

संजय राजन
दुनिया में किसी भी प्रकार के सबसे बड़े आयोजन के बारे में दो माह तक लिख लिख कर देश के अखबारों ने भी सरकार के प्रयासों और देश व दुनिया भर के श्रद्धालुओं की संख्या व डुबकी की तरह नया कीर्तिमान बना दिया। इससे इतर दुनिया भर के दर्जनों प्रमुख अखबारों ने भी कई बार सुर्खी बनाया व विद्वानों ने बड़े-बड़े लेख लिखे। पाकिस्तान के हालात के मद्देनजर वहां व उन्मादी लोगों के बीच रहकर अखबारों का हेलीकॉप्टर से पुष्पवर्षा के दौरान भगवा वस्त्रों में साधुओं की तस्वीर लगाकर महाकुंभ को दुनिया का विशालतम आयोजन लिखना, साहस का काम है। ब्रिटेन, रूस, अमेरिका और गल्फ के अखबारों ने भी तारीफों के पुल बांधे। कुल मिलाकर सभी विदेशी अखबारों में भी वही लिखा गया, जो हमारे यहां लिखा जाता रहा।
इसके विपरीत भारत में हजारों लोग ऐसे थे, जिन्हें जल नहाने लायक नहीं बताने, आस्था को व्यापार से जोड़ने, कारोबार व राजस्व की चर्चा करने, इंतजाम ठीक न होने, भ्रष्टाचार की हद पार करने, तकनीक के अधिकतम इस्तेमाल करने, भीड़ प्रबंधन और आग लगने के दुःखद हादसे में मृतकों की संख्या को बढ़ा-चढ़ाकर बताने के अनर्गल प्रलाप में ही मजा आ रहा था। उधर, विदेशी यू-ट्यूबर और मीडिया ने मृतकों की संख्या 36 बताई। कुल मिलाकर जिस भव्यता के साथ महाकुंभ आरंभ हुआ था, उसी भव्यता के साथ संपन्न भी हुआ। मुख्यमंत्री के लिए इसलिए भी जीवन-मरण का सवाल था, क्योंकि कई गिद्ध घात लगाए बैठे थे और उन्हें फेल करने पर तुले हुए थे। पृथ्वी पर सबसे बड़े मानव समागम कहे जाने वाले 45 दिवसीय महाकंभ की शुरुआत 13 जनवरी को हुई थी।
भले ही 66 करोड़ से ज्यादा श्रद्धालुओं ने संगम में आस्था की डुबकी लगाई हो, पर पहले ही दिन से उक्त बिंदु पर व्यंग्य बाण भी चलाने और ज्ञान बांटने से सैकड़ों लोग बाज नहीं आ रहे थे। इनमें से अधिकांश वही थे, जिनकी दूसरे धर्म पर बोलने में घिग्घी बंध जाती है। चूंकि कुंभ 12 साल बाद आता है तो उसे 12 से गुणा करके 144 साल का फार्मूला पेश किया गया, जो कि कौतूहल का कारण बन गया और लोग ज्यादा रफ्तार से प्रयागराज संगम का रुख करने लगे, क्योंकि आज धरती पर जितने भी लोग (करीब आठ अरब) हैं, इनमें से कोई तब धरती पर नहीं होगा। इससे अव्यवस्था हुई हजारों लोग रोज कई-कई घंटे जाम में फंसे रहते थे। सब अलग-अलग निशाने साधने में लगे थे।
किसी ने श्रद्धालुओं की संख्या व 144 साल के फैक्ट पर हमला किया तो हादसे के बाद अधिकांश ने व्यवस्था पर। कभी भगदड़ में हुई श्रद्धालुओं की मौत के आंकड़ों पर सवाल हुआ तो कभी संगम के पानी पर सियासत हुई। परेशानी श्रद्धालुओं को हो रही थी, पर घरों में बैठकर कैमरे के सामने रो रहे थे रुदाली वाले राजनीतिक विरोधी। इसके बावजूद करोड़ों लोग महाकुंभ के दौरान भक्ति भाव में डूबे नजर आए। कुछ तो विरोध में इतना रम गए कि व्यवस्था से भाजपा विरोध और फिर कब भारत व सनातन के विरोध पर पहुंच गए, जान ही नहीं पाए। वे भूल गए कि यह श्रद्धा और आस्था ही थी कि हजारों लोग रोज दो-400 किमी ट्रेन में खड़े-खड़े यात्रा करके स्नान करने पहुंच रहे थे, लेकिन संगम में डुबकी लगाने के बाद सबके चेहरे पर एक अलग तरह का संतोष देखने को मिलता था। महाकुंभ में क्या आम, क्या खास, हर वर्ग के लोगों को बस आस्था की डुबकी की आस?
