एससी ने 40 साल पुराने केस में पलटा एचसी का फैसला

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने 40 साल पुराने बलात्कार के एक मामले में एक व्यक्ति को बरी करने के फैसले को पलट दिया है। कोर्ट ने कहा कि मुकदमे के दौरान जब एक छोटी बच्ची से घटना के बारे में पूछा गया और उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे, तो उसकी चुप्पी को आरोपी की बेगुनाही का संकेत नहीं माना जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के जज की असंवेदनशीलता की कड़ी आलोचना की, जिन्होंने 1987 में नाबालिग से बलात्कार के दोषी को बरी कर दिया था। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को सात साल की सजा सुनाई थी,लेकिन हाईकोर्ट ने 26 साल बाद मात्र छह पन्नों के फैसले में उसे बरी कर दिया।

ट्रायल कोर्ट के अनुसार, बाल पीड़िता ने क्रॉस-एग्जामिनेशन के दौरान कुछ नहीं कहा लेकिन जब बार-बार पूछा गया, तो वह चुपचाप रोने लगी। हाईकोर्ट ने इसे आरोपी के पक्ष में लेते हुए उसे बरी कर दिया था। अब इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल ने सुनवाई करते हुए फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि बच्ची की चुप्पी को आरोपी के पक्ष में नहीं लिया जा सकता। यह चुप्पी एक बच्ची की है, जिसे एक समझदार वयस्क महिला की चुप्पी के बराबर नहीं माना जा सकता। उन्होंने आगे कहा कि पीड़िता ने अपने बयान से पलटी नहीं मारी, बल्कि सदमे के कारण वह चुप हो गई थी। उसे दोषी को सजा दिलाने की पूरी जिम्मेदारी नहीं दी जा सकती।

सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल और सबूतों की समीक्षा करने के बाद कहा कि आरोपी छत्र ने बच्ची के साथ जघन्य अपराध किया था। मेडिकल रिपोर्ट ने भी इस ओर इशारा किया कि पीड़िता पर गंभीर यौन हमला हुआ था। इसके आधार पर जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संजय करोल की पीठ ने राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया और ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को दी गई सजा को बहाल रखा।

1987 में जब आरोपी छत्र को दोषी ठहराया गया था, तब वह 22 साल का था। अब वह 60 वर्ष से अधिक का हो चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने उसे चार हफ्ते के भीतर संबंधित अधिकारियों के सामने आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है, ताकि वह अपनी सजा पूरी कर सके।

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