घुसपैठिया मुक्त भारत

बचपन में प्लेग, पीला बुखार व चेचक मुक्त भारत सुनने को मिला तो किशोरावस्था में टीबी व कुष्ठ मुक्त भारत, बालिग होने पर पोलियो व मातृ टेटनस मुक्त भारत व अधेड़ होने पर घुसपैठिया मुक्त भारत बनते हुए देखने को मिल रहा है, क्योंकि समय की तरह घुसपैठिया भी गतिमान है। बयानवीरों की बातों के बवंडर व बकवास का बुरा आखिर कोई कब तक न माने ? हर बात की एक सीमा होती है। एक ओर दुनिया जहां रोहिंग्या, बांग्लादेशी और पाकिस्तानी को वेटर (थूकने-मूतने के कारण) तक बनाने से इंकार कर रही है तो वोटर बनवाने पर तुले देश के विपक्षी नेता अगर सुधरे नहीं तो जल्द ही घुसपैठियों के समर्थकों से मुक्त भारत भी सुनने को मिल जाएगा। अभी तक का हाल देखकर साफ हो गया है कि सरकार ने सही जगह हाथ डाला है, कागजों की उसी कमजोर नस को कस कर दबाया है व बिल में खौलता पानी डाला है, जिस पर गैरजरूरी बहस की जा रही थी और घुसपैठियों के हक में अनावश्यक बयानबाजी की जा रही थी। अब उन पत्रकारों की भी खूब समझ में आ गया है कि कागज क्यों मांगे जा रहे थे, जो उस समय कुछ सुनने तक के लिए नहीं तैयार थे और उल्टे भड़काने में जुटे थे।

एक ओर योगी एक्सप्रेस-वे बनवा रहे हैं, राजनाच डिफेंस कॉरिडोर बनवा रहे हैं और मोदी फ्रेट कॉरिडोर (तीसरी चौथी रेलवे लाइन) व औद्योगिक गलियारे बनवा रहे हैं तो अखिलेश-राहुल एंड कंपनी घुसपैठियों के लिए सुरक्षित गलियारा वोटर लिस्ट में नाम) बनवाने के लिए मुस्लिम जेन-जी को भड़काने में लगे हैं। यही हताशा प्रदेश में दूसरे व देश में तीसरे नंबर के दल समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के ताजा बयानों से भी परिलक्षित हुई है। उनकी पीड़ा का सहज अनुमान उनके बयान से ही हो जाता है। यही अखिलेश एक माह पहले जहां बिहार में राहुल गांधी व तेजस्वी प्रसाद यादव के सुर में सुर मिलाते घूम रहे थे कि वोट चोरी हो गया है, एसआईआर फर्जी है व चुनाव आयोग चोर है, वही अब कहते देखे जा रहे हैं कि एसआईआर पर ध्यान न देकर जो लोग प्रदेश कार्यालय की परिक्रमा कर रहे हैं, उनके टिकट काटे देंगे। उनका दूसरा बयान भी उनकी अकुलाहट व पीड़ा ही दर्शाता है कि एसआईआर बीजेपी सरकार अपनी नाकामी छुपाने के लिए ही करवा रही है। बिहार में इसी कारण लाखों लोग वोटिंग से वंचित रह गए। यूपी और बंगाल में साल भर में चुनाव हैं तो फिर इतनी जल्दबाजी क्यों मचाई जा रही है? एक कदम आगे जाते हुए अखिलेश ने कहा कि बीजेपी सरकार जनता को रोटी और रोजी देने के बजाय निजी जासूसी के लिए संचार साथी ऐप लाई थी। इसकी क्या जरूरत, दरअसल उनका इतिहास ही जासूसी का रहा है। यह प्राइवेसी का उल्लंघन है। बीजेपी सरकार ने अभिव्यक्ति की आजादी पहले ही छीन ली है। अपना वोट कटने से बचाएं, खुद बनवाएं क्योंकि बीजेपी अंबेडकर के संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार को छीनने की तैयारी में है। इसके बाद आरक्षण छीन लिया जाएगा। जनता को मूर्ख समझ कर सत्ता के लिए इस तरह से भड़काया जा रहा है, फिर संभलते हुए कहा कि सभी का मतदान का अधिकार बना रहे व चुनाव आयोग छीने नहीं। तीसरा बयान अपने सखा राहुल की तर्ज पर मुस्लिम जेन-जी को भड़काने के लिए हैदराबाद जाकर दिया कि देश में जो कुछ चल रहा है, यह एसआईआर नहीं है, बल्कि उसके बहानेदे एनआरसी किया जा रहा है। सरकार ने भले ही उनके बयान को हल्के में लिय हो, पर सोशल मीडिया ने जवाब दिया कि हम देश में झाडू लगा रहे हैं, इसमें किसी के पिता का क्या जाता है? दूसरी ओर, यूपी के सीएम भी कम चिंतित नहीं हैं। पश्चिमी यूपी के मंडलों की समीक्षा बैठकों में पहले कहा कि एक भी गलत वोट न बनने पाए, फिर कहा कि एक भी गलत वोट न कटने पाए और फिर कहा कि पार्टी कार्यकर्ता पांच से 10 दिसंबर तक बूथों पर कैंप लगाकर मतदाताओं क मदद करें एसआईआर फार्म भरने में। उनके चीधे बयान के बाद तो अपने चीर्थे बयान में घुसपैठिया संबंधी खुफिया रिपोटों को ताक पर रखकर संवैधानिक पद बचपन में प्लेग, पीला बुखार व चेचक मुक्त भारत सुनने को मिला तो किशोरावस्था में टीबी व कुष्ठ मुक्त भारत, बालिग होने पर पोलियो व मातृ टेटनस मुक्त भारत व अधेड़ होने पर घुसपैठिया मुक्त भारत बनते हुए देखने को मिल रहा है, क्योंकि समय की तरह घुसपैठिया भी गतिमान है। बयानवीरों की बातों के बवंडर व बकवास का बुरा आखिर कोई कब तक न माने? हर बात की एक सीमा होती है। एक ओर दुनिया जहां रोहिंग्या, बांग्लादेशी और पाकिस्तानी को वेटर (चूकने-मूतने के कारण) तक बनाने से इंकार कर रही है तो वोटर बनवाने पर तुले देश के विपक्षी नेता अगर सुधरे नहीं तो जल्द ही घुसपैठियों के समर्थकों से मुक्त भारत भी सुनने को मिल जाएगा। अभी तक का हाल देखकर साफ हो गया है कि सरकार ने सही जगह हाथ डाला है, कागजों की उसी कमजोर नस को कस कर दबाया है व बिल में खौलता पानी डाला है, जिस पर गैरजरूरी बहस की जा रही थी और घुसपैठियों के हक में अनावश्यक बयानबाजी की जा रही थी।

