दाग अच्छे हैं

टी. धर्मेंद्र प्रताप सिंह

अर्से से कहा जाता रहा है कि कुदरत मेहरबान तो गधा पहलवान, लेकिन अब वक्त और हालात बदलने के बाद यह कहने में भी कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि प्रशासन मेहरबान तो दागी पहलवान। हालांकि यह समाज का वह नकारात्मक पहलू है, जिसका पहलवानी से कोई लेना-देना नहीं है। लूट, गुंडई या छीना-झपटी के लिए पहलवान होना अब कतई जरूरी नहीं है। यह सब बीते दौर की बात है पर कहावत है, कहावत का क्या? एक ओर प्रदेश सरकार जहां कानून-व्यवस्था का राज स्थापित करने के लिए कृत संकल्प होकर गैंगस्टर, माफिया, अपराधी, दागी व भू-माफिया पर लाठी, गोली और बुलडोजर चला रही है, वहीं दूसरी ओर कानून की आंख में धूल झोंककर तरक्की की सीढ़ियां चढ़ रहे हैं, वह भी महानगरों में। प्रदेश के किसी दबे-कुचले व उपेक्षित कोने में पड़े होते तो दीगर बात थी। कानून के कथित शासन के सीने पर चढ़कर जब एक गैंगस्टर ठेकेदारी करेगा और सरकारी सेक्टर करोड़ों के ठेके भी देगा तो सवाल उठाने से कोई कितनों को रोक लेगा? ऐसा नहीं है कि प्रदेश में यह कोई पहला उदाहरण है और ऐसा भी नहीं है कि ठेकेदारी कोई बुरा काम है। ठेके तो अडानी भी दुनिया के दर्जनों देशों में लेते हैं। ऐसे बड़े दृष्टांत तो हर दशक में टियर-1 से लेकर टियर-4 तक के हर नगर में कई-कई मिल जाएंगे।

बीते दशकों का इतिहास देखेंगे तो अपराध, राजनीति, ठेकेदारी व स्कूलबाजी का बड़ा नेक्सस पाएंगे और सभी एक-दूसरे की पीठ खुलजाते हुए मिल जाएंगे। वैसे यह कहना ज्यादा ठीक है कि एक से दूसरे का रास्ता खुलता है। इन सबका घालमेल है ही इतना जबरदस्त कि चोली-दामन के साथ की संज्ञा दी जाती है। हालांकि ठेकेदारी के लिए गुंडई, दबंगई और अपराधी होना कतई जरूरी शर्त नहीं है। अगर ऐसा होता तो ठेकेदारों पर गैंगस्टर भारी न पड़ रहे होते। हम हर हफ्ते ऐसी सुर्खी देख ही लेते हैं, जब ठेकेदार से वसूली के प्रयास होते हैं। दूसरी ओर यह भी है कि बड़े गैंगस्टर को इतने ‘स्रोत’ से पैसे आते हैं कि उसे ठेकेदारी करने की जरूरत ही नहीं पड़ती, बल्कि वे ठेकेदारों से तय प्रतिशत में पैसे लेकर उन्हें संरक्षण प्रदान करते हैं। प्रदेश की बात करें तो ईस्ट से लेकर वेस्ट तक दर्जनों मामले इसी दुरभि संधि के मिल जाएंगे।

