माघ पूर्णिमा पर गुरु रविदास का हुआ था जन्म

संत रविदास भक्ति आंदोलन का जाना-पहचाना नाम थे। उनको गुरु रविदास, भगत रविदास और संत रविदास जैसे नामों से जाना जाता है। वहीं आज यानी की 12 फरवरी को गुरु रविदास जयंती मनाई जा रही है। माघ पूर्णिमा पर गुरु रविदास का जन्म हुआ था। वह समानता और मानव अधिकारों की शिक्षा दिया करते थे। वह संत, कवि और दार्शनिक थे। उन्होंने जातिपात और धर्म का खंडन करते हुए समाज को आत्मज्ञान की तरफ अग्रसर किया। संत रविदास सगुण और निर्गुण शाखा के कवि थे और इनके दोहे आज भी प्रख्यात हैं।

उत्तर प्रदेश के वाराणसी के सीर गोवर्धनपुर गांव में 1377 ई. में संत रविदास का जन्म हुआ था। जिस दिन संत रविदास का जन्म हुआ था, उस दिन माघ पूर्णिमा थी। इनके पिता का नाम श्रीसंतोख दास और मां का नाम श्रीमतिकलसा देवी था। वहीं पत्नी का नाम लोना देवी था। माना जाता है कि संत रविदास का कोई गुरु नहीं था। वह आम जनमानस को आडंबर और धार्मिक अंधविश्वास से दूर रहने की सलाह देते थे।   

संत रविदास जूते बनाने का काम किया करते थे। इसी काम में उनके घर से निकलकर संत बनने की कहानी छिपी है। रविदास के पिता जूते बनाया करते थे और वह अपने पिता की मदद किया करते थे। वह बहुत परोपकारी और दयालु थे और वह दूसरों की सहायते के लिए हमेशा तैयार रहते थे। जब भी वह किसी गरीब को नंगे पैर देखते हैं, तो मुफ्त में चप्पल बनाकर दे देते थे। ऐसे में उनके पिता उनकी आदत से परेशान थे और बहुत समझाते थे। लेकिन रविदास पर कोई असर नहीं पड़ा तो पिता ने उनको डांटकर घर से भगा दिया।

घर से निकलने के बाद रविदास एक झोपड़ी बनाकर उसमें जूते-चप्पल की मरम्मत करने का काम करने लगे। जूते-चप्पल बनाते हुए रविदास ने लोगों को कविताएं सुनाना शुरूकर दिया। ऐसे में उनके पास बहुत से लोग आने लगे और धीरे-धीरे उनकी लोकप्रियता बढ़ती चली गई। समाज कल्याण और उत्थान के लिए संत रविदास ने कई कार्य किए। 

हर साल माघ महीने की पूर्णिमा के दिन रविदास जयंती मनाई जाती है। इसे मनाने का मुख्य उद्देश्य सामाजिक समानता और भक्ति के प्रति उनके अहम योगदान को दर्शाना है। उन्होंने जात-पात और भेदभाव को खत्म करने का प्रयास किया था। इस दिन संत रविदास के भजन गाए जाते हैं और भंडारे भी करवाए जाते हैं। साथ ही इस दिन लोग दान-पुण्य भी करते हैं। संत रविदास जयंती के मौके पर किसी पवित्र नदी में स्नान करने का विशेष महत्व माना जाता है।

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