अब उन पत्रकारों की भी खूब समझ में आ गया है कि कागज क्यों मांगे जा रहे थे, जो उस समय कुछ सुनने तक के लिए नहीं तैयार थे और उल्टे भड़काने में जुटे थे। एक ओर योगी एक्सप्रेस-वे बनवा रहे हैं, राजनाथ डिफेंस कॉरिडोर बनवा रहे हैं और मोदी फ्रेट कॉरिडोर (तीसरी-चौथी रेलवे लाइन) व औद्योगिक गलियारे बनवा रहे हैं तो अखिलेश-राहुल एंड कंपनी घुसपैठियों के लिए सुरक्षित गलियारा (वोटर लिस्ट में नाम) बनवाने के लिए मुस्लिम जेन-जी को भड़काने में लगे हैं। यही हताशा प्रदेश में दूसरे व देश में तीसरे नंबर के दल समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के ताजा बयानों से भी परिलक्षित हुई है। उनकी पीड़ा का सहज अनुमान उनके बयान से ही हो जाता है। यही अखिलेश एक माह पहले जहां बिहार में राहुल गांधी व तेजस्वी प्रसाद यादव के सुर में सुर मिलाते घूम रहे थे कि वोट चोरी हो गया है, एसआईआर फर्जी है व चुनाव आयोग चोर है, वही अब कहते देखे जा रहे हैं कि एसआईआर पर ध्यान न देकर जो लोग प्रदेश कार्यालय की परिक्रमा कर रहे हैं, उनके टिकट काटे देंगे। उनका दूसरा बयान भी उनकी अकुलाहट व पीड़ा ही दर्शाता है कि एसआईआर बीजेपी सरकार अपनी नाकामी छुपाने के लिए ही करवा रही है। बिहार में इसी कारण लाखों लोग वोटिंग से वंचित रह गए। यूपी और बंगाल में साल भर में चुनाव हैं तो फिर इतनी जल्दबाजी क्यों मचाई जा रही है? एक कदम आगे जाते हुए अखिलेश ने कहा कि बीजेपी सरकार जनता को रोटी और रोजी देने के बजाय निजी जासूसी के लिए संचार साथी ऐप लाई थी। इसकी क्या जरूरत, दरअसल उनका इतिहास ही जासूसी का रहा है। यह प्राइवेसी का उल्लंघन है। बीजेपी सरकार ने अभिव्यक्ति की आजादी पहले ही छीन ली है। अपना वोट कटने से बचाएं, खुद बनवाएं, क्योंकि बीजेपी अंबेडकर के संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार को छीनने की तैयारी में है। इसके बाद आरक्षण छीन लिया जाएगा। जनता को मूर्ख समझ कर सत्ता के लिए इस तरह से भड़काया जा रहा है, फिर संभलते हुए कहा कि सभी का मतदान का अधिकार बना रहे व चुनाव आयोग छीने नहीं। तीसरा बयान अपने सखा राहुल की तर्ज पर मुस्लिम जेन-जी को भड़काने के लिए हैदराबाद जाकर दिया कि देश में जो कुछ चल रहा है, यह एसआईआर नहीं है, बल्कि उसके बहाने एनआरसी किया जा रहा है। सरकार ने भले ही उनके बयान को हल्के में लिया हो, पर सोशल मीडिया ने जवाब दिया कि हम देश में झाडू लगा रहे हैं, इसमें किसी के पिता का क्या जाता है? दूसरी ओर, यूपी के सीएम भी कम चिंतित नहीं हैं। पश्चिमी यूपी के मंडलों की समीक्षा बैठकों में पहले कहा कि एक भी गलत वोट न बनने पाए, फिर कहा कि एक भी गलत वोट न कटने पाए और फिर कहा कि पार्टी कार्यकर्ता पांच से 10 दिसंबर तक बूथों पर कैंप लगाकर मतदाताओं की मदद करें एसआईआर फार्म भरने में। उनके चौथे बयान के बाद तो अपने चौथे बयान में घुसपैठिया संबंधी खुफिया रिपोटों को ताक पर रखकर संवैधानिक पद पर रह चुके अखिलेश की पीड़ा ही फट पड़ी और बोले कि लखनऊ में कोई घुसपैठिया नहीं है। गरीब लोगों को कागज के नाम पर परेशान व अपमानित किया जा रहा है। किसी के कहने से क्या होता है, सच्चाई यह है कि घुसपैठिया मुक्त भारत के लक्ष्य को 2028 तक पाने के लिए सभी को तन-मन से लगना होगा। इसके विपरीत सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव बौखलाहट की पराकाष्ठा पार करते हुए कहते हैं कि भाजपाई किस हक से कागजों व घुसपैठियों की पड़ताल कर रहे हैं। उन्हें भी सोशल मीडिया ने जवाब दिया कि जो काम बीजेपी वर्कर कर रहे हैं, यह तो अखिलेश सहित देश के हर नागरिक का प्रथम कर्तव्य है कि एक भी विदेशी का वोट न बनने पाए और घुसपैठियों को देश से भगाया जाए, क्योंकि वे हमारे नागरिकों के बच्चों के हक का हवा, पानी व राशन् खा रहे हैं।

आज देश में साफ हवा-पानी की कमी पैदा हो गई है तो रहने के लिए‍ जगह भी कम पड़ रही है। यही हाल रहा और जल्द सीमा और उनके समर्थकों के मुंहों पर ताले न पड़े तो कल खाने के भी लाले पड़ सकते हैं इसलिए हमारे देश की तुलना में दुनिया के दर्जनों मुस्लिम, चीन जैसे बौद्ध व ईसाई देशों का घनत्व बहुत कम है, यहां जाकर क्यों नहीं शरण लेते, लेकिन नहीं क्योंकि उन्हें तो गजवा-ए-हिंद के लक्ष्य को पाने की ट्रेनिंग देकर भेजा जा रहा है? ऐसे कई वीडियो वायरल हो रहे हैं, जिनमें कहा जा रहा है कि 30 करोड़ हो गए हैं, बस्द थोड़ी सी कसर और बाकी है 50 करोड़ पूरा करने में, लिहाजा अपनी औरतों को जल्दी-जल्दी बच्चा पैदा करने की मशीन बना दो ताकि साल में दो-दो निकलने लगे, क्योंकि मुल्ला मौलवी ने कहा है। यह किमियागर इतनी जल्दबाजी में है कि सीधे खुदा या देवबंद से बात करके मुस्लिम महिलाओं के लिए जुड़वां बच्चे हीर पैदा करने का फतवा भी जारी करवा सकता है। इस कारण ही कहा जाने लगा है कि अल्ला का इस्लाम और है और मुल्ला का इस्लाम और व अल्ला का कुरान अलग है और मुल्ला का कुरान अलग। चूंकि जाहिल हैं इसलिए इस बात से भी मतलब नहीं कि दुनिया में 57 मुस्लिम देश हैं, जिनमें से आधे गृहयुद्ध से जूझ रहे हैं, आधे कटोरा लिए दुनिया भर में घूम रहे हैं भारी आबादी का पेट भरने के लिए एवं कई बिखर चुके हैं व कई बिखरने की कगार पर खड़े हैं और जो मुट्ठी भर आर्थिक रूप से मजबूत हैं, वे इसलिए हैं क्योंकि समय व पश्चिमी दुनिया के साथ तालमेल बनाकर चल रहे हैं। लाखों मुसलमानों के पिता पाकिस्तान के हजारों लोगों को खाड़ी देशों से भीख मांगने के जुर्म में निकाला गया था। लाखों अमीर मुस्लिमों, कई आतंकियों व कई देशद्रोहियों के बच्चे मस्जिद व मदरसों से दूरु रहकर अंग्रेजी माध्यम की उच्च व डॉक्टर-इंजीनियर की शिक्षा विकसित पश्चिमी देशों में हासिल कर रहे हैं, पर भारत के डॉक्टरों तक को निर्दोषों की हत्या दं आतंकवाद ही रास आ रहा है।

