बेटियां राष्ट्र निर्माण की मजबूत कड़ी : कोर्ट

भोपाल। भोपाल जिला अदालत ने अपनी ही एक माह की मासूम बेटी की निर्मम हत्या करने वाली मां को दोषी ठहराते हुए उसे आजीवन कारावास और 1000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है। अपर सत्र न्यायाधीश अतुल सक्सेना की अदालत ने इस मामले में अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि बेटियां केवल परिवार की नहीं, बल्कि सभ्यता, संस्कृति और राष्ट्र निर्माण की भी मजबूत कड़ी हैं।

इस मामले में विशेष लोक अभियोजक सुधा विजय सिंह भदौरिया ने पैरवी की। उन्होंने बताया कि पांच साल बाद इस मासूम को न्याय दिलाने में सफलता मिली, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि भोपाल जिला कोर्ट ने बेटियों के महत्व पर विशेष टिप्पणी की। यह फैसला खासतौर पर उन तमाम अन्य मामलों के लिए भी एक मिसाल बनेगा, जहां बेटियों की सुरक्षा और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए न्याय की आवश्यकता है।

कोर्ट ने कहा कि मौजूदा समय में बेटियां न केवल परिवार के लिए, बल्कि सभ्यता, संस्कृति और राष्ट्र निर्माण के लिए भी एक सशक्त हस्ताक्षर बन चुकी हैं। शास्त्रों में भी बेटियों को हृदयों का बंधन, भावनाओं का स्पंदन, सृजन का आधार, भक्ति का आकार और संस्कृति का संस्कार माना गया है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि आज के भारत में बेटियों को साहस, सृजन, सेवा, सभ्यता, सौंदर्य और शक्ति का प्रतीक माना जा रहा है। फैसले में रवींद्रनाथ टैगोर की प्रसिद्ध पंक्तियों का भी उल्लेख किया गया, जिसमें उन्होंने कहा था, “जब एक पुत्री का जन्म होता है, तो यह इस बात का प्रमाण है कि ईश्वर मानव जाति से अप्रसन्न नहीं है, क्योंकि ईश्वर पुत्रियों के माध्यम से स्वयं को साकार करता है।” यह फैसला न केवल इस अपराध के लिए दोषी को सजा दिलाने वाला है, बल्कि समाज में बेटियों के प्रति सम्मान और उनके महत्व को भी पुनः स्थापित करता है।

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