
– आदर्श चौहान
अजीब सी अकुलाहट के दौर से गुजर रहा है देश, बल्कि राजनीति कहना चाहिए। राजनीति भी नहीं, विपक्ष कहना चाहिए, जिसके पास तख्तापलट के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है इसीलिए बीच-बीच में जेन-जी को भड़काने के भी प्रयास करने लगते हैं। अब तो सड़क पर दिखाए जाने वाले मोहम्मद से प्यार को भी इसी से जोड़ा जा रहा है। दृष्यता शून्य होगी तो योगी-मोदी जिम्मेदार। ऐसे में सड़क हादसे होंगे व एक-दूसरे से 80 वाहन टकरा जाएंगे और ट्रेन-हवाई जहाज लेट होंगे तो योगी-मोदी जिम्मेदार। भारत-दक्षिण अफ्रीका मैच इकाना स्टेडियम में कैंसिल हो जाएगा तो राज्य सरकार जिम्मेदार। ज्यादा गर्मी होगी, ज्यादा जाड़ा होगा, ज्यादा बारिश होगी और गंगा-गोमती में खुले नाले गिरेंगे तो योगी-मोदी इस्तीफा दो। कुदरत ने तो हवा, पानी व संसाधन अमीर-गरीब सभी के लिए समान रूप् से दिए थे, जिस पर कोर्ट ने भी कई बार दोहराया है, पर अमीरों ने संसाधनों को खरीद लिया है और अमीर लाचार है व प्रकृति एवं सरकार के सहारे। वह एयर प्यूरीफायर नहीं खरीद सकता है। घर, कार व दफ्तर में नौ माह तक एसी चलने की सजा सभी माताओं के गर्भस्थ शिशु तक को नी माह भुगतनी पड़ रही है यानी कि संकट अगली पीढ़ी के फेफड़ों पर भी है। वेस्ट यूपी व पंजाब की पराली की तरह इथियोपिया के ज्वालामुखी ने भी न जाने किस दुश्मनी के चलते दिल्ली को निशाने पर ले लिया है। ज्वालामुखी विस्फोट के धुएं का असर यह रहा कि 11 उड़ानें रद्द करनी पड़ी थी। धुंध के शुरू होने से पहले ही रेलवे करीब 150 ट्रेन कैंसिल कर करोड़ों लोगों को परेशानी में डाल देता है।
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लगता है कि मुख्यमंत्री ने दृष्टांत विचारों पर काम करना शुरू कर दिया है, पर पूरी तरह नहीं क्योंकि अब भी बहुत कुछ किया जा सकता है। । यह भी हो सकता है कि पहले टोल प्लाजा पर ही रात में गाड़ी की तलाशी हो और ब्रेथ लाइजर के बाद ही जाने ही दिया जाए। उससे पहले धुंध की स्थिति में सलाह दें कि अतिआवश्यक न हो तो वापस जाएं और यात्रा सुबह शुरू करें। उन्होंने नए हादसों के बाद टोल प्लाजा पर लाउडस्पीकर से चेतावनी देने की व्यवस्था करने, हर तरह की मदद करने, ब्लैक स्पॉट पर अतिरिक्त सतर्कता व स्पीड लिमिट घटाने के निर्देश एनएचएआई और स्थानीय प्रशासन को दिए हैं। देश व प्रदेश का विपक्ष कुल मिलाकर इस्तीफे से कम पर कोई समझौता करने के मूड में नहीं है, जबकि उक्त में से कई समस्याएं ऐसी हैं, जिनका समाधान मिल-बैठ कर चर्चा करने मात्र से निकल आएगा। सिविक सेंस के चलते कुछ फर्ज नागरिकों का भी बनता है तो कम से कम नागरिक की हैसियत से विपक्ष को अपने भी तो फर्ज निभाने चाहिए, नहीं तो फिर थोथा ज्ञान बघारने जैसी बात होगी कि अपने बच्चों को विदेश में रखो और दूसरे के बच्चों को जनता द्वारा चुनी हुई सरकारों को उखाड़ फेंकने के लिए आंदोलन व कानून को हाथ में लेने