मुख्यमंत्री ने प्रशासन को निर्देश दिया है कि घुसपैठियों को चिन्हित कर डिटेंशन सेंटर में रखें, फिर उनके देश भेजें। दो साल में महज 200 बांग्लादेशियों व सौ के करीब रोहिंग्या को ही एटीएस द्वारा पकड़ा जा सका है। दरअसल पीछे देखने में आया है कि नेपाल के सीमावर्ती जिले घुसपैठ के लिहाज से काफी संवेदनशील हो चुके थे, जहां डेमोग्राफी चेंज करने व सरकारी जमीन पर कब्जा करके मस्जिद व मदरसा बनाने का बड़ा खेल खेला जा रहा था। इसके पकड़े जाने से ही साफ हो गया था कि अब देश के दुश्मनों के निशाने पर छोदे, शहर, जिले व गांव आ चुके हैं, जो कि धीरे-धीरे कानून एवं व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं। सिर्फ 2025 के 12 माह में ही 300 से अधिक मस्जिद व मदरसों पर कार्रवाई की जा चुकी है। अब सिर्फ वही बचे हैं, जिनके कागज मजबूत थे इसलिए अब देश विरोधियों का पूरा फोकस कागजों के इंतजाम पर है इसलिए वे तेजी से स्वथर्मी प्रथानों, सभासदों व पार्षदों के पास पहुंच रहे हैं निवास बनवा कर कागजों को मजबूती प्रदान करने के लिए। पूछने पर वे कहेंगे कि बिजली कनेक्शन लेने, बैंक खाता खुलवाने या आधार कार्ड सही करवाने के लिए बनवा रहे हैं तो विशेष ध्यान रखें कि निवास उसी व्यक्ति का बनाएं, जिसे व्यक्तिगत रूप से जानते हों व पहचानते हों। हो सकता है कि वह किसी की पैरवी लेकर आए या पैरोकार को लेकर, फिर भी विवेक का इस्तेमाल जरूर करें और देश के खिलाफ जाने के पहले एक बार खूब सोच जरूर लें। अगर भविष्य में वह व्यक्ति कोई लोचा करता है तो फंसेगा निवास बनाने वाला भी। उसे भी पाप या अपराध में बराबर का हिस्सेदार माना जाएगा।

फर्जी कागज या पहचान बनाने वाले कभी न भूलें कि जांच जारी है और बचेंगे वे भी नहीं। ऐसे में यह दोहरी सतर्कता का समय है, क्योंकि घुसपैठियों के आधार आदि बनाकर घुसाने के बाद प्रश्रय रूपी आधार व देने वाले चोट्टे छह माह में पूरे देश में सौ से अधिक पकड़े गए हैं। उन्हें अंदर आने में मदद करने वाले भी तेजी से अंदर जा रहे हैं। धरपकड़ के तहत गिरोह के गिरोह पकड़े जा रहे हैं। भगदड़ मची हुई है। एक-एक गांव से दसियों गधे के सिर से सींग की तरह गायब हो रहे हैं तो मुस्लिम बहुल कस्बों से सैकड़ों की तादाद में घुसपैठिये भाग रहे हैं तो महानगरों से हजारों की संख्या में। बंगाल का तो हाल ही बेहाल है। सीमा के दोनों ओर जमावड़ा बताया जा रहा है। यूपी का हाल भी बदहाल है। दृष्टांत मीडिया हाउस विभिन्न रिपोर्ट के आधार पर निरंतर प्रकाशित कर रहा था कि राजधानी में दो लाख बांग्लादेशी वः रोहिंग्या घुसपैठिये हैं। कई बार यह भी छपा कि वीआईपी कॉलोनी गोमती नगर को जोड़ने वाले गोमती के सभी पुलों, केजीएमयू व इमामबाड़ा सहित पुराने लखनऊ के अधिकांश स्थानों पर सैकड़ों कश्मीरी ड्राई फ्रूट बेच रहे हैं। घुसपैठियों के बारे में एक बात आम है कि वे हर ऐसी जगह पर बैठे हैं, जहां उन्हें कतई नहीं होना चाहिए। इसके बावजूद यूपी एटीएस किस्तों में उनके संगठित गिरोहों पर कार्रवाई करती है। इस कारण न गिरोह पीछे हटने का नाम ले रहे हैं और न घुसपैठियों की संख्या कम होने का। करीब दो-ढाई साल पहले जब इंटेलीजेंस की रिपोर्ट आई थी तो उसमें देश में इनकी संख्या दो-ढाई करोड़ बताई गई थी, तब जाकर सरकारों व जिम्मेदारों की नींद टूटी थी। बताते हैं कि इस समय देश में करीब तीन करोड़ घुसपैठिये हैं, जो कि दुनिया में सर्वाधिक है। इसके बावजूद दुनिया भर के छुटभैये देश, जिनकी कुल आबादी तीन करोड़ नहीं है और जो 80 करोड़ को मुफ्त राशन देने के बारे में 80 साल तक सोच भी नहीं सकते, ज्ञान बराबर देते रहते हैं।

उस दौरान घुसपैठ कराने वाले कई ऐसे संगठित गिरोहों का खुलासा हुआ था, जो पैसे लेकर भारतीय नागरिकता के दस्तावेज
मुहैया कराते हैं व पैसे के लिए मानव तस्करी ही जिनका पेशा है। दो नंबर की इसी नागरिकता की जांच के अभियान का
नाम है एसआईआर, जिसने विपक्ष की राजनीति का कर दिया है बंटाधार और जिसने उड़ा दी है रातों की नींद व दिन का
करार, अब खतरे में उनका सियासत का पूरा कारोबार। बीच-बीच में लखनऊ महापौर के बयान व घुसपैठिया खोजने के
अभियान भी सुर्खियां बनते रहे हैं, लेकिन अब पानी सिर के ऊपर जा चुका है, लिहाजा फुटकर अभियानों से बात नहीं बनने वाली इसीलिए मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की जरूरत पड़ी। आज एसआईआर-2.0 के तौर पर जो अभियान देश के 12 राज्यों में चलाया जा रहा है, हालात के मद्देनजर उसे पूरे देश में चलाने की जरूरत है और चलेगा भी। पहले गली-कूचे के धार्मिक व धर्माध नेताओं के प्रश्रय के कारण मामला तूल नहीं पकड़ रहा था, क्योंकि तब एसआईआर उत्तर प्रदेश में शुरू नहीं हुआ था, लेकिन करीब एक माह पहले जब से शुरू हुआ है, तब से प्रायः मन की आग को दबाकर सो जाने वाले महानगरवासी सुकून महसूस कर रहे हैं क्योंकि कश्मीरी, म्यांमारी व बांग्लादेशी अब पड़ोसी उन्नाव, सीतापुर, रायबरेली व बाराबंकी जैसे जिलों में तेजी से पैर पसार रहे हैं। दरअसल महापौर ने एक सतही बयान दिया था कि घुसपैठिये तुरंत लखनऊ छोड़कर चले जाएं। बड़े संदभों में यह कोई बात नहीं हुई, क्योंकि वे प्रदेश या देश के किसी भी कोने में रहें, भौतिक भार भारत पर पड़ रहा है और बढ़ रहा है, लेकिन इससे बड़ा बयान उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं था।

