काले कोट का खौफ

अनूप गुप्ता

हमारे देश की पहचान को दुनिया भर में जो चार चांद लगे हैं, उसके लिए हजारों जवानों ने मां भारती की बलिबेदी पर जवानी बलिदान की है। वर्दी को जान से ज्यादा प्यार करने व उसकी रक्षा के लिए त्याग करने के भी सैकड़ों उदाहरण बगल के थाने से लेकर देश की सीमा तक आसानी से उपलब्ध हैं। यही सनातन परंपरा भी रही है, फिर यह मैटर नहीं करता कि वर्दी काली है, पीली है या फिर भगवा। खासतौर से 21वीं सदी में देखा जाए तो स्याह धंधों को सुरक्षा कवच देने के लिए कुछ अपराधियों, अराजक व असामाजिक तत्व बार काउंसिल में रजिस्ट्रेशन करवाने के बाद काला कोट पहनकर वकालत के पेशे को बदनाम करने की कोशिश में लिप्त रहे हैं। इसका विरोध तो सबसे पहले पेशे के अंदर से ही वरिष्ठ व गंभीर लोगों को करना चाहिए। भू-माफिया को वकील कहा जाए तो यह वकालत का अपमान है और यदि वकील को भू-माफिया कहा जाए तो भी यह पेशे का ही अपमान है। कहने का भाव यह है कि चाकू कदू पर गिरे या कदू चाकू पर, कुल मिलाकर कटना कदू को ही है।

भू-माफिया की गैरकानूनी गतिविधियों से आजिज आकर ही सरकार ने नकेल डालने के लिए यूपी रेरा आदि कानून को मैदान में उतारा था। यदि कुछ कथित वकीलों के कारण यही हालत वकालत की भी हुई तो देर-सबेर दोबारा सरकार को उनकी गतिविधियों को भी नियंत्रित करने के लिए कानून को उतारना पड़ेगा। अभी एडवोकेट एक्ट-1961 अस्तित्व में है। केंद्र सरकार ने हाल ही में वकीलों की गतिविधियों पर निगरानी बढ़ाने के लिए दबे पांव एडवोकेट अमेंडमेंट बिल-2025 लाकर कुछ ऐसा ही करने का प्रयास किया था, जिसका मसौदा बार काउंसिल ऑफ इंडिया सहित देशभर में तीखे विरोध के चलते वापस ले लिया गया है। भले ही सरकार ने संकोच, दबाव या किसी रणनीति के तहत कदम पीछे खींच लिए हों, पर संदेश तो जनहित में जारी हो ही गया है कि सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है और इस बात की खबर ऊपर तक है।

करीब डेढ़ दशक पहले लखनऊ के कई कथित अधिवक्ता कोट पहनकर अदालत कम ही जाते थे और दूसरों की प्रॉपर्टी पर कब्जा करने ज्यादा, जिससे नाराज होकर कोर्ट ने प्रशासन से कार्रवाई को कहा था। यदि गलती से परिसर पहुंच भी गए तो मठाधीशी करके और बड़े-बड़ों को रौला दिखाकर लौट आते थे। आज भी कुछ लोग काले कोट का लाठी की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। ज्यादा वकील देखकर दबाव में आ जाती है पुलिस, जबकि पहले भी हाईकोर्ट में मिलीभगत के कारण दोनों की हो चुकी है कई बार फजीहत और कोर्ट में नहीं काम आ सके थे एक-दूसरे के दोनों ही। न्यायपालिका ने गुंडई व प्लॉट-मकान पर कब्जे के बार-बार गंभीर आरोपों से आजिज आकर बची हुई प्रतिष्ठा की रक्षार्थ बीते डेढ़ दशक में जांच और कार्रवाई के कई बार सख्त आदेश दिए हैं। उसी सख्ती का असर है कि उल्लिखित अवधि में राजधानी के कई वकीलों पर गंभीर धाराओं में रिपोर्ट भी दर्ज हुई हैं, लाइसेंस भी कैंसिल हुए हैं और जेल भी जाना पड़ा है।