2018 में उड़ीसा का एक मामला बहुत हाईलाइट हुआ था, जब गैंगस्टर टीटो से संबंध रखने वाले दर्जन भर से अधिक ठेकेदारों पर एसटीएफ ने शिकंजा कसा था। उनकी कुंडली कुख्यात माफिया टीटो के घर पर पड़े छापे में टीम के हाथ लगी थी। 2020 में मुख्तार के गुर्गे मऊ पुलिस की चेकिंग में पकड़े गए थे। मऊ के हकीकतपुरा का निवासी महमूद आलम और गांव हुसैनपुरा का दानिश पेशे से ठेकेदार थे। वे डरा-धमका कर सरकारी ठेके हासिल करते थे। पुलिस ने बताया था कि उक्त द्वय ने रोडवेज बस अड्डा बनाने में पुराना सामान लगाया था। साथ ही ठेका पाने के लिए दस्तावेज भी फर्जी लगाए थे और दोनों पर शहर के कई थानों में कई मामले भी संगीन धाराओं में दर्ज थे। इतना ही नहीं वे गैंगस्टर एक्ट में वांछित भी थे। बाद में डीएम के आदेश पर ठेकेदारी फर्म का पंजीकरण भी रद्द कर दिया गया था। समाज में शासन की इज्जत बनाए रखने के लिए इस पद्धति को रोकना होगा और यह कतई असंभव नहीं है, क्योंकि इज्जत बनाने में वर्षों लगते हैं व जाने में क्षण मात्र। बहुत समय और खून-पसीना लगने के बाद ही एक सिस्टम खड़ा हो पाता है। हर नट-बोल्ट अहम होता है और एक भी नट ढीला होने से सारा ढांचा भरभरा कर बैठ सकता है।

यूं तो अपवाद हर समय हर जगह हर काल में मौजूद रहे हैं। याद होगा कि मुख्यमंत्री ने पहली बार शपथ लेने के चंद हफ्तों के अंदर ही कहा था कि अपराधियों को ठेकेदारी सिस्टम में कोई जगह नहीं मिलेगी। अगर किसी अधिकारी ने अपराधी को ठेकेदारी कराने में मदद की तो बख्शा नहीं जाएगा। कायदा तो यह कहता है कि सीएम के मुख से निकली हर बात का अपना वजन होता है और उसे कानून ही समझकर पेश आना चाहिए। इस कायदे में जो रहे हैं, वे ही फायदे में रहे हैं, पर उन ढीठ की कौन बात करे, जो बेवकूफी की हदें पार करना चाहते हैं। हालांकि उनकी अनदेखी का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि दोबारा सीएम बनने पर चंद माह के ही भीतर उन्हें फिर कहना पड़ा था कि अधिकारी अच्छी तरह से जांच करने के बाद स्वच्छ और साफ छवि की फर्म और लोगों को ही ठेके दें। उन्होंने साफ कहा था कि प्रदेश में क्रिमिनल रिकार्ड वाले और खराब इमेज वाले ठेकेदार टेंडर ही न भरने पाएं इसलिए सारे प्रपत्रों की बारीकी से जांच करें।

ऐसे नहीं करने पर अधिकारी पर मिलीभगत के आरोप में कार्रवाई की जाएगी। उनके बार-बार कहने के बावजूद लखनऊ विश्वविद्यालय इन बातों से इत्तेफाक नहीं रखता, क्योंकि वह स्वायत्त है। उसके अपने नियम हैं। अपनी ही चलाता है इसलिए प्रदेश शासन के नियमों के प्रति उदंड व अराजक भी हो सकता है। यही कारण है कि गैंगस्टर के केस में जेल में बंद व्यक्ति की फर्म मैनपॉवर सप्लाई का काम कर रही थी। देश के कई प्रदेशों में तो कई बार जब जेल से सरकार चलाने का कारनामा किया जा चुका हो तो फिर ऐसे में जेल से ठेकेदारी का मामला बहुत अहम नहीं रह जाता है। तीन वर्षों से इस गैंगस्टर की फर्म को करोड़ों का ठेका दिया जा चुका है, जिस पर न केवल 23 करोड़ रुपए की जीएसटी की देनदारी बाकी है, बल्कि कई मुकदमे भी हैं। बाबा साहब भीमराव आंबेडकर यूनिवर्सिटी की ओर से कराए गए मुकदमे में फर्म साईंनाथ एसोसिएट्स के मालिक उपेंद्र सिंह करीब एक साल जेल काट चुका है। कई थानों में मुकदमे पंजीकृत हैं व गैंगस्टर का केस भी लगा है।