गांव-गांव की मस्जिदों में पहुंच चुके हैं घुसपैठिये

देश एक गहरी व बहुत बड़ी साजिश में फंस चुका है। हाईटेक व शातिर न होने के कारण यूपी पुलिस कई साल से मात खा रही थी। बदले वक्त में सरकारी मशीनरी को डाल-डाल के बजाय पात-पात की सोच से आगे बढ़ना होगा। उन्नाव जिले के सफीपुर तहसील के कुसैला गढ़ी गांव की मस्जिद के मौलवी के प्रपत्रों की जांच के लिए 2024 में शिकायत पर पुलिस पहुंची तो उसने पड़ोस की हसनगंज तहसील के कागज दिखा दिए और पुलिस अपना फर्ज पूरी तरह पूरा करने के बजाय मुंह मोड़कर चली गई, जबकि देश अब इस दौर में है कि पुलिस को तुरंत अपने फुट भर के फोन में उसका आधार नंबर फीड करके क्रॉस चेक करना चाहिए था या हसनगंज के संबंधित गांव के प्रधान आदि का उससे नंबर मांगना चाहिए था। नंबर मांगते ही या बात कराने की बात कहते ही वह पैर पकड़ लेता, क्योंकि वह एक रोहिंग्या था। जांच के बाद लोकल सपोर्टर ने उसे भगा दिया था और अब जो आया है, बांग्लादेशी बताया जा रहा है। उन्नाव के ही गंज मुरादाबाद चौराहे की मस्जिद का मौलवी बांग्लादेशी है। यह सिर्फ दो मस्जिद का वृत्तांत है, जबकि जिले के 2000 गांव में करीब 500 मस्जिद-मदरसे बताए जाते हैं इसलिए सुस्त पुलिस व चुस्त पब्लिक को आगे से चपटी नाक वाले काले-काले जहां मिलें, समझ जाएं कि वे बांग्लादेशी हैं व दाढ़ी में कम बाल वाले गेहुंआ रंग के हों तो रोहिंग्या। किसी मौलवी की मस्जिद व मदरसे से निकला यह सफीना अब गांव-गांव पहुंच चुका है इसलिए मेरठ के नए-नवेले सांसद व रामायण के राम अरुण गोविल के विचार को अमली जामा पहनाने का वक्त व शत्रु सामने है, सिर्फ पहचानने की जरूरत है। हाल ही में उन्होंने शून्यकाल के दौरान कहा कि जिस प्रकार देश के हजारों मंदिरों, चर्च व गुरुद्वारों में लाखों कैमरे लगे हैं, उसी प्रकार देश की हर मस्जिद-मदरसे में कैमरे लगाना अनिवार्य किया जाए। इतना ही नहीं, कैमरों की नियमित जांच भी हो। उन्होंने मस्जिद व मदरसे जैसे बड़े सार्वजनिक व सामुदायिक स्थलों के लिए इसे जरूरी बताया था। इससे सुरक्षा व पारदर्शिता बढ़ेगी तो अपराध रोकने में भी मदद मिलेगी। सीसीटीवी लगाना किसी धर्म के विरुद्ध नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में है। आज के दौर में ऐसा न करना जरूर खुद को खतरे में में डालने जैसा है। है। गोविल ने सऊदी अरब का उदाहरण देते हुए कहा कि मक्का-मदीना में भी सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। देश को आतंक के साये से बचाना है तो कैमरों को गुप्त या खुले तौर पर पास के संबंधित थाने से जोड़ना होगा। चूंकि वे वोट बैंक हैं इसलिए विपक्ष हो-हल्ला भी करेगा इसलिए मस्जिद व मदरसों के रास्तों या सामने के घरों पर सरकार अपने खर्चे से सीसीटीवी कैमरे लगाए व स्थानीय निकाय के प्रतिनिधियों की जिम्मेदारी भी बढ़ाए, वरना ईंटें व डंडे मारकर पत्थरबाज तोड़ डालेंगे। ज्ञात हो कि प्रदेश में 2019 में पुलिस और प्रशासन द्वारा कराए गए संयुक्त सर्वे में करीब 10 लाख घुसपैठियों के होने की आशंका जताई गई थी। लखनऊ में दो लाख तो देश में तीन करोड़ बताए जा रहे हैं। इतनी बड़ी संख्या में घुसपैठियों को चिन्हित करने के साथ उनके मूल निवास वाले राज्यों से सत्यापन कराने में लंबा वक्त लगना तय है। अधिकारियों के मुताबिक, अधिकतर घुसपैठिये खुद को पूर्वोत्तर राज्यों का मूल निवासी बताते हैं या जहां रह रहे हैं, उसके बगल की कोई तहसील। सुबूत के तौर पर आधार कार्ड दिखाते हैं, जो कि फर्जी हैं। उन्हें भारत में घुसपैठ के बाद बंगाल, असम व त्रिपुरा आदि के गिरोहों व एजेंटों द्वारा बनाए हुए हैं। घुसपैठियों को चिन्हित करने के बाद बांग्लादेश की सीमा पर ले जाकर खदेड़ा जाता है, उनमें से अधिकतर कुछ किमी दूर जाकर किसी प्रकार दोबारा घुसपैठ कर जा रहे हैं। कई बार तो गहरी साजिश के चलते बांग्लादेश की सेना भी उन्हें अपना नागरिक न मानते हुए