न्यायपालिका जो बार-बार कहती रही है, वही विधायिका हिम्मत करके करने जा रही थी। कई जजों द्वारा कही गई बातों को एक तरह से देखा जाए तो सरकार विधिक जामा पहनाना चाहती है। जैसे- लाइसेंस रद्द करना, गतिविधियों की निगरानी और अनुशासनात्मक कार्रवाई आदि। अब विधेयक को नए सिरे से तैयार किया जाएगा, जिसमें सभी के सुझावों का भी ख्याल रखने का केंद्रीय कानून मंत्री ने वादा किया है। दूसरे कानूनों के प्रावधानों के आधार पर वरिष्ठ अधिवक्ता सीधे हाईकोर्ट के जज बनते रहे हैं इसलिए यदि पैसा के चक्कर में पेशा बदनाम हुआ तो सारा सिस्टम ही लड़खड़ा जाएगा।

वैसे भी पहचान का संकट खड़ा हो गया है कि कौन वकील पीड़ितों के काम का है और कौन राजधानी में रोज कहर बरपा कर नए-नए पीड़ित पैदा कर रहा है। हाल के साल व हालिया माह में दो तारीखें कृष्णा नगर थाने के तहत कनौसी गांव निवासी दिनेश प्रताप सिंह के परिवार पर बहुत भारी पड़ीं। एक थी चार अगस्त 2022 व दूसरी 23 जनवरी 2025। दोनों बार काले कोट का ऐसा गैर वाजिब इस्तेमाल किया गया, जैसा खाकी का अतीत में डकैत करते थे। पहली बार दर्जनों तो दूसरी बार सैकड़ों लोगों ने ऐसा नंगा नाच किया कि स्थानीय निवासी सिहर उठे थे।

इस कृत्य से वकील कहने में शर्म महसूस कर रहे हैं लोग, सचमुच वाले वकील और न्यायपालिका। यह दीगर बात है कि बीसों गाड़ियों से मौके पर कब्जा कराने पहुंचे सौ से अधिक पुलिसकर्मी व अधिकारी भी उनके बैंड पर नृत्य का शानदार प्रदर्शन करते हुए राजधानी के सभ्य समाज में सुर्खियां बटोरने में सफल रहे थे। एक दौर था, जब सारे बेरोजगार पत्रकार बनना चाहते थे, पर पेशे के ज्यादा बदनाम हो जाने और हाईकोर्ट के शहर में होने के कारण ऐसे लोगों की पहली पसंद वकालत बनता जा रहा है।

इससे उन लोगों के लिए शर्मनाक स्थिति बन गई है, जिन्होंने जीवन वकालत में लगाकर समाज में नाम कमाया है और कुछ हैसियत बनाई है। बहुमुखी प्रतिभा के धनी कथित वकालत के इन नवोदित सितारों के घोड़ा, गाड़ी, बंगला और रुतबे से भरे चंद साल मेहनतकश कुछ वकीलों के कई दशक पर भारी पड़ रहे हैं। यहां पर जिस कथित वकील अभय प्रताप (गुड्डू यादव) की बात हो रही है, वह नेता भी है, भू-माफिया भी है, लाइसेंस कैंसिलेशन बार काउंसिल में पेंडिंग है और क्षेत्र के पीड़ित उसे वकील के भेष में भू-माफिया ही नहीं, बल्कि भेड़िया भी कहते हैं। उसकी नजर में जो प्रॉपर्टी चढ़ जाती है, उसे हासिल करने के लिए वह गोटियां फिट करने लगता है। उसके बाद अपने जैसे वकीलों की फौज लाकर कब्जा कर लेता है।

अपनी परेशानी लेकर दृष्टांत मीडिया हाउस आए पीड़ित बंधुओं ने बताया कि 970 गज की यह प्रॉपर्टी पुश्तैनी है। बाबा जंग बहादुर सिंह ने बंगाल की रहने वाली शांति देवी को 1959 में 50 रुपए में 600 गज बेची थी। बाकी 300 गज में मकान बनाकर हम लोग दशकों से रहते हैं। दिनेश प्रताप सिंह ने बताया कि शांति टीचर बनीं व शादी की। लखनऊ बराबर आती-जाती रहीं। उनके कहने पर उस पर सब्जी उगाई व आम आदि के पौधे लगाए, जो अब भी हैं। इस बीच दो लोग पॉवर ऑफ एटॉर्नी लेकर प्रकट होते हैं। कब्जा करने की कोशिश करते हैं तो दिनेश आदि भागकर भीलवाड़ा शांति के पास पहुंचे तो उन्होंने कहा कि किसी को पॉवर ऑफ एटॉर्नी नहीं दी है। विवाद देखकर 21 जून 1999 को दिनेश के नाम दान पत्र लिख दिया और अदालत ने भी उनके पक्ष में डिक्री कर दी।