गाजीपुर निवासी फर्म मालिक की लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रशासनिक अधिकारियों से इतनी अच्छी साठ-गांठ है कि फिलहाल 18 करोड़ प्रतिवर्ष का काम उसके पारा है और उसे आगे भी जारी रखने के लिए ढेर सारे जतन किए जा रहे हैं। लविवि ने उक्त फर्म को करीब 750 लोगों के मैनपॉवर की सप्लाई का काम दे रखा है, लेकिन कई सफाई कर्मचारियों का ईपीएफ नहीं जमा हो रहा था, जिसके बाद बवाल हुआ था। फर्म पर करीब 23 करोड़ रुपए की जीएसटी की देनदारी है। यही नहीं पिछले दिनों जीएसटी इंटेलिजेंस लखनऊ जोनल यूनिट कार्यालय के डायरेक्टर जनरल (डीजीजीआई) ने लविवि की फाइनेंस कंट्रोलर हिमानी चौधरी को पत्र लिखकर दागी फर्म से जुड़े करोड़ों रुपए के भुगतान के सारे सत्यापित पेपर मांगे थे, लेकिन वह अभी तक उपलब्ध नहीं करा पाई हैं। यह दीगर बाद है कि इसे लेकर लविवि के गलियारों में हड़कंप जरूर है।

मजेदार बात यह है कि फर्म के लेटर हेड पर विश्वविद्यालय प्रशासन को हाल ही में एक पत्र मिला, जिसमें प्रोपराइटर के हवाले से लिखा था कि वह फर्म को प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में मर्ज कर रहा है। इस पर अभी लविवि विधिक राय ले ही रहा था कि उसने पुराने ठेके का बिल नई कंपनी के नाम से थमाकर फर्जीवाड़ा शुरू कर दिया। जानकार बताते हैं कि ऐसा टैक्स बकाए को न देने के इरादे से किया गया है। उधर, जीएसटी विभाग का स्पष्ट नियम है कि जब तक पुरानी फर्म पर एक रुपए की भी देनदारी रहेगी, तब तक बंद नहीं की जा सकती है। इसके बावजूद फर्जीवाड़ा करते हुए दागी विश्वविद्यालय प्रशासन की शह पर मिलते-जुलते नाम से कंपनी बनाकर करोड़ों रुपए का गोल-माल करने में लगा हुआ है। मजेदार बात यह है कि अधिकारियों से दोस्ती के चलते नई कंपनी को 30 लाख रुपए का स्क्रैप का काम भी मिल गया है। इससे साफ है कि उसकी नई नवेली अनुभवहीन कंपनी पर लविवि की कृपा बरसनी शुरू हो गई है और आगे भी जारी रहेगी।

सूत्रों ने बताया कि इसी वजह से रजिस्ट्रार विनोद कुमार सिंह को जाना पड़ गया था, नहीं तो शासन के प्राइवेट कंपनी को लेकर तीखे तेवर के बावजूद अब तक इस कंपनी को और ठेके मिल चुके होते। प्रपत्रों से यह भी पता चला है कि मैनपॉवर का काम कर रही अपराधी की कंपनी का 16 दिसंबर को खत्म हो गया था, लेकिन सेवाएं ली जा रही थीं। 20 दिन बाद इस पर कुछ लोगों ने आपत्ति भी उठाई थी। मुख्यमंत्री के स्वच्छ छवि के नारे पर प्रपत्र सिर्फ इतनी ही चुगली करते हैं कि साईं नाथ एसोसिएट्स पर बाबा भीमराव आंबेडकर यूनिवर्सिटी ने तो कंपनी संचालक पर गैंगस्टर जैसी कई संगीन धाराओं में आशियाना थाने में मुकदमा दर्ज कराया था, जिसमें ही लंबे समय के लिए उपेंद्र को जेल जाना पड़ा था। दूसरी ओर आईआईटी बीएचयू और तिरुपति ने भी बैन कर रखा है। ऐसी फर्म लविवि में करीब 650 से अधिक मैनपॉवर सप्लाई कर रही है। इसमें 200 सुरक्षा कर्मी, 100 स्वीपर और 100 क्लर्क के अलावा अन्य कर्मचारी विभिन्न डिपार्टमेंट में कार्यरत हैं।