इधर धकेल दे रही है। हाल ही में लखनऊ की महापौर के अभियान में संविदा पर नगर निगम में लगे सफाई कर्मियों के प्रपत्र जांचे गए तो सौ के करीब पूर्वोत्तर के कार्डधारक मिले हैं, जिन पर संदेह है कि वे सारे रोहिंग्या या बांग्लादेशी हैं। आगे की कार्रवाई की जा रही है। अब इसी का तोड़ योगी ने निकाला है। मुख्यमंत्री ने हाल ही में उच्चाधिकारियों के साथ बैठक कर प्रदेश में अवैध रूप से रह रहे घुसपैठियों की पहचान करने में तकनीक के इस्तेमाल के निर्देश दिए हैं ताकि फर्जी पहचान पत्र, आधार व दूसरे दस्तावेजों को स्कैन कर कुंडली निकाली जा सके। यह भी जानें कि किस तरह मक्कारों ने भारतीय नागरिकता के फर्जी दस्तावेज पाए हैं और इसमें कौन-कौन शामिल है। घुसपैठियों की बायोमेट्रिक प्रोफाइल में उनका फिंगर प्रिंट और चेहरे की पहचान आदि ली जाएगी ताकि एक बार बाहर भेजने के बाद दोबारा वे देश में न घुस सकें। उनके नाम भी डिटेंशन सेंटर में रखे जाने के दौरान निगेटिव लिस्ट में दर्ज होंगे व इसे देशभर में शेयर किया जाएगा ताकि घुसपैठियों के दोबारा घुसने पर कहीं पनाह नहीं मिले और पनाह देने का गुनाह करने वालों को भी फनाह (ठीक) किया जा सके ताकि आगे कोई अल फलाह न होने पाए व एजेंसियों को कोई जाहिल गुमराह न कर सके। गौरतलब है कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के हस्तक्षेप के बाद जन्म प्रमाण पत्रों का फर्जीवाड़ा 17 जुलाई 2024 को सामने आया था। बेंगलुरू व मुंबई में फर्जी प्रमाण पत्रों के साथ बांग्लादेशी पकड़े गए थे, जिससे पता चला कि घुसपैठियों को भारतीय नागरिकता के कागज देने में दर्जनों संगठित गिरोह लगे हुए हैं। पाकिस्तान सीमा से जुड़े गुजरात, पंजाब और राजस्थान के पते पर बने 500 से अधिक प्रमाण पत्र पकड़ में आए हैं। जोधपुर के ठाकुर विकेंद्र नगर के पते पर बने हैदर के फर्जी प्रमाण पत्र को निरस्त किया गया। बिहार के पीरा बीघा चकंद (गया) के अब्बास अंसारी, झारखंड के सद्दाम हुसैन व मोइन खान, लुधियाना के अली और अहमदाबाद के शेर अली का जन्म प्रमाण पत्र भी निरस्त किया गया। इसी प्रकार सलोन के गढ़ी अलीनगर व इस्लाम नगर के पते पर भी संबंधित नाम के व्यक्ति नहीं मिले। इनमें 2023 में मुंबई से पकड़े गए चार बांग्लादेशियों के नाम भी शामिल हैं। इससे पहले जम्मू में पकड़े गए रोहिंग्या के पास सलोन से ही बने जन्म प्रमाण पत्र मिले थे। जांच में पाया गया कि घुसपैठियों ने पासपोर्ट और नागरिकता के लिए फर्जी जन्म प्रमाण पत्र व आधार आदि बनवाए थे। रायबरेली के ही खीरों में चल रहे विशेष पुनरीक्षण के दौरान मतदाता सूची में बांग्लादेशी का नाम दर्ज मिलने से सनसनी फैल गई। बूथ संख्या 101 के के क्रमांक 1268 में अंकित कमल का नाम दर्ज मिला है। आरोपी को पिछले साल फर्जी पासपोर्ट व अन्य दस्तावेज के साथ पकड़ा गया था। जमानत मिलने के बाद से वह खीरों के मुस्लिम बहुल इलाके में कलकत्ता क्लीनिक चला रहा था। एसआईआर फार्म भरवाने के दौरान ही उसकी पोल-पट्टी खुली तो छद्म नाम वाला कमल दवाखाने में ताला लगाकर भाग निकला। ज्ञात हो कि रायबरेली व उन्नाव पुलिस ने 18 अप्रैल 2024 को चार बांग्लादेशियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा था। इसमें कमल भी शामिल था। खीरों में उसने मकान भी खरीद लिया है। दूसरी ओर, बहराइच से भी बांग्लादेशी, पाकिस्तानी, नेपाली और म्यांमारी के फर्जी आधार कार्ड बनवाने के आरोपी को जेल भेजा गया है तो करीब एक माह पहले कोलकाता से गिरफ्तार अंसार अली मौला की पुलिस कस्टडी रिमांड मंजूर हो गई है। एटीएस के विशेष न्यायाधीश ने छह दिन की रिमांड का आदेश दिया है। अब एटीएस आरोपी से 10 से 15 दिसंबर तक पूछताछ करेगी। एटीएस ने आरोपी को बी वारंट पर कोलकाता से लाकर लखनऊ की जेल में डाला है। रिमांड मिलने के बाद एटीएस अब उसके लैपटॉप व मोबाइल का डाटा और खातों में हुए लेन-देन के बारे में पूछताछ करेगी।