धारावाहिक में इसके 22 साल बाद राजस्थान के अजमेर के केकड़ी नगर पंचायत के कर्मी राम गोपाल डांगा नामक करेक्टर का प्रवेश होता है यह कहकर कि प्रॉपर्टी शांति पांचाल ने उसके नाम वसीयत कर दी है। इसी आधार पर नगर निगम लखनऊ व सदर तहसील से नाम चढ़वा लिया कि शांति ने कोरोना में मरने के चंद रोज पहले नौ मार्च 2021 को वसीयत की थी। उन्होंने बताया कि खुद को वकील बताने वाले अभय राजाजीपुरम के रुकंदीपुर वार्ड से पार्षद रह चुके हैं। वह राजस्थान के अजमेर के डांगा से 13 जून 2022 को कराई गई रजिस्ट्री दिखाते हैं तो बैनामा कैंसिलेशन में क्यों नहीं गए, के सवाल पर कहा कि गए हैं, काम चल रहा है। उम्मीद है कि एक दिन सत्य जरूर जीतेगा।

वह कहते हैं कि नाम चढ़ाने की कार्यवाही लंबी होती है। 10 बार अजमेर से आना पड़ता, फिर भी सिस्टम के चलते नाम चढ़ा। तहसील व नगर निगम की नामांतरण कार्यवाही पर पीड़ित संदेह जताते हैं, क्योंकि किसी बड़े दैनिक समाचार पत्र में इसका विज्ञापन नहीं किया गया। आपत्ति लगाने का मौका नहीं देना व पुलिस का बराबर खिलाफ रहना पूरी कहानी बता देता है। चार अगस्त 2022 को क्या हुआ था, पर कहा कि हम भूसे की दुकान पर बैठे थे। कुल 10-15 कार व बाइक पर पहले दो दर्जन के करीब वकील की ड्रेस में लोग आए, फिर पचास के करीब असामाजिक तत्व भी कई गाड़ियों से आ गए पीछे से। प्लॉट खाली करने के लिए धमकाने लगे कि खरीद लिया है। फोन कर पुलिस बुलाई तो चौकी इंचार्ज आए।

दोनों लोगों को थाने ले जाकर बैठा दिया और खुद मौके पर बैठकर 970 वर्ग गज के मकान व प्लॉट पर कब्जा करा दिया। दो गाय थीं, उन्हें भगा दिया। रेवेन्यू मैटर में एनवॉल्वमेंट पर रोक के बावजूद बूढ़ी मां का हाथ पकड़कर घर से निकालकर दबंगों का ताला डलवा दिया। रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए थाने, एसीपी, सीपी, डीआईजी, आईजी, डीजीपी, प्रमुख सचिव गृह व सीएम के जनता दर्शन में पीड़ा बताने के बाद चौकी इंचार्ज लाइनहाजिर हुए थे तो एसएचओ का ट्रांसफर किया गया था। बाद में डीसीपी को हाईकोर्ट में पेश होना होना पड़ा, तब कहीं जाकर दर्ज हो सकी थी 8-10 वकीलों सहित पचासों लोगों पर रिपोर्ट।

उन्होंने बताया कि वह न सिर्फ विवादित है, बल्कि हाईकोर्ट ने प्रॉपर्टी डीलिंग व कब्जे कर रहे दागदार वकीलों की सूची में उसका नाम भी डाल रखा है। इतना ही नहीं, लाइसेंस निरस्तीकरण की कार्रवाई भी चल रही है। फर्जी वकीलों से परेशान शहरियों के हक में कोर्ट ने एसआईटी बनाई थी। किसी दबाव में आकर पुलिस ऐसे आदमी के निजी नौकर की तरह काम कर रही है। अभय का कोई आपराधिक इतिहास भी है क्या, पर कहा कि जमीनों पर कब्जे आदि की ही मुख्य शिकायतें हैं। कोर्ट में घुसने नहीं देंगे, ये कर देंगे, वो कर देंगे, फर्जी मुकदमे में फंसा देंगे और जीवन तबाह कर देंगे की धमकी मिलती रहती है।