बढ़ता चला जाता था त्रिवेणी की ओर जन सैलाब। मानव क्रम था, जो दो माह तक टूटने का नाम ही नहीं ले रहा था। सैकड़ों फ्लाइट, हजारों ट्रेन व लाखों वाहनों से पहुंचकर करीब देश की आधी आबादी ने तो महाकुंभ में स्नान कर ही लिया। अमेरिका की आबादी से दोगुने लोग महाकुंभ में शामिल हुए, जो कि एक वर्ल्ड रिकार्ड है। इसके विपरीत सरकार ने 40-45 करोड़ श्रद्धालु आने का अनुमान लगाया था। हर रोज औसतन डेढ़ करोड़ से ज्यादा श्रद्धालुओं ने संगम में डुबकी लगाई। ऊर्जा मंत्री एके शर्मा ने बताया कि देश व दुनिया के 26 पीठ व शोध संस्थानों ने भीड़ प्रबंधन का अध्ययन शुरू किया है। 30 करोड़ से ज्यादा श्रद्धालु ट्रेन से पहुंचे।
73 देशों के डेलीगेट्स और 50 लाख विदेशी नागरिक भी पहुंचे। महाकुंभ क्षेत्र 4000 हजार हेक्टेयर में था यानी कि दुनिया के सबसे बड़े स्टेडियम का 160 गुना बड़ा। कुंभ को प्रदेश का 76वां जिला घोषित किया गया। रिकार्ड 25 सेक्टर थे। 13 किलोमीटर के दायरे में 42 घाट थे, जिसमें से दस पक्के थे। गंगा-यमुना को पार करने के लिए 30 पांटून (पीपा) पुल थे। सुरक्षा व्यवस्था के लिए 56 थाने और 144 चौकियां व दो साइबर थाने बनाए गए थे। कुल 50 हजार सुरक्षाकर्मी तैनात थे। महाशिवरात्रि पर अंतिम अमृत स्नान के साथ महाकुंभ 2025 का समापन हो गया। भीड़ के डर से जो नहीं पहुंच पाए थे, उनमें से हजारों लोग रोजाना अब भी महाकुंभ एरिया में पावन डुबकी लगा रहे हैं। यह भी रिकर्ड है कि हेलीकॉप्टर ने बीसियों बार उड़ान भर कर स्नानार्थियों पर गुलाब की 120 क्विंटल पंखुड़ियों की वर्षा कराई।
सीएम ने धैर्य एवं आतिथ्य सत्कार के लिए विशेष रूप से प्रयागराज वासियों का धन्यवाद किया तो सुव्यवस्थित आयोजन के कर्णधार रहे मेला व स्थानीय पुलिस प्रशासन, स्वच्छताकर्मियों, गंगा दूतों, स्वयंसेवी संगठनों, धार्मिक संस्थाओं, नाविकों तथा महाकुंभ से जुड़े केंद्र व प्रदेश सरकार के सभी विभागों सहित प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग देने वाले सभी महानुभावों व संस्थाओं की सराहना की। पूरा गणित समझने की कोशिश करते हैं। प्रयागराज में 5,500 करोड़ की 167 विकास परियोजनाओं के उद्घाटन के बाद जनसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि कुंभ न केवल सामाजिक ताकत देता है, बल्कि आर्थिक सशक्तीकरण भी प्रदान करता है। महाकुंभ से तीन लाख करोड़ के कारोबार के सीएम के दावे पर कोई कुछ भी कहे, पर कारोबार तो हुआ ही है और सरकार को भारी राजस्व भी प्राप्त हुआ है।
तीर्थराज प्रयाग, काशी और अयोध्या पहुंचे श्रद्धालुओं के आंकड़ों से उत्साहित होकर सीएम ने पंज तीर्थ के नए कांसेप्ट को दिल के बाहर निकाल कर पटल पर रखा। उन्होंने गोरखपुर व मथुरा-वृंदावन को भी इसमें जोड़ दिया है। इतना ही नहीं, कुंभ संपन्न होते ही उन्होंने इस पर काम भी शुरू कर दिया। मथुरा में भव्य होली की उनकी तैयारी है। पहली बार वहां रह रही बुजुर्ग विधवा महिलाओं की सुध ली गई है। 2000 महिलाएं होली खेलेंगी। मथुरा पहुंचे योगी ने मत्था टेक कर राधा रानी का आशीर्वाद लिया और मन्नत मांगी। विपक्षी नेताओं के रुदन को तरजीह न देते हुए, बल्कि उनके तर्कों को बेबुनियाद बताते हुए व्यापार संगठन कंफेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) ने भी सरकार के दावों की पुष्टि की है। कैट के राष्ट्रीय महासचिव प्रवीण खंडेलवाल, जो दिल्ली की चांदनी चौक सीट से भाजपा सांसद भी हैं, ने कहा कि महाकुंभ में बड़े पैमाने पर आर्थिक और व्यापारिक गतिविधियां हुई हैं।