घुसपैठिया समर्थकों के भी सिर पर ‘सर’ का डंडा

चुनाव आयोग का एक लाइन में सीधा सा मानना है कि देश में जिस किसी भी पते पर 10 से अधिक मतदाता दर्ज होंगे वहां टीम भेज कर जांच करानी है। एसआईआर का काम जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा है, वैसे-वैसे खतरनाक खुलासे हो रहे हैं व घोर अनियमिताएं निकलकर सामने आ रही हैं। एक पते पर 45 लोगों के नाम दर्ज पाए गए हैं तो हरियाणा की मतदाता सूची में ब्राजील की मॉडल के लगी फोटो से विभिन्न बूथों पर 22 वोट डालने की खबर जंगल में आग की तरह फैली थी। ऐसे ही कारनामों के कारण सूची की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं। उन्नाव सदर तहसील स्थित पूरन नगर मोहल्ले का मकान नंबर 57 चर्चा में है, जिस पते पर 45 मतदाताओं के नाम सूची में दर्ज हैं। बीएलओ को मौके पर केवल तीन मतदाता मिले, जिनमें घर का मालिक कमलेश भी शामिल है। मामला सामने आने के बाद मौके पर ईआरओ फहद खान पहुंचे। मकान मालिक और पड़ोसियों से बातचीत की तो गड़बड़ी उजागर हुई। अपने देश में वो बातें करीब दो हजार साल से प्रचलित हैं कि भगवान के घर देर है, पर अंधेर नहीं और ऊपर वाले की लाठी में आवाज नहीं होती। दोनों ही कहावतें लगता है कि कुत्तों, सूअरों, गद्दारों, मक्कारों, बड़बोलों, नक्सलियों, घुसपैठियों, देशद्रोहियों व आतंकवादियों के लिए ही कही गई थीं, क्योंकि आज के परिप्रेक्ष्य में उन पर बिल्कुल सटीक बैठ गई हैं। यही लाठी “सर” और सर-2.0 (एसआईआर) के रूप में जब सिर पर पड़ी तो समूचा विपक्ष कराह पड़ा। पहले वाले “सर” के दौरान बिहार में देखने को मिला कि वे रोहिंग्या व बांग्लादेशियों का वोट बैंक हाथ से जाता देखकर बौखला गए थे और अब भी बौखलाए हुए हैं। आगे के चुनाव में हार को साक्षात् देखकर पागल हो उठे थे व विक्षिप्त अवस्था में कुछ भी बक रहे थे, सरकार के नेक कामों की भी निंदा करने लगे। इतना दुःखी हो गए थे कि प्रधानमंत्री को मंच से मां की गाली देने वाले तक को सही ठहराने लगे। पागलपन इतना बढ़ गया था कि बम फोड़कर निर्दोषों की हत्या करने वाले आतंकियों तक को सपोर्ट करने लगे, जिससे जनता की नजर से पूरी तरह उतर गए और फिर उतरते ही चले गए। हरकतें देखकर तो यही लगता है कि विपक्ष ने हिंदुओं को इंसान, देश का व अपना मतदाता ही मानने से इंकार कर दिया है, क्योंकि वे कई साल से कहीं ज्यादा भरोसा मुस्लिम घुसपैठियों पर कर रहे हैं। इसी कारण कोई संदेह नहीं बचा है कि आगे भी उतरते जाएंगे, क्योंकि ये पब्लिक है, सब जानती है और पब्लिक यह भी जान गई है कि विपक्ष ‘उससे’ ज्यादा देशद्रोहियों, देश विरोधियों व आतंकवादियों पर भरोसा करता है। मूर्खता का बड़ा उदाहरण यह है कि जिसका वोट कटा है, वह आपत्ति दाखिल करने व संबंधित अधिकारियों के पास जाकर दावा करने के बजाय घर व शहर छोड़कर भाग रहा है, पर उसका वोट बनवाने के लिए दैनिक रुवाली व किसी-किसी का साप्ताहिक रुदाली कार्यक्रम विपक्ष चला रहा है। उधर, चुनाव आयोग ने मतदाता सूची से नाम काटने के लिए चिन्हित मतदाताओं के मामले में दोबारा जांच के निर्देश सभी जिला निर्वाचन अधिकारियों को दिए हैं। आयोग ने समीक्षा बैठक में इस संख्या को काफी ज्यादा माना है। स्थिति यह है कि अभी तक की रिपोर्ट के अनुसार, करीब तीन करोड़ नाम सूची से हटने हैं, जोकि केरल के मतदाताओं की कुल संख्या से भी ज्यादा है। कई बार कई सियासी दलों के नेता यह संख्या चार करोड़ तक बताते हैं। योगी भी गंभीर हैं और पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा है कि बूथ प्रभारी इस बात पर ध्यान दें, वे आसानी से 200-250 मतदाताओं के नामों का मिलना कर सकते हैं। यूपी के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा ने बताया कि भारत निर्वाचन आयोग के वरिष्ठ उप निर्वाचन आयुक्त मनीष गर्ग की अध्यक्षता में उच्चाधिकारियों के साथ ऑनलाइन बैठक हुई थी, जिसमें प्रदेश के कुल 15.44 करोड़ मतदाताओं के गणना प्रपत्र के सापेक्ष 98.14 प्रतिशत गणना प्रपत्रों के डिजिटलाइजेशन का काम पूरा हो चुका है। इनमें 79.95 प्रतिशत गणना प्रपत्र मतदाता या परिवार के सदस्य के हस्ताक्षर के बाद प्राप्त हुए हैं। 18.48 प्रतिशत गणना प्रपत्रों को असंग्रहीत यानी मृतक, स्थायी रूप से स्थानांतरित, अनुपस्थित और दो जगह वोट वाले मतदाताओं आदि की श्रेणी में चिन्हित किया गया है, जो कि तीन करोड़ से अधिक बनते हैं इसीलिए जोर देकर उक्त मतदाताओं का पुनः सत्यापन कराया गया। किसी भी विवाद से बचने के लिए जिन बूथों का शत-प्रतिशत काम पूरा होता गया, वहां बीएलओ मतदाता सूची राजनीतिक दलों के बूथ लेवल एजेंट (बीएलए) को उपलब्ध कराते रहे। इसी का नतीजा है कि रायबरेली के खीरों में बांग्लादेशी का नाम पकड़ा गया है। एसआईआर के कारणों से हालात भगदड़ के हैं, घुसपैठिये एक शहर से दूसरे शहर सामान लेकर भाग रहे हैं, जिस मोहल्ले में बीएलओ व अन्य अधिकारी पहुंच रहे थे, उन मोहल्लों में भीड़ आधी रह जाती थी। रायबरेली से याद आया कि दिल्ली की एक अदालत के विशेष जज विशाल गोगने ने 11 सितंबर के उस मजिस्ट्रेटी आदेश के खिलाफ दायर पुनरीक्षण याचिका पर कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी और दिल्ली पुलिस से उस याचिका पर जवाब मांगा है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि 1980 में नागरिकता लेने से पूर्व ही सोनिया का नाम नई दिल्ली विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची में जोड़ दिया गया था। ज्ञात हो कि याचिकाकर्ता एड. विकास त्रिपाठी ने दावा किया है कि वह 1983 में भारत की नागरिक बनी थीं, इसलिए 1980 की मतदाता सूची में उनका नाम जोड़ना जालसाजी है। निचली अदालत ने शिकायत को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि मामला अधिकार क्षेत्र से बाहर है। बीते दशकों में सुधी जनों के मुंह से दसियों बार सुनने को मिला है कि चुनाव सुधार और पुलिस