के लिए भड़काओ। सकारात्मक विपक्ष का फर्ज बनता है कि चर्चा के दौरान खोखली नुक्ताचीनी से ऊपर उठकर समानांतर योजना पेश करे, सरकार को तर्कों से क्रियान्वयन पर मजबूर कर बदले में क्रेडिट ले व जनता से वोट। इसके विपरीत वे चाहते हैं कि सब कुछ थाली में सजाकर पेश किया जाए ताकि वे थाली पर टूट पड़ें और दोनों हाथों से पेट भरने में लग जाएं। उधर, न्यायपालिका बार-बार धमकी देकर विपक्ष का उत्साह बढ़ा रही है। इन सबसे सही बाबा रामदेव हैं, जिनका कहना है कि वायु प्रदूषण को योग से चुनौती दें। ऐसा इसलिए कहना पड़ रहा है कि समस्याएं ही गिनाते रहोगे तो भौंकने की श्रेणी में खड़े कर दिए जाओगे और कभी जनता की नजर में हीरो नहीं बनोगे, बल्कि कुछ युवाओं और उनके स्टार्ट अप व ऐप की तरह राह दिखानी है, समाधान बताने हैं। सुक्षावों के अकाल के बीच लोक लेखा समिति, सार्वजनिक उपक्रम एवं निगम संयुक्त समिति, पुलिस स्थायी समिति के सदस्य व सरोजनी नगर के विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर मांग की है कि वायु प्रदूषण की गंभीर स्थिति के मद्देनजर ऑनलाइन शिक्षा नीति लागू की जाए। लोग इसकी तुलना दिल्ली सरकार की ऑड-इवेन वाहन नीति से कर रहे हैं। संभव है कि लखनऊ को भी आगे उसी नीति पर चलना पड़े, क्योंकि महानगर में सौ से अधिक स्कूलों के 2000 के करीब छोटे-बड़े वाहन व्यवस्था में असहायक बन रहे हैं। ट्रैफिक सिस्टम भी चरमरा गया है। गौरतलब है कि दिल्ली सहित देश के दर्जनों शहरों का एयर क्वालिटी इंडेक्स एक माह से अधिक समय से चर्चा के केंद्र में है, क्योंकि यह लगातार खतरनाक स्थिति में चल रहा है और किसी-किसी दिन तो दुनिया के 10 सबसे प्रदूषित शहरों में दसों भारत के होते हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि जरूरी नहीं कि ये सभी महानगर ही हों, इनमें हरियाणा एवं उत्तर प्रदेश के छोटे-छोटे नगर भी शामिल होते हैं। यह सही है कि यदि सभी ने मिलकर प्रयास न किए और एक-दूसरे पर दोषारोपण में ही पहले की तरह समय जाया करते रहे तो हो सकता है कि किसी दिन कोरोना जैसी स्थिति बन जाए व लोगों को एक बार फिर गांवों की ओर कूच करना पड़ जाए क्योंकि करीब 30 दिन से कभी इसका तो कभी उसका 30 से अधिक नगरों-महानगरों का एयर क्वालिटी इंडेक्स 300 के ऊपर चल रहा है, जो कि खतरनाक माना जाता है। इसके कारण चीनी एयर प्यूरीफायर का आयात व बिक्री जोरों पर है। विशेषज्ञों के अनुसार वायु प्रदूषण के कारण मानसिक विकास पर भी असर हो रहा है। औसतन 10 वर्ष तक आयु घट गई और लोग जान ही नहीं पाए। दिल्ली-एनसीआर में प्रति वर्ष 17,000 से अधिक लोगों की जान इससे जा रही है। सबसे अधिक दुष्प्रभाव बच्चों पर पड़ा है, उनके फेफड़ों की वृद्धि रुक गई है व दमा और सांस के रोगियों की संख्या दिन पर दिन बढ़ती जा रही है। ऐसे में बच्चों को स्कूल जाने के लिए बाध्य करना उन्हें धीमी मृत्यु के वातावरण की ओर भेजने जैसा है। बच्चों को उन