ईपीएफ और ईएसआईसी यानी हेल्थ इंश्योरेंस काटने में गोल-माल करने के कारण कई महीने पहले शिकायतें आनी शुरू हो गई थीं। कंपनी का कांट्रैक्ट खत्म होने के बारे में कानून कहता है कि कई महीने पहले ही टेंडर निकाला जाना चाहिए था, लेकिन लखनऊ विश्वविद्यालय के अधिकारी उपेंद्र को उपकृत करने के लिए हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं क्योंकि टेंडर निकालने से कंपटीशन होगा, जो कि हिस्सेदारी को कम कर सकता है। यह तो बहुत छोटा मामला है। बालू और मौरंग जैसी कुछ चीजों की ठेकेदारी में तो उनकी भागीदारी 90 फीसदी तक हो सकती है। शराब, सड़क, नाली-खड़ंजा और नहर की ठेकेदारी में यह प्रतिशत 90 फीसदी तक नीचे जा सकता है।

उत्तर प्रदेश सरकार की संजीदगी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि संगठित अपराधों के प्रति अपनी शून्य सहनशीलता नीति को आगे बढ़ाते हुए बीते माह सुप्रीम कोर्ट के समक्ष गैंगस्टर्स और असामाजिक क्रिया-कलाप रोकथाम अधिनियम 1986 के सख्त क्रियान्वयन के लिए एक नया दिशा-निर्देश पेश किया और कहा कि किसी भी गिरोह के सदस्य को सरकारी नौकरी, ठेका या पट्टा नहीं दिया जाएगा। न्यायमूर्ति सूर्यकांत व न्यायमूर्ति एनके सिंह की पीठ में अतिरिक्त महाधिवक्ता केएम नटराज ने कहा कि दो दिसंबर 2024 को अधिसूचित दिशा-निर्देश में कहा गया है कि यह सुनिश्चित किया जाएगा कि किसी भी स्थिति में गिरोह के सदस्य को किसी भी सरकारी योजना का लाभ न मिलने पाए। मामला संगठित गिरोहों द्वारा कमाई गई दौलत को कब्जे में लेने का था, जिसकी सुनवाई चल रही थी। ह

गैंगस्टर-ठेकेदारों का रहा है चोली दामन का साथ

पुलिस रिकार्ड में प्रदेश में 65 माफिया डॉन हैं, जिनके गिरोह से दर्जन भर से लेकर दर्जनों गुर्गे या बदमाश जुड़े हुए हैं। इनमें से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कमोबेश सभी बालू-मौरंग, शराब, रेलवे, स्क्रैप, मंडी परिषद, पीडब्ल्यूडी, कोयला व अन्य विभागों में ठेकेदारी से जुड़े रहे हैं। साइड में और भी काम चलते रहते हैं, जैसे-लूट, वर्चस्व के लिए हत्या, डकैती, जुआ-सट्टा, अपहरण, हफ्ता वसूली, प्लॉट, मकान व जमीन कब्जाने, तस्करी, मछली, तराई में पतवार, पशुवध व सुपारी किलिंग आदि। राज्य के जिलों में छोटे क्राइम करने वाले अपराधी, गैंगस्टर और बाहुबली नेता बने माफियाओं के खिलाफ सरकार लगातार कार्रवाई कर रही है। सैकड़ों करोड़ की संपत्ति कुर्क की जा चुकी है और लगातार अभियान जारी है।

डीजीपी प्रशांत कुमार जब स्पेशल डीजी लॉ एंड ऑर्डर थे, तब उक्त संगठित गिरोहों की लिस्ट जारी करते समय इनकी संख्या 65 बताई थी। अब कुछ नए नाम बढ़े हैं तो कुछ घटे भी। चोली-दामन की बात इतनी बार इतिहास में कभी नहीं की गई, जितनी बार लोकतंत्र के अपराधीकरण के बाद कही गई। दरअसल पैसा बढ़ने के बाद पद चाहिए या प्रॉपर्टी। चूंकि पद कम हैं तो बहुतेरे लोग बहुतेरे कामों में कूद जाते हैं। ठेकेदारी गली, नाली-खड़ंजे की हो या फिर कोयले की या एक्सप्रेस-वे की, शासन-प्रशासन के बिना हो नहीं सकती। इसी घालमेल को चोली-दामन की संज्ञा दी जाती है।