महाकुंभ शुरू होने से पूर्व 40-45 करोड़ लोगों के आने की संभावना थी, जिससे दो लाख करोड़ के व्यापार का अनुमान था। चूंकि संख्या 66 करोड़ से अधिक पहुंच गई तो स्वाभाविक रूप से कारोबार तीन लाख करोड़ के ऊपर पहुंच गया, जिससे भारी राजस्व प्रदेश को मिलना तय है। कैट के अनुसार अतिथि सत्कार, आवास, खाद्य व पेय पदार्थ, परिवहन व लॉजिस्टिक्स, धार्मिक वस्त्र, पूजा सामग्री व हस्तशिल्प आदि वस्तुएं, कपड़ा, परिधान एवं उपभोक्ता वस्तुएं, स्वास्थ्य सेवाएं एवं वेलनेस सेक्टर, धार्मिक दान एवं अन्य धार्मिक आयोजन, मीडिया, विज्ञापन एवं मनोरंजन, बुनियादी ढांचा विकास एवं नागरिक सेवाएं, टेलीकॉम, मोबाइल, एआई तकनीक, सीसीटीवी कैमरा और अन्य तकनीकी उपकरणों के जरिये बड़ा व्यापार हुआ, जिससे बड़ी संख्या में लोगों को भी रोजगार मिला है।
सैकड़ों नाविकों ने भी करोड़ों रुपए कमाए तो दातून बेचने, माथे पर ठप्पा लगाने व मुंडन संस्कार में जुटे लोगों ने भी लाखों के वारे-न्यारे किए हैं। यह दीगर बात है कि मेहनत व परिजन की मदद से 30 करोड़ कमाने वाला नाविक विवादों में आ गया। कैट महासचिव ने बताया कि आसपास के सात जिलों के लाखों लोगों ने भी कुंभ से खूब पैसा कमाया। 150 किमी दूर के काशी व अयोध्या के अलावा लखनऊ, रायबरेली, कानपुर, फतेहपुर, जौनपुर, प्रतापगढ़ व दिल्ली सहित सैकड़ों शहरों के कारोबार में अचानक भारी वृद्धि दर्ज की गई है। छोटे शहरों और गांवों में भी महाकुंभ के कारण बड़ा कारोबार हुआ और खूब पैसा बरसा।
मुख्यमंत्री ने बताया था कि महाकुंभ की तैयारियों के लिए सरकार ने करीब 7,500 करोड़ रुपये का निवेश किया था। इससे 14 नए फ्लाईओवर, छह अंडरपास, 200, नए कॉरिडोर, रेलवे स्टेशन के विस्तार और एयरपोर्ट पर नया टर्मिनल बनाया गया। 1,500 करोड़ मेले की व्यवस्था पर खर्च किए गए। कुल खर्च विदेशी मीडिया ने भी 7000 करोड़ बताया है। उत्तर प्रदेश के मंत्री अनिल राजभर ने दावा किया है कि महाकुंभ के माध्यम से 60 लाख लोगों को रोजगार मिला है। 7500 करोड़ लगाने के बाद साढ़े तीन लाख करोड़ का फायदा हुआ है। हालांकि इस पर नुक्ताचीनी भी शुरू हो गई है कि यह कुल कारोबार है या कुल फायदा। विवाद तो आस्था को पर्यटन से जोड़ने पर भी है। इसके बावजूद दूधवाले से लेकर हेलीकॉप्टर ऑपरेटिंग कंपनी तक को भारी रेवेन्यू मिला है।
औद्योगिक विकास मंत्री नंद गोपाल गुप्ता नंदी कहते हैं कि दो-तीन लाख करोड़ से अधिक का राजस्व मिलेगा। 2013 के महाकुंभ में करीब 12,000 करोड़ का राजस्व प्राप्त हुआ था। भारतीय उद्योग परिसंघ के अध्ययन के अनुसार, कुंभ मेला 2019 से आधा लाख करोड़ का राजस्व प्राप्त हुआ था। कैट के यूपी चैप्टर का अनुमान है कि भक्तों की जरूरत वाले बुनियादी सामान से ही लगभग 17,310 करोड़ का राजस्व मिला होगा। किराने से 4000, खाद्य तेल से 1000, सब्जियों से 2000, बिस्तर, गद्दे, चादरें और अन्य घरेलू सामान से 500, दूध और अन्य डेयरी उत्पाद से 4000, आतिथ्य से 2500, यात्रा से 300 करोड़, नाविकों से 50 करोड़, पूजा सामग्री की बिक्री से लगभग 2000 करोड़ व फूलों के व्यापार से 800 करोड़ का राजस्व उत्पन्न होगा।
