आर्थिक अंतर के बावजूद एक जैसे भारत-यूएस

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की दोस्ती दो लोकतांत्रिक देशों के शीर्ष नेताओं के बीच की कूटनीतिक औपचारिकता भर नहीं है। इस दोस्ती में एक सहजता है। पीएम मोदी ने ट्रंप के साथ अपने कनेक्शन पर कहा, ‘… उनके लिए अमेरिका फर्स्ट है। मेरे लिए इंडिया फर्स्ट। इसलिए हम दोनों की जोड़ी जम जाती है…’ पीएम मोदी ने जो बताया, वह सिर्फ विचारों का मिलना नहीं, बल्कि उसमें भावना है समानता और बराबरी की। 140 करोड़ की आबादी वाले मुल्क के सामने 34 करोड़ की आबादी, 30 ट्रिलियन इकॉनमी के बरक्स करीब 4 ट्रिलियन डॉलर की इकॉनमी। आंकड़ों का अंतर भले बहुत ज्यादा दिख रहा हो, पर यहां बात भाव की हो रही है।

बराबरी का यह भाव भारतीय दर्शन में कई जगह मिलता है। वेदों में कहा गया है ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः’, यानी सभी सुखी रहें और स्वस्थ रहें। इस कामना में ही भाव निहित है बराबरी का। यहां इससे फर्क नहीं पड़ता कि ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ की प्रकट इच्छा से भला किसका हो रहा है। कामना करने वाले के लिए सब एक पायदान पर खड़े हैं।

जब हम बराबरी का भाव रखते हैं, तभी सारे भेद मिटते हैं। और जब अंतर नहीं रहता, तो लक्ष्य एक हो जाता है। वही लक्ष्य जो ट्रंप का है या जो मोदी ने बताया – नेशन फर्स्ट। समानो मन्त्रः समितिः समानी – ऋग्वेद के 10वें मंडल के 191वें सूक्त के मुताबिक, हम सबका विचार और लक्ष्य समान होना चाहिए। लेकिन ऐसा तब तक नहीं हो सकता, जब तक भाव बराबरी का न हो। खुद को एक-दूसरे से अलग समझने वाले दो लोग कभी एक मंजिल के लिए एक दिशा में नहीं चल सकते।

बराबरी के यही सूत्र हमें मिलते हैं बौद्ध और जैन धर्म में भी। महात्मा बुद्ध के संघ में सभी जातियों, वर्णों के लोगों को प्रवेश मिला – न जाति तय महत्त्वं, न जाति तय ब्राह्मणो – कोई जन्म से नहीं, अपने कर्मों से महान बनता है। उनके दिखाए अष्टांगिक मार्ग और पंचशील सिद्धांत में सभी को समान रूप से नैतिकता व अहिंसा का पालन करने की शिक्षा दी गई है।

जैन धर्म की बुनियाद में समानता का सिद्धांत है। इस धर्म के आदर्श वाक्यों में है, ‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्’। जैन ग्रंथ ‘तत्त्वार्थ सूत्र’ के पांचवें अध्याय में वर्णित इस सूत्र का मतलब है कि सभी जीव एक-दूसरे पर निर्भर हैं और एक-दूसरे से बंधे हुए हैं।

भारत और अमेरिका में कई समानताएं हैं। दोनों देशों में विविधता के लिए जगह है। दोनों के अपने मूल्य हैं और अपने आदर्श। हां, आर्थिक खाई है, लेकिन भारत उसे पाट रहा है। इस दशक के अंत तक भारत के दुनिया की तीसरी बड़ी इकॉनमी बनने की आशा है और 2047 तक उसने विकसित देश बनने का लक्ष्य तय किया है।

भारत की विदेश नीति भी स्पष्ट है। वह स्वतंत्र है और अमेरिका व पश्चिमी देशों के दबाव के बीच भारत इस पर अडिग बना हुआ है। देशहित को सर्वोपरि मानकर भारत वैश्विक ताकतों से संवाद करता है। वह उस ग्लोबल साउथ की भी आवाज है, जिसकी अक्सर सुनी नहीं जाती। वैश्विक मंचों पर भारत इन देशों के लिए आवाज उठाता है और उठाता रहेगा। वह भी बिल्कुल समभाव से।

पीएम मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप की दोस्ती का आधार ‘नेशन फर्स्ट’ भी कोई आज की अवधारणा नहीं। महाभारत के रणक्षेत्र में खड़े होकर जब भगवान कृष्ण गीता का उपदेश देते हैं, तो उसमें एक संदेश मातृभूमि की रक्षा का भी होता है। जब भगवान श्रीराम वनवास पूरा कर अयोध्या लौटते हैं, तब वह भी कह उठते हैं कि सोने की लंका से अधिक प्रिय जन्म भूमि है – ‘अपि स्वर्णमयी लंका, न मे लक्ष्मण रोचते। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।।’ इसके पीछे भावना वही है – राष्ट्र प्रथम।

मोदी और ट्रंप की दोस्ती केवल व्यक्तिगत संबंध नहीं, इन्हीं गहरे सिद्धांतों का एक उदाहरण है। चाहे वह वेदों का मंत्र हो, बौद्ध संघ की समावेशिता या जैन धर्म का सूत्र – सभी दर्शन यह सिखाते हैं कि सच्ची मित्रता और सहयोग समानता व आपसी सम्मान पर ही टिके होते हैं। यही भारतीय परंपरा की विशेषता है, और इसी से भारत-अमेरिका संबंधों का भविष्य भी तय हो सकता है।

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