मुख्तार अंसारी से लेकर बिहार बंगाल तक कम से कम दर्जनों कुख्यात माफिया रहे हैं और आज भी हैं, जो कोयले की दलाली और ठेकेदारी करके कहां से कहां पहुंच गए। मुख्तार अंसारी की बात करें या उसके जैसे पूरब पश्चिम के और दर्जन भर नामों की तो पाएंगे कि ठेके देने में शासन-प्रशासन की मेहरबानी न होती तो वे इतने बड़े डॉन बन ही नहीं पाते। इनमें से अधिकांश ने ठेकेदारी को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल किया है। गाजीपुर के यूसुफपुर मोहम्मदाबाद के प्रतिष्ठित परिवार में पैदा हुआ मुख्तार अंसारी 1988 के पहले छोटे-मोटे काम कर लेता था, वहीं पर प्रशासन ने साथ देने के बजाय दबाया होता तो माफिया नहीं बन पाता। चूंकि पिता मोहम्मदाबाद के चेयरमैन थे तो उन्हीं की विरासत ले सकता था। भरे बाजार पिता के अपमान का बदला लेने व मंडी परिषद की ठेकेदारी में वर्चस्व के लिए ठेकेदार सच्चिदानंद राय की हत्या कराई, जिसके बाद ठेकों की लूट शुरू हो गई थी।

इसी दौरान त्रिभुवन सिंह के कांस्टेबल भाई राजेंद्र सिंह की हत्या बनारस में कर दी गई। इसमें भी मुख्तार का नाम सामने आया। त्रिभुवन माफिया डॉन बृजेश सिंह का साथी था। प्रॉपर्टी विवाद के चलते बृजेश के पिता की हत्या मुख्तार के गुरु रहे साधु सिंह ने की, जिसमें मकनू सिंह साथ था, लिहाजा यहीं से त्रिभुवन-बृजेश की मुख्तार से ठन गई थी। 1990 में गाजीपुर जिले के सरकारी ठेकों पर बृजेश ने कब्जा शुरू कर दिया, जिससे दुश्मनी बढ़ती गई। 1991 में बनारस में अवधेश राय की हत्या में मुख्तार का नाम आया। 1991 में चंदौली में मुख्तार पुलिस गिरफ्त में आया पर रास्ते में दो पुलिस वालों को गोली मारकर भाग निकला। इसके बाद सरकारी ठेकों, शराब के ठेकों व कोयले के काले कारोबार की लूट शुरू कर दी।

1996 में एएसपी उदय शंकर पर जानलेवा हमले में उसका नाम आया। 1996 में पहली बार एमएलए बना और 2022 तक लगातार रहा। तीन बार तो जेल से चुनाव जीता। 2022 में मुख्तार का बेटा अब्बास अंसारी विधायक बना। 1997 में पूर्वांचल के सबसे बड़े कोयला व्यापारी रूंगटा के अपहरण के बाद उसका नाम क्राइम की दुनिया में छा गया। 2002 में बृजेश ने मुख्तार के काफिले पर हमला किया, जिसमें मुख्तार के तीन लोग मारे गए। बृजेश के भी घायल होने की खबर थी। अक्टूबर 2005 में मऊ में हिंसा भड़की तो गंभीर आरोप लगे। इसी दौरान गाजीपुर पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया, तभी से जेल में बंद था व 28 मार्च 2024 को बांदा जेल में हार्ट अटैक से मौत हो गई।