पर्यावरणीय भूलों की सजा नहीं मिलनी चाहिए, जो पिछली या वर्तमान पीढ़ियों ने की हैं। डॉ. सिंह ने सरकार से निवेदन किया है कि तत्काल एक स्वच्छ वायु शैक्षणिक निरंतरतां नीति बनाई जाए, जिसमें प्रावधान हो कि जब भी एक्यूआई 300 के ऊपर जाएं तो सभी स्कूल बंद व ऑनलाइन कक्षाएं शुरू की जाए। जिलावार एक्यूआई डैशबोर्ड लगाए जाए ताकि डीएम के आदेश के पहले ही स्कूल बंद कर ऑनलाइन कक्षाओं की तैयारी करने लगें। शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण व आईटी विभागों का समन्वय सुनिश्चित किया जाए ताकि दिसंबर-जनवरी के धुंध काल से पहले नीति व रणनीति प्रभावी तरीके से लागू हो सके। बच्चों को विषाक्त वायु से सुरक्षित करने के लिए नोएडा, गाजियाबाद, मेरठ, बागपत, हापुड़, शामली, बुलंदशहर और एनसीआर के अन्य जिलों के डीएम को निर्देश जारी किए जाएं कि वे खुद को तैयार रखें व बन पड़ रहे सभी प्रयास करें। इसके बजाय हो क्या रहा है किं मुसीबत के खोपड़ी पर खड़े होने के बाद आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू होता हैं और पढ़े-लिखे शख्सों का भी खुद कुछ सहयोग करने के बजाय सीधे सरकार कों कठघरे में खड़ा कर वोट के लिए जनता का ध्यान आकृष्ट करने पर पूरा फोकस् रहता है। अत्यंत आश्चर्यजनक है कि इतने गंभीर संकट के बावजूद, शिक्षा एवं पर्यावरण विभागों की ओर से अब तक कोई ठोस प्रस्ताव किसी भी पटल पर नहीं रखा गया है। हालांकि दिल्ली सरकार ने पहले चरण में 10,000 सरकारी स्कूलों में एयर प्यूरीफायर लगाने का फैसला किया है। चूंकि सरकार का भी रवैया टालू टेक्नोलॉजी वाला ही है इसलिए नीचा देखना पड़ता है। हर वर्ष नवंबर-दिसंबर में जब सांसों पर संकट आता है, तब फाइलें चलना शुरू करती हैं और निर्णयं मौसम खुलने पर छोड़ दिए जाते हैं। क्या अब समय नहीं आ गया है इस उदासीनता और प्रशासनिक निष्क्रियता के लिए जवाबदेही तय की जाए? यह नीति उत्तर प्रदेश की क्लाइमेट रेस्पांसिव गवर्नेस के मामले में अग्रणी राज्य की छवि बनाएगी। उल्टे हो क्या रहा है कि नागरिक कर्तव्य पूरा करने व संवेदनशीलता दिखाने के बजाय कांग्रेस के दीपेंद्र हुड्डा सहित कई सांसद गैस मास्क पहनकर संसद पहुंचे। हुड्डा व प्रियंका गांधी ने कहा कि दिल्ली की हवा को जीवन के लिए खतरनाक मानते हुए कार्य स्थगन प्रस्ताव पेश कर चर्चा चाहते थे। वे सभी मुख्यमंत्रियों को बुलाकर प्रदूषण से छुटकारा पाने के लिए परियोजना की भी बातें करते दिखे। कोई मास्क लगाकर साइकिल से विस सत्र में पहुंचा। जीवनं में कभी इन उसूलों पर यदि वे चले होते और चलने के लिए प्रेरित किया होता तों यह दिन ही क्यों आता? इनमें से अधिकांश वे हैं, जो चुनाव क्षेत्र व राजधानी में कम से कम तीन लग्जरी डीजल चालित गाड़ियों का काफिला लेकर चलते हैं।

स्वच्छ वायु परियोजना : देर से आई एक सही खबर