राहत कहां से मिली, के सवाल पर कहा कि हाई कोर्ट ने याचिका संख्या 5879/2022 के जरिए बात सुनी, जांच करवाई कि चार तारीख के पहले दुकान कौन कर रहा था? उसी आधार पर 28 सितंबर 2022 को कब्जे का आदेश दिया। फरवरी 2023 में विपक्षी सुप्रीम कोर्ट गए और यथास्थिति का 17 दिसंबर 2024 को स्टे ले आए। एसएलपी उक्त ने 600 वर्गमीटर की दाखिल की थी और स्टे भी उतने पर ही था। कब्जे के लिए पहुंचे तो इंस्पेक्टर के पास गए उन्होंने एसीपी व डीसीपी से मिलने को कहा। 13 से 21 जनवरी तक सभी के खूब चक्कर मारने के बाद डीसीपी ने कहा कि कोई नापने के लिए तैयार नहीं है इसलिए कोई मदद नहीं कर सकते। कोर्ट के आदेश पर कब्जा तो दिलाना होगा।

सुप्रीम कोर्ट जाइए, कोई अच्छा वकील करिए। आदेश लेकर आओगे तो तुम्हारा करवा देंगे। इस तरह गुमराह करके पूरे 970 वर्ग गज पर 23 जनवरी 2025 को कब्जा करवा देते हैं। वह भी सुबह सात बजे। बीसियों गाड़ी में रिकार्ड के मुताबिक, 114 पुलिसकर्मी व अधिकारी बा वर्दी पहुंचे, एक गाड़ी पीएसी तो गाय लादने के लिए नगर निगम की एक कैटल कैचर गाड़ी भी। करीब इतनी ही गाड़ियों में इतने ही लोग भू-माफिया के भी पहुंचे थे। पुलिस के सामने ही नंगा नाच करते हुए माफिया के गुंडे परिजन को भगाकर भर ले गए थे वाहनों में पूरी गृहस्थी। अब वह रिपोर्ट लिखाने के लिए दौड़ रहे हैं। बंद दरवाजे को काटने के लिए कटर व ताले तोड़ने के लिए बड़े-बड़े हथौड़े भी लाए थे हमलावर और दुःखद यह है कि सारा नंगा नाच पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में हुआ।

दूसरे, सुप्रीम कोर्ट ने बहस में छूटे बिंदुओं के मद्देनजर रिव्यू मंजूर कर लिया है और डेट भी लग गई है, जिसके ब्यौरे की प्रतीक्षा है। सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा था कि सिविल कोर्ट मामले का तीन माह में निस्तारण करे और उससे पहले रेवेन्यू विभाग पैतृक कब्जे की स्थिति का पता लगाकर दाखिल करे स्टेटस रिपोर्ट। पीड़ित ने कहा कि प्लॉट के साथ मकान पर कब्जा दिलाकर पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश की ना फरमानी की है। उक्त तथ्य के साक्ष्य सुप्रीम कोर्ट में पेश कर दिए गए तो कई अधिकारियों की वर्दी उतर जाएगी। राजधानी में सीएम की नाक के नीचे इस तरह की घांधागर्दी चल रही है।

जमीन का मालिकाना हक किसका है, इस बात का फैसला अभी पूरी तरह हो नहीं पाया है और इसके बावजूद डीसीपी निपुण अग्रवाल और उनकी पूरी टीम का भू-माफिया को कब्जा कराने जाना और अतिरिक्त मेहरबानी दिखाना क्या जाहिर करता है? उक्त तथ्य जांच का विषय है। पैतृक संपत्ति के आधार पर दिनेश मालिक होते हुए जगह-जगह धक्के खा रहे हैं और पुलिस माफियाओं के साथ खड़ी है। सवाल तो होगा और एक दिन लखनऊ पुलिस को जवाब भी देना होगा कि क्या कोई आतंकी काबू करने गई थी? इससे पहले इतिहास में इतनी बड़ी संख्या में किस साल और कौन सी कार्रवाई में गई थी?