कृष्णानंद राय से मुख्तार के भाई अफजल अंसारी चुनाव हार गए तो मुन्ना बजरंगी व अतिकुर्रहमान उर्फ बाबू की मदद से गोडउर के पास 400 राउंड गोली चलवाकर पांच साथियों सहित कृष्णानंद राय की हत्या करवा दी। इसमें कुल सात लोग मारे गए थे। गवाह शशिकांत राय 2006 में रहस्यमयी परिस्थितियों में मृत पाए गए थे। 2010 में राम सिंह मौर्य की हत्या का आरोप लगा। वह ठेकेदार मन्नत सिंह की हत्या के मामले में गवाह था। टीम बनती गई और काम के साथ आमदनी बढ़ती गई। बसपा ने मुख्तार व उसके भाई को 2010 में निष्कासित कर दिया था। 2017 में योगी की सरकार बनने के बाद मुख्तार पर धीरे-धीरे शिकंजा कसता चला गया। उसकी सैकड़ों करोड़ की नामी-बेनामी संपत्तियों पर बुलडोजर चला या जब्त की गईं। मजे की बात है कि गैंगस्टर एक्ट के तहत सजा हुई और कृष्णानंद राय हत्याकांड में बरी हो गया। जेल से 2009 का लोकसभा चुनाव बसपा के टिकट पर भाजपा के मुरली मनोहर जोशी के खिलाफ वाराणसी से लड़ा व बहुत कम अंतर से हार गया था।

सवाल है कि उत्तर प्रदेश, बिहार व बंगाल में ही क्यों बनते हैं गैंगस्टर और माफिया ? इसके पीछे बड़ी वजह है करीब 10 लाख करोड़ के सरकारी ठेके और कोयला आदि का बड़ा कारोबार। प्रदेश में गैंगस्टर द्वारा ठेकेदारी और गैंगवार नई बात नहीं है। बड़ा सवाल है कि आखिर इतने लोग गैंगस्टर बनते क्यों हैं? गुंडागर्दी को ग्लैमराइज करने वाली कहानियां कहीं गरीबी का हवाला देती हैं तो कहीं परिवार पर अत्याचार और अन्याय का। मान लिया कि इन वजहों से बदला लेने के लिए किसी ने एक खून कर दिया पर उसके बाद सिलसिला साबित करता है कि यह सब पैसे के लिए किया जाता है। दबंगई, जमीन व मकान पर कब्जे, सेटलमेंट और रंगदारी से मिलने वाले पैसे से कहीं बड़ा एक सरकारी सिस्टम है, जो खासतौर पर गैंगस्टर्स को लुभाता है।

वह है बाहुबल के साथ धनबल के शिखर पर ले जाने वाले सरकारी टेंडर। यूपी में किसी बाहुबली की ताकत इसी से आंकी जाती है कि उसके जिले के कितने टेंडर उसकी मर्जी से खुलते हैं? आजादी के 78 साल में ठेके सरकारी दफ्तरों से निकलकर ऑनलाइन तो हो गए, मगर सरकारें दो कारणों से इनको अपराधियों और गैंगस्टर से मुक्त नहीं कर पाईं। एक भय तारी होने के चलते अंदर से लीकेज के साथ सपोर्ट व तू डाल-डाल तो मैं पात-पात। 2020-21 की बात करें तो देश की सरकारों ने 17 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा के कामों के लिए ई-टेंडर जारी किए थे, जिसमें यूपी की हिस्सेदारी 22 फीसदी से ज्यादा थी। 2023-24 में उक्त राशि बढ़कर जहां 20 लाख करोड़ पहुंच गई है तो यूपी की हिस्सेदारी बढ़कर 25 प्रतिशत।