सुधार। पुलिस सुथार कुछ हुए हैं, जो कि कुछ हद तक सफल हुए हैं और कुछ का होना बाकी है। चुनाव सुधार शुरू हुए थे और पहली बार आम जनता ने जाना कि देश में चुनाव आयोग जैसी भी कोई संवैधानिक संस्था होती है। काफी संभव है कि पहले लोग सोचते हों कि यह किस चिड़िया का नाम है? बहुतों को याद होगा कि मतदान वाले दिनों की हालत पहले मध्ययुगीन बर्बरता वाली थी। गोली की तड़तड़ाहट, खून-खराबा व हत्या के बीच बैलेट पेपर की लूट होती थी, बूथ लूटे जाते थे और मतदान व पुलिसकर्मी पीटे जाते थे, फिर टीएन शेषन का दौर आया। हजारों बूथों पर पुनर्मतदान के आदेश देकर ऐसी सख्त कार्रवाई की थी कि बड़े-बड़े गुंडों, माफिया, बदमाशों व अपराधियों की पतलून आगे से गीली-गीली व पीछे से पीली-पीली हो गई थी। दोबारा चुनाव कराने में अपराधियों को लाखों रुपए की चोट उस दौर में पड़ती थी, जिससे कराह उठते थे। इस कारण ही मतदान में गुंडई का चोला सांप की केंचुली व फटे नकाब की तरह उतार कर फेंकना पड़ा था। उन्हीं महान नक्श-ए-कदम पर चलते हुए चुनाव सुधार का काम देश में आज भी जारी है। बैलेट पेपर का स्थान ईवीएम ने लिया, उस पर चीरहरण के आरोप लगे तो वीवीपैट की सुविधा ईजाद की गई, उस पर भी आरोप लगे तो चुनाव आयोग ने आरोपों की सही साबित करने के लिए देश के राजनीतिक दलों को न्यौता दिया। साथ ही यह भी कहा कि टेक एक्सपर्ट के साथ आएं और ईवीएम को गलत साबित करें। आखिर साबित हुआ कि हार और अपनी कमियों पर पर्दा डालने व जनता को गुमराह करने के लिए ही ईवीएम को बार-बार दोशी ठहराया जा रहा है। अब आयोग मतदाता सूची के जरिये देश की सफाई का महान व ऐतिहासिक काम करवा रहा है, जिसके कारण खुले सियासी मंचों से मुख्य चुनाव आयुक्त को लोकतंत्र के विभिन्न प्रकार के रक्षक गालियों के साथ-साथ धमकी भी दे रहे हैं, जो कि उनके पागलपन को ही रेखांकित करता है। दरअसल वे समझ ही नहीं पा रहे हैं कि 2014 के बाद से मोदी मैजिक के दौर में देश में ये क्या हो रहा है? वे अपनी नाकामी छिपाने के लिए कभी मोदी, कभी योगी तो कभी चुनाव आयोग को गालियां दे रहे हैं, जबकि ऐसा नहीं है कि मोदी के नेतृत्व में चुनाव हारे नहीं गए हैं। राजस्थान, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश आदि इसका उदाहरण है। उल्टी यात्रा के क्रम में सड़क से शुरू हुई बात आखिर में संसद में पहुंची और दोनों ओर से ‘सर’ को लेकर खूब सिर खपाया गया। लोकसभा में विपक्ष और सत्ता पक्ष में जोरदार बहस हुई। राहुल ने फिर वोट चोरी कहा व इसे सबसे बड़ा राष्ट्रविरोधी कृत्य करार देते हुए इसे भाजपा-आयोग की मिलीभगत बताया और कहा कि इससे आइडिया ऑफ इंडिया यानी भारत की अवधारणा नष्ट हो रही है। 2023 के निर्वाचन कानून का उल्लेख करते हुए कहा कि कांग्रेस की सरकार बनने पर इसमें पूर्वव्यापी प्रभाव से संशोधन किया जाएगा और चुनाव आयुक्तों को कठघरे में खड़ा करेंगे। राहुल ने तेहराया कि सत्तापक्ष ने हरियाणा, महाराष्ट्र और बिहार में जनादेश की चोरी की है और सभी स्वायत्त संस्थाओं को नियंत्रण में ले लिया है। आयोग पर नियंत्रण कर सरकार चुनाव नियंत्रित कर रही है। ईडी व सीबीआई पर नियंत्रण कर लोकतंत्र को कमजोर कर रही है। इस दौरान राहुल ने वीसी, मुख्य चुनाव आयुक्त व चुनाव आयुक्त की नई नियुक्ति की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। उनकी हां में हां मिलाते हुए अखिलेश ने कहा कि चुनाव सुधार के लिए आयोग में नियुक्ति का तरीका बदला जाए। चुनाव आयोग की नियुक्ति निष्पक्ष व पारदर्शी हो और चुनाव वैलेट पेपर से होने चाहिए। साथ ही दावा किया भारत ही नहीं दुनिया भर में ईवीएम पर सवाल उठ रहे हैं। कई विकसित देश जो तकनीक में भारत से आगे हैं, वे ईवीएम नहीं स्वीकार कर रहे हैं। ऐसे में यहां ईवीएम का इस्तेमाल क्यों हो रहा है? चुनाव के दौरान खातों में पैसा भेजकर वोट खरीदे जा रहे हैं। अखिलेश ने कहा कि एसआईआर को लेकर बीएलओ पर काफी दबाव है। यूपी में नी बीएलओ की जान गई है। चुनाव आयोग मृतकों के परिजन को एक-एक करोड़ रुपये और सरकारी नौकरी दे। यूपी में एसआईआर में नहीं माने जा रहे आधार कार्ड को भी लेकर अखिलेश परेशान दिखे। कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने पलटवार किया कि 1975 में रायबरेली में देश की सबसे बड़ी वोट चोरी हुई थी। तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी का चुनाव निरस्त होने पर आपातकाल थोपकर लोकतंत्र का गला घोंटना भी याद दिलाया। मोदी सरकार के आने तक आयोग आठ बार एसआईआर पहले भी करा चुका है। संविधान निर्माता भीमराव आंबेडकर को चुनाव हराने का भी आरोप कांग्रेस पर उन्होंने लगाया। ईवीएम की इज्जत पर आंच आते देखकर भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने कहा कि देश में वोटिंग मशीनें राहुल के पिता व पूर्व पीएम राजीव गांधी ही लाए थे। 1991 में नरसिम्हा राव सरकार ने मतदान के लिए ईवीएम शुरू की। 1961 में समिति ने भी सिफारिश की थी कि धांधली से बचने के लिए मतवान ईवीएम से कराया जाना चाहिए। मनमाने नतीजे नहीं आ रहे हैं तो उसे कठघरे में खड़ा करने वाले खुद जनता के कठघरे में खड़े हैं। कानून मंत्री ने कहा कि आयोग का काम है कि वैध नागरिक ही चुनाव प्रक्रिया में हिस्सा लें। देश के हर व्यस्क नागरिक को मताधिकार मिलेगा, पर रोहिंग्या और बांग्लादेशी को नहीं। एनडीए के cros प्रमुख सहयोगी वलों तेदेपा व जदयू ने कहा कि विपक्ष केवल चुनावी हार के बाद ही ईवीएम में छेड़छाड़ के आरोप लगाता है। यही बात संसद के बाहर राहुल और अपने पिता के नजरिये से असहमति जताते हुए उमर अब्दुल्ला ने कही। केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन बोले कि बंगाल, आंध्र, तेलंगाना, हिमाचल प्रदेश, मप्र, राजस्थान और कर्नाटक में जीते, तब ईवीएम सही थी, लेकिन महाराष्ट्र, हरियाणा या बिहार में अचानक मशीनें खराब हो गईं? जनता इस दोहरे मापदंड को स्वीकार नहीं करेगी।

