अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर सुप्रीम कोर्ट सख्त

नई दिल्ली। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत ने अहम टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता स्वस्थ और सभ्य समाज का अभिन्न अंग है, जिसके बिना सम्मानजनक जीवन जीना असंभव है। कोर्ट ने कहा कि नागरिकों के अभिव्यक्ति के अधिकार को तुच्छ और काल्पनिक आधारों पर कुचला नहीं जा सकता। शीर्ष कोर्ट ने गुजरात पुलिस की ओर से कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी के खिलाफ सोशल मीडिया पर ‘ऐ खून के प्यासे बात सुनो’ कविता पोस्ट करने के मामले में शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही को खारिज कर दिया।

जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने कहा कि एफआईआर आंख मूंदकर दर्ज नहीं की जानी चाहिए। यह पता लगाने के लिए प्रारंभिक जांच की जानी चाहिए कि क्या प्रथम दृष्टया बीएनएस के तहत धारा 196 और 197 (1) के तहत मामला बनता है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान ये भी कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी लोकतंत्र का अभिन्न अंग है, जजों को इसकी रक्षा करनी चाहिए, भले ही उन्हें व्यक्त विचार पसंद न आए।

हमारे गणतंत्र के 75 वर्षों के बाद भी हम अपने मूल सिद्धांतों के मामले में इतने कमजोर नहीं दिख सकते कि महज एक कविता या किसी भी प्रकार की कला या मनोरंजन, जैसे स्टैंड-अप कॉमेडी के माध्यम से विभिन्न समुदायों के बीच द्वेष या घृणा पैदा करने का आरोप लगाया जा सके। ऐसे दृष्टिकोण को अपनाने से सार्वजनिक क्षेत्र में सभी वैध विचारों की अभिव्यक्ति बाधित होगी, जो स्वतंत्र समाज के लिए बहुत ही मौलिक है।

व्यक्तियों या व्यक्तियों के समूहों द्वारा विचारों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति स्वस्थ और सभ्य समाज का अभिन्न अंग है। विचारों और दृष्टिकोणों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बिना सम्मानजनक जीवन जीना असंभव है, जिसकी गारंटी संविधान के अनुच्छेद 21 में दी गई है। किसी स्वस्थ लोकतंत्र में विचारों, सोच और मतों का विरोध किसी अन्य दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए। भले ही बड़ी संख्या में लोग किसी के व्यक्त विचारों को नापसंद करते हों, लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का सम्मान और संरक्षण किया जाना चाहिए। कविता, नाटक, फिल्म, व्यंग्य और कला समेत साहित्य मानव जीवन को अधिक सार्थक बनाता है।

कविता के शब्द वैमनस्य या घृणा को बढ़ावा नहीं देते बल्कि लोगों को हिंसा का सहारा लेने से बचने और प्रेम के साथ अन्याय का सामना करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। कविता का धर्म, जाति, समुदाय या किसी विशेष समूह से कोई लेना-देना नहीं है। कविता के शब्द केवल शासक द्वारा किए गए अन्याय को चुनौती देने का प्रयास करता है।

यह कहना असंभव है कि अपीलकर्ता द्वारा इस्तेमाल किए गए शब्द सार्वजनिक शांति को भंग करते हैं या भंग करने की संभावना रखते हैं। किसी भी तरह से यह विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा नहीं देता है। हम यह समझने में विफल हैं कि इसमें दिए गए बयान राष्ट्रीय एकता के लिए कैसे हानिकारक हैं और ये बयान राष्ट्रीय एकता को कैसे प्रभावित करेंगे। स्पष्टतः यह कविता किसी की धार्मिक भावनाओं को प्रभावित करने का दावा नहीं करती है।

शीर्ष अदालत ने कहा कि मौखिक या लिखित शब्दों को लेकर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 196 के तहत अपराध के संबंध में फैसला किसी तर्कसंगत एवं मजबूत दिमाग वाले दृढ़ एवं साहसी व्यक्ति के मानकों के आधार पर करना होगा, न कि कमजोर एवं अस्थिर दिमाग वाले लोगों के मानकों के आधार पर।प्राथमिकी एक ‘बहुत ही मशीनी तरीके से किया गया काम’ और ‘कानून की प्रक्रिया का स्पष्ट दुरुपयोग’ प्रतीत होती है। पुलिस अधिकारी नागरिक होने के नाते संविधान का पालन करने के लिए बाध्य हैं। वे सभी नागरिकों को दी गई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करने और उसे बनाए रखने के लिए बाध्य हैं।

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