
सुप्रीम कोर्ट ने संसद से आग्रह किया है कि वह चाइल्ड मैरिज प्रोहिबिशन एक्ट (पीसीएमए) में संशोधन पर विचार करे ताकि बच्चों की सगाई को गैरकानूनी बनाया जा सके। कोर्ट का कहना है कि वर्तमान कानून बच्चों की सगाई को रोकने में असमर्थ है, जिससे इसे कानूनी ढांचे से बचने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। यह स्थिति नाबालिगों के पसंद के अधिकार का उल्लंघन करती है और उनके अपने पार्टनर को चुनने के अधिकार को छीनती है।
प्रमुख बिंदु:
- बाल विवाह पर रोक: सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी प्रवर्तन, न्यायिक उपायों और प्रौद्योगिकी आधारित पहलों पर जोर दिया है ताकि बाल विवाह को प्रभावी रूप से रोका जा सके।
- बाल विवाह निषेध अधिकारी: राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को जिला स्तर पर बाल विवाह निषेध अधिकारी (सीएमपीओ) नियुक्त करने का निर्देश दिया गया है, जो इस मुद्दे पर पूरी जिम्मेदारी संभालेंगे।
- रिपोर्टिंग और जवाबदेही: हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश को सीएमपीओ की तिमाही रिपोर्ट अपनी आधिकारिक वेबसाइटों पर अपलोड करनी होगी, जिससे जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
- समीक्षा और निगरानी: महिला और बाल विकास तथा गृह मंत्रालयों को सीएमपीओ और कानून प्रवर्तन एजेंसियों की तिमाही कामकाज की समीक्षा करने का निर्देश दिया गया है।
यह कदम बाल विवाह को समाप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है और इससे न केवल कानूनी ढांचे को मजबूत किया जा सकेगा, बल्कि नाबालिगों के अधिकारों की रक्षा भी होगी।