पांच थानों की पुलिस आखिरी बार किस माफिया को पकड़ने गई थी और किस आतंकवादी के खिलाफ अभियान में? सबसे खास बात वह भी सुबह सात बजे। इससे पहले सुबह सात बजे इतने अधिकारी-पुलिसकर्मी व नगर निगम का अमला कब सोकर जागा था और तैयार होकर प्राइवेट पर्सन की चाकरी करने पहुंच गया था? यह भी बताना होगा कि ऐसा उसने किसके आदेश से किया था। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कहते हैं कि भू माफियाओं की सूची बनाइए, उन्हें सलाखों के अंदर डालेंगे, लेकिन पुलिस को जो पैसा देता है, वह उसके साथ हमेशा खड़ी दिखती है।

आपकी नाक के नीचे राजधानी में पनप रही है गुंडों की नई पौध, जो आगे चलकर हो सकती है और खूंखार व खतरनाक। कब प्रशासन सुध लेगा ऐसे भू-माफियाओं की और कद्र करेगा सीएम के आदेश की? उधर, कानपुर जिला प्रशासन ने भी दागी वकीलों, पत्रकारों व पुलिसकर्मियों की सूची तैयार की है। इसमें 171 अधिवक्ता, 90 पुलिसकर्मी और 51 पत्रकार हैं। कई पर चार या अधिक आपराधिक मामले दर्ज हैं। गंभीर आरोप की दशा में गैंगस्टर की कार्रवाई होगी और शस्त्र लाइसेंस निरस्त होंगे। ज्वॉइंट पुलिस कमिश्नर के कार्यालय में एंटी ब्लैकमेलिंग और भू-माफिया सेल गठित की गई है। जनवरी 25 में एक वकील ने लिव इन पार्टनर का पहले एक करोड़ का बीमा कराया, फिर एसयूवी से कुचल कर मार डाला। आजकल अंदर हैं।

फरवरी-25 में एक महिला वकील तब सुर्खियों में आईं, जब अधिकारियों से संपर्क के बाद उन्होंने वसूली शुरू की और पैसे नहीं देने पर रेप में नामजद कराना शुरू किया। आरोप है कि वह अन्य वकीलों के साथ मिलकर गैंग चलाती है। डंकी रूट से कबूतरबाजी के मामले में एक स्वयंभू वकील की लखनऊ में गिरफ्तारी की गई है, वहीं एक दुस्साहसिक वारदात में भी काला कोट पहने कुछ लोगों के नाम सामने आए हैं। पुलिस प्रशासन इनकी जांच कर रहा है। इंदिरा नगर में रहने वाले लखनऊ पूर्वी के भाजपा विधायक ओपी श्रीवास्तव में पुलिस से कहा है कि एक मीट विक्रेता ने घर में घुसकर उनके साथ अभद्रता की है। उसके साथ कुछ वकील भी थे। दरअसल सेक्टर-12 की शिव विहार कॉलोनी वासियों की शिकायत पर खुले में मीट बेच रहे युवक पर कार्रवाई का उन्होंने आदेश दिया था, जिसके कारण ही उक्त घटना की गई है।

अब होगी गैंगस्टर की कार्रवाई

वकीलों के विरुद्ध याचिकाओं की सुनवाई के क्रम में लखनऊ बेंच ने कहा कि सभी शिकायतें जमीनों पर कब्जे व संपत्तियों के लिए धमकियां देने वाले प्रॉपर्टी डीलर के विरुद्ध हैं, जो वकील भी हैं। उनके विरुद्ध सरकार सख्त कार्रवाई करे। पहली बार व्यापक कार्रवाई करते हुए न्यायमूर्ति संगीता चंद्रा व जज एनके जौहरी की खंडपीठ ने वकीलों के विरुद्ध चल रही कुल 11 याचिकाओं के बारे में कहा कि समस्या की जड़ प्रॉपर्टी डीलिंग ही है, जिसकी वजह से आम नागरिकों को हिंसा का सामना करना पड़ता है। कोर्ट के आदेश पर हाजिर हुए पुलिस आयुक्त एसबी शिरोडकर ने बताया कि जमीनों पर कब्जा करने वाले कथित वकीलों के विरुद्ध तत्काल और प्रभावी कार्रवाई के लिए पुलिस ने रपेशल सेल का गठन किया है।