भारतीय उद्योग परिसंघ के उत्तर प्रदेश चैप्टर के अध्यक्ष आलोक शुक्ला महाकुंभ को स्थानीय व्यवसायों के लिए स्वर्णिम अवसर बता चुके थे पहले ही। उनकी इस बात में दम है कि एक वर्ष के कारोबार का बराबर राजस्व दो महीनों में प्राप्त होना तय है। मुख्य आकर्षण रही हेलीकॉप्टर सेवा ने औसतन प्रतिदिन लगभग तीन करोड़ रुपये की कमाई की। ज्ञात हो कि 2022 से 25 के राज्य बजट में महाकुंभ के लिए 5621 करोड़ रुपए रखे गए थे। केंद्र ने 2,100 करोड़ का विशेष अनुदान दिया था, जिसके बाद कुल 7721 करोड़ रुपए खर्च किए जाने थे। 2019 में कुल 4,200 करोड़ रुपये खर्चे गए थे, जबकि 2013 में 1,300 करोड़ ।
मेला अधिकारी विजय किरन आनंद ने कहा कि करों, किराये और अन्य शुल्कों के माध्यम से 25,000 करोड़ से अधिक की कमाई का अनुमान है। मेला स्थल पर कुल लेन-देन तीन लाख करोड़ के करीब होगा। इसके अलावा महाकुंभ 2025 में छोटे मोटे विक्रेताओं, बाइक, टेंपो, ई-रिक्शा चालकों, मंदिर स्थलों पर फूल बेचने वालों, यादगार चीजें बेचने वालों, नाव चलाने वालों और होटल ढाबा चलाने वालों की कमाई स्थानीय अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण योगदान देगी। महाकुंभ मेले के आस-पास के पूरे कई जिलों के पूरे तंत्र में भारी आर्थिक उछाल आने की उम्मीद है। हालांकि अभी सारे आंकड़े एकत्र किए जा रहे हैं।
जीएसटी संग्रह में यूपी की बड़ी छलांग
महाकुंभ के कारण आने वाले पर्यटकों की संख्या में वृद्धि के कारण उत्तर प्रदेश में जनवरी और फरवरी में जीएसटी संग्रह में पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 1,000 करोड़ रुपये से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई। इस अवधि के दौरान प्रदेश में जीएसटी संग्रह में दोहरे अंकों की वृद्धि देखी गई, जो फरवरी में राष्ट्रीय औसत नौ प्रतिशत से अधिक थी। प्रदेश में जनवरी और फरवरी में जीएसटी वृद्धि दर क्रमशः 11 और 14 प्रतिशत रही, जिस दौरान महाकुंभ चल रहा था। इससे राज्य महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, हरियाणा और कर्नाटक जैसे शीर्ष प्रदर्शन करने वाले राज्यों के बराबर आ गया है, जिनकी वृद्धि दर सात से 20 प्रतिशत के बीच रही है।

यूपी ने पिछले वर्षों में अपनी वृद्धि दर की तुलना में भी काफी बेहतर प्रदर्शन किया है। उदाहरण के लिए जनवरी-फरवरी 2024 में राज्य के लिए जीएसटी वृद्धि दर क्रमशः 10.8 और 8.4 प्रतिशत थी। राज्य की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलने से राष्ट्रीय स्तर पर भी असर पड़ेगा। पिछले हफ्ते मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंथा नागेश्वरन ने कहा था कि इस साल आर्थिक वृद्धि में संभावित योगदान महाकुंभ से जुड़े भारी खर्च से हो सकता है। धार्मिक समागम में 66 करोड़ से ज्यादा लोगों के शामिल होने से यात्रा, आतिथ्य और स्थानीय व्यवसाय जैसे क्षेत्रों में तेजी आई। उपभोक्ता खर्च में यह उछाल व्यय पक्ष से जीडीपी वृद्धि में सार्थक योगदान देगा।