एक खबर आई है, जिसमें कहा गया है कि जनवरी में प्रदेश स्वच्छ वायु प्रबंधन परियोजना शुरू होगी। इसके ऐलान के बाद से ही निंदा की डिग्री और बढ़ गई है, क्योंकि आग अभी लगी है और पानी जनवरी में डाला जाएगा, तब तो मौसम वैसे ही साफ होने लगेगा। याद होगा कि बीते दशक में होता क्या था कि जब गर्मी व बिजली संकट पीक पर होता था तो मंत्री व ब्यूरोक्रेट मई तक चुप रहते थे और जून-जुलाई की पहली फुहारों के भरोसे पर कहते थे कि संकट पर जल्द ही काबू पा लिया जाएगा। यह लंबी व दीर्घकालिक परियोजनाएं हैं, जिन पर लगातार पांच साल काम करने की जरूरत होती है, न कि तत्काल पानी छिड़क कर जादू किया जा सकता है। राजधानी के प्रदूषण नियंत्रण विभाग के अधिकारियों पर बीते की साल से यह आरोप लगता रहा है। इसका खुलासा तब हो सका था, जब किसी जागरूक नागरिक ने वीडियो बनाकर वायरल कर दिया था, वरना पता नहीं कब से बिना फर्ज निभाए ही मोटी पगार उठाते रहे हों ऐसे घटिया अधिकारी। विपक्ष का कहना है कि भले ही प्रदेश में बढ़ते वायु प्रदूषण से निपटने के लिए सरकार बड़ा और दूरगामी कदम उठाने जा रही हो, पर यह देर से उठाया जा रहा कदम है। मुख्यमंत्री जनवरी 2026 में उत्तर प्रदेश स्वच्छ वायु प्रबंधन परियोजना का औपचारिक शुभारंभ करेंगे, जबकि इतने गंभीर मामले में बहुत ज्यादा औपचारिकताएं निभाने की जरूरत नहीं थी। इस महत्वाकांक्षी परियोजना का उद्देश्य प्रदेश को स्वच्छ, स्वस्थ और आर्थिक रूप से अधिक सशक्त बनाना है। इसकी अध्यक्षता प्रदेश के मुख्य सचिव करेंगे तो प्रमुख सचिव और अपर मुख्य सचिव इसके सदस्य होंगे। हाल ही में मुख्य सचिव की अध्यक्षता में हुई शासी निकाय की बैठक-में-परियोजना के समयबद्ध क्रियान्वयन के निर्देश दिए गए। 2,760 करोड़ रुपये वाली यह परियोजना विश्व बैंक के सहयोग से शुरू की जा रही है। यह दीगर बात है कि बैंक के निदेशक मंडल ने स्वीकृति ही कुछ देर (10 दिसंबर) से दी है। इसमें 2714 करोड़ रुपये ऋण है तो 45.29 करोड़ रुपये का अनुदान। इसे वर्ष 2025 से 2031 तक छह वर्षों में चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा। परियोजना के अंतर्गत लगभग 39 लाख परिवारों को स्वच्छ खाना पकाने के समाधान उपलब्ध कराए जाएंगे। साथ ही लखनऊ, कानपुर, वाराणसी और गोरखपुर में 15-15 हजार विद्युत चालित तिपहिया वाहून तथा 500 विद्युत चालित बसों का संचालन किया जाएगा। 13,500 से अधिक भारी वाहनों को स्वच्छ विकल्प अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। औद्योगिक क्षेत्र में संसाधन-कुशल ईंट निर्माण तकनीकों और सुरंग भट्ठों को प्रोत्साहित किया जाएगा। औद्योगिक समूहों के लिए स्वच्छ वायु प्रबंधन योजनाएं तैयार की जाएंगी तथा छोटे भाप बॉयलरों के स्थान पर साझा बॉयलर सुविधाओं को अपनाने के लिए नीतिगत ढांचा और व्यवहार्यता का अध्ययन किया जाएगा। प्रदूषण में प्रभावी कमी लाने के लिए सरकार पड़ोसी राज्यों के साथ समन्वय बढ़ाकर उत्सर्जन से निपटने की रणनीति अपनाएगी ताकि कम लागत में ही बेहतर नतीजे पाए जा सकें।