90 के दशक से सरकार ने ज्यादातर ठेके ई-टेंडर के जरिये देने शुरू किए थे। इसके लिए ऑनलाइन प्रोक्योरमेंट पोर्टल भी बनाया गया था। 2020-21 में उक्त में से 91 फीसदी ओपन टेंडर थे। अब अपराधी भी इतने शातिर व हाईटेक हो गए हैं कि ऑनलाइन टेंडर भरने के लिए स्टाफ भर्ती कर रखा है। उनके दोनों हाथों में लड्डू होते हैं, क्योंकि आतंक के चलते टेंडर मिला तब भी परसेंटेज पर दूसरे को बेच देंगे और अगर नहीं मिला तो आतंक के चलते ठेकेदार गुंडा टैक्स वाला परसेंटेज चुपचाप दे जाएगा। 1970 के दशक में जब देश जेपी आंदोलन में युवाओं का एक नया रूप देख रहा था तो गोरखपुर विश्वविद्यालय के छात्रनेता एक नई कहानी लिख रहे थे, जो आगे चलकर ब्राह्मण और ठाकुर खेमों में विभक्त हो गई। एक खेमे के अगुआ होते थे हरिशंकर तिवारी तो दूसरे के रवींद्र सिंह। केंद्र में बैठे नेता छात्रनेताओं को शह देकर प्रॉपर्टी विवाद व अन्य झगड़े सुलझवाते थे। दोनों खेमे दरबार लगाने लगे।

नेताओं के प्रश्रय की वजह से स्थानीय पुलिस और प्रशासन भी मौन रहता था। उस दौर में केंद्र में रेल मंत्री अक्सर यूपी से होते थे, जो इन नेताओं को इनाम के तौर पर रेलवे स्क्रैप के ठेके दिला देते थे। ये स्क्रैप के ठेके ही धीरे-धीरे बाहुबलियों के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गए, जिसके बाद कई मर्डर हुए। ये वो दौर था, जब गोरखपुर और आस-पास के इलाके में 1970 से 80 के दशक में गैंगवार रोज की बात हो गई थी। ये कहानी तो रेडियो पर भी सुनाई गई थी।

छात्रनेता रवींद्र सिंह 1978 में विधायक बन गए तो तिवारी 1985 में। कुछ दिन बाद गोरखपुर स्टेशन पर उनकी हत्या हो गई। तिवारी छह बार विधायक बने। रवींद्र के खास वीरेंद्र प्रताप शाही को ठाकुर खेमे ने नेता मान लिया। वह भी विधायक बने, पर तिवारी गुट के अमरमणि त्रिपाठी से हार के बाद तौबा कर ली, मगर दबंगई नहीं छोड़ी थी। उनको लखनऊ के इंदिरा नगर में सरेराह गोलियों से छलनी किया था 90 के दशक में तैयार हुई नई पौध के अगुवा श्रीप्रकाश शुक्ला ने। बताते हैं कि बहन को छेड़ने वाले को कत्ल करके वह जरायम की दुनिया में उतरा था। जल्द सबसे बड़ा डॉन बनने के लिए उसने ऐलान किया था कि वह तिवारी-शाही दोनों को मार देगा पर तिवारी को नहीं मार पाया, क्योंकि तिवारी उसके मामा को ढाल की तरह साथ रखते थे। शुक्ला के हश्र की कथा सभी को पता है। तिवारी खेमा हावी होने लगा था पर अपने ही चेले रहे राजेश त्रिपाठी से चुनाव हार गए।

इसके बावजूद बड़े बेटे कुशल बसपा से सांसद रहे तो छोटे विनय बसपा से ही विधायक। भांजे गणेश शंकर बसपा सरकार के समय विधान परिषद में सभापति रहे। आज तीनों ही सपा के साथ हैं। गोरखपुर के गुटों से ही निकले मुख्तार अंसारी, मुन्ना बजरंगी, बृजेश सिंह, बृजेश पाठक, अभय सिंह और धनंजय सिंह जैसे बाहुबली नेता। तिवारी के शूटर साधू सिंह व मगनू सिंह का साथी था मुख्तार। इसके बाद इसी में जाकर जुड़ गया गाजीपुर व मऊ का पन्ना तो फिर रमाकांत, उमाकांत आदि की चेन बनती चली गई। इनमें से आज भी अधिकांश की दबंगई व टकराव सरकारी ठेकों को लेकर चलता रहता है। प्रयागराज पहुंचने पर इसमें अतीक अहमद आदि का नाम जुड़ता है। उनका भी रसूख जैसे ही बढ़ा तो ठेकों में अपनी चलानी शुरू कर दी थी।

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