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में नीति आयोग के अध्यक्ष चेयर प्रोफेसर मनमोहन कृष्ण के अनुसार, तीन धार्मिक व पौराणिक शहरों प्रयागराज, वाराणसी और अयोध्या पहुंचे भक्तों ने डिजिटल भुगतान मोड का उपयोग किया, जिससे संग्रह में मदद मिली। कमरे का किराया, भोजन जैसी विभिन्न वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें अधिक थीं और इसके परिणामस्वरूप अच्छा जीएसटी संग्रह हुआ। डिजिटल भुगतान ने संग्रह में योगदान दिया। यदि नकद लेन-देन अधिक नहीं होता तो संग्रह और भी अधिक होता। बुनियादी ढांचे में सुधार से दीर्घकालिक आर्थिक लाभ सुनिश्चित है। हालांकि अनुमान अलग-अलग हैं, फिर भी तीन लाख करोड़ की वृद्धि के सरकारी अनुमानों के अनुसार पर्याप्त वित्तीय प्रभाव निर्विवाद है। उन्होंने कहा कि इससे 30-40 लाख तदर्थ रोजगार सृजित हुए। कम से कम 25 प्रतिशत स्थायी रोजगार में तब्दील हो जाएंगे। हालांकि इस बात पर आश्चर्य है कि आने वाले वर्षों में विस्तारित क्षमता का कितना उपयोग किया जाएगा, क्योंकि आगंतुकों की संख्या कम हो जाएगी।
लखनऊ विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर एमके अग्रवाल ने कहा कि महाकुंभ राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद फायदेमंद रहा है। बहुत कम सार्वजनिक निवेश के साथ, उत्तर प्रदेश में व्यापार का कारोबार 3-4 लाख करोड़ रुपये के दायरे में होने की उम्मीद है। आयोजन ने स्थानीय अर्थव्यवस्था और ट्रांसपोर्टरों, खाद्य श्रृंखलाओं, किराना दुकानों, टेंट आदि सहित व्यवसायों को एक साथ सक्रिय कर दिया। कई शौकिया लोग अब अन्यत्र जाकर नौकरी की तलाश करने के बजाय स्वरोजगार उद्यमों में शामिल होने के लिए प्रेरित होंगे। वाराणसी के डीएवी पीजी कॉलेज में अर्थशास्त्र विभाग के प्रोफेसर अनूप कुमार मिश्रा ने कहा कि अनुमान है कि 3,000 रुपये खर्च करने वाले 45 करोड़ भक्तों से 13.5 लाख करोड़ रुपये का दान प्राप्त होगा।
2.5 प्रतिशत की वृद्धि के साथ यह कुल 13.84 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। इससे आतिथ्य, परिवहन और खुदरा क्षेत्र को बढ़ावा मिला, जिससे स्थानीय व्यवसायों को लाभ हुआ। श्रम एवं सेवायोजन मंत्री अनिल राजभर ने कहा कि प्रतिपक्ष को सनातन का वैभव नहीं पच रहा है, जबकि सनातन भारत की आध्यात्मिक शक्ति है, जिसकी स्वीकार्यता देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में दिन पर दिन बढ़ रही है। यह विपक्ष को अच्छा नहीं लग रहा है। विपक्ष ने बराबर अपना दो माह का समय महाकुंभ की निंदा में खराब हुआ। वे चाहते थे कि सनातनी डरकर कुंभ जाने का कार्यक्रम स्थगित कर दे।
इसके विपरीत वे लोग रात के अंधेरे में या बहुरूपिया बनकर पहुंचे और पुण्य अर्जित किए। हो सकता है कि कुछ बुजुर्गों आदि ने कर भी दिया हो, पर लोग ऐसे लोगों को धता बताते हुए पहुंचे और दुनिया के लिए नया रिकार्ड बना दिया, जिसका टूटना किसी के बस की बात नहीं है। हालांकि चुनौती हमारे लिए भी है कि अगले महाकुंभ के लिए करीब एक करोड़ श्रद्धालुओं के आने का इंतजाम करना होगा। उन्होंने कहा कि जो लोग कहते हैं कि काशी, अयोध्या और कुंभ में सरकार बेवजह पैसा खर्च कर रही है, उनके पास इस तरह की गैर जरूरी बात के सिवा कुछ नहीं है, जो जन भावना है, उसका हम आदर और सम्मान करते हैं, जो सनातन की भावना है, जो भारत की परंपरा का मूल है। उसको समृद्ध करने में उसको आगे बढ़ाने में सरकार कभी पीछे नहीं हटेगी, लोग चाहे कुछ भी कहते रहें।