उनसे वकीलों के विरुद्ध दर्ज मामलों में पुलिस कार्रवाई का ब्यौरा अगली सुनवाई तक दाखिल करने को कहा। बार काउंसिल ऑफ यूपी की ओर से बताया गया कि वर्ष 2011 से 2021 के बीच कुल 29 वकीलों के लाइसेंस निलंबित किए गए हैं। हालांकि ऐसे निर्णय बार काउंसिल ऑफ इंडिया के समक्ष अपील के अधीन होते हैं इसलिए उसे भी पक्षकार बनाया जाना चाहिए ताकि इन कथित वकीलों व उनकी सामाजिक गतिविधियों का वह भी संज्ञान ले और सलाह भी ली जा सके। कोर्ट ने कमिश्नर ऑफ इनकम टैक्स (टीडीएस) को भी आदेशित किया कि वह भी ऐसे प्रॉपर्टी डीलर वकीलों के संबंध में रिपोर्ट प्रस्तुत करें। कई के विरुद्ध दर्ज कुछ मामलों की जांच सीबीआई, सीबीसीआईडी व एसटीएफ को दी गई थी, लिहाजा डीजे, एजेंसियों तथा संयुक्त पुलिस आयुक्त से भी उक्त मामलों की स्टेट्स रिपोर्ट तलब की।

खंडपीठ की सख्त टिप्पणी के बाद गैंगस्टर की कार्रवाई के लिए ऐसे वकीलों की सूची तैयार की जा रही है, जो पेशे के बजाय पैसे पर ध्यान दे रहे हैं यानी कि जमीन कब्जाने और प्रॉपर्टी डीलिंग में व्यस्त हैं। यह दीगर बात है कि सूची कई बार पहले भी बनी है, पर इस बार मामला ज्यादा गंभीर लग रहा है। कोर्ट के आदेश पर पुलिस कमिश्नर ने सभी डीसीपी को पत्र भेजकर सात दिन में वकीलों पर दर्ज मुकदमों का ब्यौरा इकट्ठा कर कोर्ट में पेश किया था। ज्ञात हो कि आमतौर देखने को मिला है कि वकीलों का कब्जा होते ही आम जनता पर दबाव बनाने के लिए बहुत बड़ा लोहे का काला बोर्ड प्लॉट या मकान पर लगा दिया जाता है। कृष्णा नगर कोतवाली के अंतर्गत आने वाले एक पीड़ित ने इस बात की पुष्टि की।

संयुक्त पुलिस कमिश्नर कानून-व्यवस्था उपेंद्र अग्रवाल ने बताया कि अधिवक्ताओं की वेशभूषा में अराजकता फैलाने वालों पर कार्रवाई करने के लिए एक प्रकोष्ठ का गठन किया गया है, जिसकी निगरानी वह खुद करेंगे। इसका कार्यालय डालीगंज स्थित संयुक्त पुलिस आयुक्त के कार्यालय में कमरा नंबर 36 में होगा। यदि वकील की वेशभूषा में कोई किसी को परेशान करता है, मकान या भूखंड पर कब्जा करता है तो इसकी शिकायत थाने के अलावा प्रकोष्ठ के कार्यालय में भी की जा सकती है।

उन्होंने बताया कि यदि दबंगों के डर से प्रकोष्ठ कार्यालय तक कोई न आना चाहे तो 9454400154 व 9454634500 पर भी शिकायत नोट करवा सकता है। प्रकोष्ठ में उक्त काम के लिए एक निरीक्षक समेत छह पुलिसकर्मी तैनात किए गए हैं। ज्ञात हो कि एक रिट की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट के न्यायाधीश राजन रॉय व एनके जौहरी ने साफ कहा था कि पुलिस को सतर्कता बरतनी होगी कि कार्रवाई सिर्फ अराजकतत्वों पर ही की जाए, न कि काम करने वाले वकीलों पर।

