में दिया जाता था, लगभग 20 प्रतिशत ठेकेदारों के पास रहता था और केवल करीब 40 प्रतिशत राशि वास्तविक विकास कार्य पर खर्च की जाती थी।
पुलिस के हाथ कथित कमीशन बंटवारे से जुड़ी एक सूची लगने की बात भी सामने आई है। बताया जा रहा है कि इस सूची में अलग-अलग लोगों के नाम और कथित हिस्सेदारी का विवरण दर्ज है। हालांकि, सूची में दर्ज नामों और रकम से संबंधित दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। जांच एजेंसी दस्तावेजों और अन्य साक्ष्यों के आधार पर यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि कथित कमीशन व्यवस्था वास्तव में लागू थी या नहीं।
टेंडर हासिल करने के तरीके को लेकर भी जांच में कई सवाल सामने आए हैं। रिपोर्टों के अनुसार, कथित सिंडिकेट में शामिल फर्मों के बीच काम बांटने और वास्तविक प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करने के आरोपों की जांच की जा रही है। एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि छोटे कार्यों के लिए बड़ी संख्या में फर्मों और बड़े कार्यों के लिए अलग-अलग फर्मों का नेटवर्क तैयार किया गया था। आरोप है कि किस फर्म को कौन सा टेंडर मिलेगा, यह पहले से तय कर लिया जाता था और इसके बाद पूरी प्रक्रिया को औपचारिक रूप दिया जाता था।
मामले में नगर निगम के 298 निर्माण और नाला सफाई कार्यों से जुड़े टेंडर रद्द किए जाने की जानकारी सामने आई है। इन कार्यों की अनुमानित कीमत 100 करोड़ रुपये से अधिक बताई गई है। इसके अलावा सात फर्मों को ब्लैकलिस्ट किए जाने की बात भी सामने आई है। एसआईटी अब इन फर्मों के दस्तावेज, टेंडर में उनकी भागीदारी, तकनीकी योग्यता, पुराने कार्यों और भुगतान से जुड़े रिकॉर्ड को आपस में जोड़कर जांच रही है।
जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा नगर निगम के अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका से भी जुड़ा है। एसआईटी ने मुख्य अभियंता और अधिशासी अभियंताओं से फर्मों के पंजीकरण, टेंडर प्रक्रिया और कार्य आवंटन से जुड़े दस्तावेजों को लेकर सवाल किए हैं। टीम ने कई फाइलों और डिजिटल रिकॉर्ड को भी जांच के दायरे में लिया है। अधिकारियों से यह जानने की कोशिश की जा रही है कि यदि किसी फर्म के दस्तावेजों में कमी थी या उसके पिछले रिकॉर्ड में कोई आपत्ति थी, तो शुरुआती स्तर पर उसकी जांच क्यों नहीं की गई।
एसआईटी यह भी देख रही है कि टेंडर जारी होने से लेकर काम आवंटित करने और भुगतान जारी करने तक किन-किन अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका रही। दस्तावेजों में दर्ज अनुमोदन, तकनीकी रिपोर्ट, कार्यादेश और भुगतान रिकॉर्ड को मिलाकर यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि पूरी प्रक्रिया निर्धारित नियमों के अनुसार हुई थी या नहीं।
मामले में आगरा के ठेकेदार रवि लवानिया की फर्म इनवायरमेंटल टेक्नो भी जांच के दायरे में बताई जा रही है। फर्म के खिलाफ कानपुर नगर निगम में निर्धारित मानकों के विपरीत काम दिए जाने की शिकायत सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार, फर्म को आगरा, अलीगढ़ और मध्य प्रदेश में पूर्व में किए गए कार्यों को लेकर कार्रवाई और ब्लैकलिस्ट किए जाने से संबंधित आरोप भी सामने आए हैं। अब पुलिस और एसआईटी यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि कानपुर में इस फर्म को टेंडर किस प्रक्रिया के तहत मिला और इसके लिए किन अधिकारियों, कर्मचारियों या अन्य लोगों की भूमिका रही। जांच एजेंसी फर्म की पात्रता, पुराने रिकॉर्ड और कानपुर नगर निगम में उसे मिले कार्यों की जानकारी को भी आपस में मिला रही है। यदि किसी फर्म पर पहले से कार्रवाई या ब्लैकलिस्टिंग से जुड़ा रिकॉर्ड मौजूद था, तो उसके बावजूद उसे नगर निगम की टेंडर प्रक्रिया में शामिल किए जाने के कारणों की भी जांच की जा रही है।
एसआईटी की जांच अभी जारी है और आने वाले दिनों में मामले में और नाम सामने आने की संभावना जताई जा रही है। टीम ठेकेदारों और फर्मों के पुराने रिकॉर्ड, टेंडर दस्तावेज, तकनीकी योग्यता, कार्यादेश, भुगतान की प्रक्रिया और संबंधित अधिकारियों की भूमिका को जोड़कर पूरे मामले की कड़ियां तलाश रही है। जांच में यदि फर्जी दस्तावेज, दस्तावेजों में हेरफेर, नियमों की अनदेखी, टेंडर प्रक्रिया में मिलीभगत या भ्रष्टाचार से जुड़े आरोप साक्ष्यों के आधार पर प्रमाणित होते हैं, तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ आगे कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। फिलहाल सामने आए कमीशन मॉडल, फर्मों की भूमिका और कथित सिंडिकेट से जुड़े आरोपों की अंतिम पुष्टि जांच पूरी होने और संबंधित दस्तावेजों एवं साक्ष्यों के परीक्षण के बाद ही होगी।