झुंड में जाकर कर रहे संपत्ति का शिकार

कार्यपालिका या यूं कहें कि हर जगह से और पूरे सिस्टम से हार जाने के बाद पीड़ित तीसरे स्तंभन्यायपालिका व चौथे स्तंभ पत्रकारिता के पास समस्या लेकर जाता है। उसकी भी जब दबंग नहीं सुनता है तो फिर वह पांचवें रास्ते पर चल पड़ता है, जिसके हाल के दशक में ही दस उदाहरण मिल जाएंगे, पर उसका उल्लेख सामाजिक मर्यादा और जिम्मेदार मीडिया हाउस होने के कारण हम नहीं कर सकते। चर्चा हो रही है हाईकोर्ट के बार-बार सख्त आदेश के बाद भी लखनऊ में प्लॉट व मकानों पर कब्जे के मामले न थमने की।

गोमती नगर के विक्रांत खंड-वन में दो दर्जन के करीब अधिवक्ता वर्दी में भू-माफिया के साथ पहुंचते हैं जमीन पर कब्जा करने, जब कि हरकतें देख कोर्ट ने परिसर के बाहर वर्दी पहनने पर भी रोक लगा रखी है और यह भी कहा था कि अवैध गतिविधियों में लिप्त पाए जाने पर लाइसेंस निरस्त किया जाएगा। इसके बावजूद तांडव रुक नहीं रहा है। कोर्ट डेढ़ दशक में कम से तीन बार सख्त आदेश दे चुकी है कि जमीन कब्जाने व प्रॉपर्टी डीलिंग करने वाले वकीलों पर सरकार करवाई करे। बताते हैं कि इस गिरोह ने कई भूखंडों पर कब्जा किया है, जिससे आधा दर्जन पीड़ित उपचार ढूंढ़ते फिर रहे हैं।

घटना का खुलासा सीसीटीवी में कैद फुटेज से हुआ था, जिसमें काले कोट में 25-30 लोग विक्रांत खंड-1 में भूखंड पर कब्जा करते और धमकी देते दिखे थे। कार्रवाई से बचने के लिए वकील सीसीटीवी के साथ डीवीडी भी लूट ले गए थे और धमकी दी थी कि अगर भविष्य में कैमरा लगाया तो गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे। प्रमाण भू-माफिया और वकीलों द्वारा महिलाओं के साथ बदसलूकी के भी मिले थे। इस गुंडई के बाद से आसपास के लोग व पीड़ित परिवार सदमे में है। तहरीर में कहा गया था कि वकील व भू-माफिया का यह रोज का काम है। सूचना पर पुलिस मौके पर जब पहुंची तो वे फरार हो गए थे।

आसपास के सीसीटीवी पुलिस ने खंगाले तो वकील प्लॉट पर कब्जे के लिए दीवार व गेट तोड़ते, घर में घुसकर मार-पीट एवं महिलाओं से बद्तमीजी करते दिखे थे। इतना ही नहीं, उनकी गाड़ियों पर नंबर प्लेट न होना ही सारी कहानी कह देता है। पुलिस जांच में गिरोह के कई नामों का खुलासा हुआ था, जो एलडीए बाबू की मिलीभगत से पहले फर्जी पेपर तैयार कराते हैं, जो जांच में एक मिनट भी कहीं नहीं ठहरते।

पुलिस ने कहा कि गिरोह के लोग पहले कच्छा-बनियान गैंग की तरह मालिक के साथ मारपीट जरूर करते हैं, कोर्ट केस में फंसाने और जेल भेजने की धमकी देते हैं। इतने से अगर बात नहीं बनी तो आते ही दीवारों को तोड़ना शुरू कर देते हैं। उनका एक ही उद्देश्य है, सभी के लिए एक-एक या एक ही हो तो औने-पौने में बेचकर रकम का बंटवारा। उसी के दम पर चल रही हैं इनके घर की गाड़ी और गाड़ियां। पुलिस ने कहा कि जांच में पता चला है कि कुछ लोग वकालत्त का लाइसेंस सिर्फ गलत कार्यों के लिए ही लेते हैं।

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