सुप्रीम कोर्ट दहाड़ा, नहीं रुकेगा एसआईआर

कई बार अर्बन नक्सल आदि सुप्रीम कोर्ट गए एसआईआर रुकवाने, पर उनकी एक नहीं चली और कोर्ट ने साफ कह दिया कि एसआईआर नहीं रुकेगा। आधार दिखाने मात्र से कोई भारत का नागरिक नहीं बनता है और न ही मतदाता। साथ ही पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों में एसआईआर 2.0 में लगे बीएलओ व अन्य अधिकारियों को मिल रही धमकियों पर चिंता जताई और कुछ ही दिन बाद उत्तर प्रदेश में बीएलओ पर जब दबाल की शिकायत पहुंची तो उनकी संख्या व समय सीमा बढ़ाने के भी आदेश शीर्ष अदालत ने दिए हैं। बंगाल के बारे में निर्वाचन आयोग से कहा कि इससे सख्ती से निपटें, वरना अराजकता फैल जाएगी। अदालत ने सूची के गहन पुनरीक्षण में राज्य सरकारों की ओर से सहयोग न करने पर भी चिंता जताई। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत व जस्टिस जॉयमॉल्या बागची की पीठ ने कहा कि सुनिश्चित करना होगा कि एसआईआर बिना किसी गड़बड़ी के जमीनी स्तर पर हो। पीठ ने आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी से कहा कि सहयोग की कमी और बीएलओ के काम में बाधा के मामले हमारे संज्ञान में लाएं, हम उचित आदेश पारित करेंगे। द्विवेदी ने कहा कि सरकारों को सहयोग के साथ सुरक्षा भी देनी चाहिए। अगर सरकार ऐसा करने में नाकाम रहती है तो स्थानीय पुलिस को प्रतिनियुक्ति पर लेने का ही विकल्प बचेगा। स्थिति नहीं सुधरी तो केंद्रीय बलों को बुलाना होगा। उक्त अनुरोध करते एड. वी गिरि ने कहा कि बंगाल में स्थिति ठीक नहीं है। अन्य राज्यों में कोई बाधा नहीं है। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया है कि राज्य आयोग कार्यालय का घेराव इसलिए किया गया, क्योंकि बीएलओ अधिक कार्यभार से थक गए थे और आत्महत्या कर रहे थे। इसे राकेश द्विवेदी ने राजनीतिक बयानबाजी करार दिया तो एक ने यहां तक कहा कि खास जाति व धर्म वाले ही बेहोश हो रहे हैं। रोज 30-35 वोटर की मैपिंग यानी कि महज 10-पांच घरों पर रोज ध्यान देना असंभव काम नहीं है, लिहाजा दबाव की बातें गलत हैं। उन्हीं पर हो सकता है, जिन्होंने शुरू में लापरवाही बरती है। पीठ ने कहा कि यदि किसी कर्मचारी के पास एसआईआर ड्यूटी से छूट मांगने का कोई खास कारण है तो अधिकारी ऐसे अनुरोधों पर विचार करें। ऐसे कर्मचारी के स्थान पर दूसरे कर्मचारी को नियुक्त कर सकते हैं। एड. राकेश द्विवेदी और मनिंदर सिंह ने स्वीकारा कि कुछ बीएलओ कर्तव्य पालन में रुचि नहीं दिखा रहे थे तो नमूने के लिए आयोग ने आपराधिक कार्यवाही का सहारा लिया था। विपक्ष का कहना था कि अधिक दबाव के कारण कई शिक्षक व आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की जान गई है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि राज्य 10,000 के बजाय कार्य फंसता देख 20-30 हजार कर्मी लगा सकते हैं ताकि काम का दबाव कम न रहे। पीठ ने यह भी कहा था कि राज्य सरकारें दायित्व से भाग नहीं सकतीं। अगर कोई कठिनाई आ रही है तो विकल्प उपलब्ध करा सकती हैं। कोर्ट ने कहा कि एसआईआर ड्यूटी के दौरान मारे गए बीएलओ के लिए अनुग्रह राशि के बारे में बाद में भी सुनवाई हो सकती है पीड़ित व्यक्ति या याचिकाकर्ता के आने पर। ज्ञात हो कि शाहजहांपुर की निगोही सीट पर काम में जुटी महिला बीएलओ जब पहुंची तो संदीप व अरविंद यादव ने रोक लिया। लिस्ट आदि छीन ली, विरोध पर गाली-गलौच किया। उसके पिता भी साथ थे, जिन्हें गुंडों से बचाने के क्रम में हरीश यादव हाथ पकड़ कर घर की ओर खींचने लगा। खुद को बचाने के प्रयास में कपड़े भी अस्त-व्यस्त हो गए। युवती की लज्जा भंग हुई। इस बीच शोर सुनकर गांव वालों ने हस्तक्षेप करके बचाया। पुलिस छेड़खानी व मारपीट की धाराओं में कार्रवाई कर रही है तो वे माफी मांगकर बचने के प्रयास में हैं।

हर 10 साल में कराना होता है एसआईआर

यह पहला मौका नहीं है, जब चुनाव आयोग एक व्यापक मतदाता सूची तैयार कर रहा है, पर विपक्ष के दिल में यह डर जरूर पहली बार देखने को मिल रहा है। कायदे से इसे हर दसवें साल किया जाना होता है। कांग्रेस के राज में भी यह कई बार हो चुका है यानी कि तब भी इसे जरूरी समझा गया था। ऐसे किसी भी काम का कोई कैसे विरोब कर सकता है, जो सीधे देश की कानून एवं व्यवस्था से जुड़ा हो। आजादी के बाद से यह काम आठ बार हो चुका है। हालांकि इस बड़े पैमाने के कार्यक्रम के लिए कोई निश्चित समय निर्धारित नहीं है। यह आवविक पुनरीक्षण जब तक नहीं किया जाएगा, चुनाव परिणाम जनभावना को सही ढंग से प्रतिबिंबित नहीं करेंगे। 50 साल से भी पहले एक ब्रिटिश विद्वान ने व्यंग्यात्मक टिप्पणी की थी कि चुनाव उन चीजों में से एक है, जिन्हें भारतीय बहुत अच्छे से संपन्न करते हैं। भारतीय लोकतंत्र के स्थायी रूप से स्थगित या निर्देशित होने की आशंका की पृष्ठभूमि में चुनावी प्रक्रिया की पवित्रता को सार्वजनिक जीवन की एक उद्धारक विशेषता के रूप में देखा जाता था। लोकतंत्र के इस प्राथमिक स्तंभ की अंतिम पुष्टि 1977 में तब हुई, जब आपातकाल की छाया के बावजूद मतदाताओं ने एक अधिनायकवादी शासन को वोट के जरिये सत्ता से बाहर कर दिया था। चुनाव आयोग की क्षमता पिछले आठ दशकों में बार-बार परखी गई है। भारत का चुनावी अनुभव आमतौर पर राजनीतिक प्रणाली की वैधता बनाए रखने में सहायक रहा है। 1971 में एक पराजित पक्ष ने जोर देकर कहा कि सोवियत संघ निर्मित अदृश्य स्याही के उपयोग ने इंदिरा गांधी को शानदार जीत हासिल करने में मदद की। उपग्रह द्वारा ईवीएम में हेर-फेर के अविश्वसनीय दावे 2009 के आम चुनाव के बाद किए गए थे। अब मतदाताओं को इस आधार पर बाहर करने का काम चल रहा है कि वे भारतीय नागरिक नहीं हैं। घुसपैठिया कांड असम व अन्य पूर्वोत्तर राज्यों और बंगाल होते हए पूरे देश में फैल चुका है। संविधान का अनुच्छेद 321 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम चुनाव आयोग को चुनाव कराने व मतदाता सूची बनवाने का विशेष क्षेत्राधिकार देता है इसलिए प्रक्रिया सियासी दखल से दूर रखी जाती है। अब मतदान केंद्रों पर पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती व सीसीटीवी व वीडियोग्राफी जैसी प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल पर भी जोर दिया जाने लगा है ताकि मर्यादा बनी रहे तथा मतवान कर्मियों व मतदाताओं को डराया-धमकाया न जा सके। बंगाल में चल रहे एसआईआर के दौरान सत्तारूढ़ दल का आचरण शर्मनाक रहा है। सटीक मतदाता सूची का अस्तित्व लोकतंत्र की मूल शर्त है और नागरिकों को संविधान द्वारा मिला हुआ हक। मतदाता सूची में दोहरी-तिहरी प्रविष्टियां परिणाम को प्रभावित कर सकती हैं इसीलिए आयोग ने फोटो के साथ मतदाता पहचान पत्र के माध्यम से समस्या को सुलझाने की कोशिश की थी। हालांकि धोखेबाज किसी तरह मृत या स्थायी रूप से स्थानांतरित लोगों के नाम पर वोट डालकर चुनाव प्रणाली को चकमा दे जाते थे। पूर्वी भारत में यह समस्या विकट थी, क्योंकि अधिकांश के चेहरे एक जैसे ही होते हैं। इस बीच राजस्थान ने डिजिटलाइजेशन में पहला स्थान पाया है। ताजा जानकारी के अनुसार, देशभर में 47.5 करोड़ से अधिक यानी 93 प्रतिशत से ज्यादा एन्यूमरेशन फार्म (ईएफ) का डिजिटलाइजेशन पूरा हो चुका है। 12 राज्यों में 99.83 प्रतिशत यानी 50.88 करोड़ से भी अधिक मतदाताओं तक फार्म पहुंचाए जा चुके हैं। देश में लाखों ऐसे मतदाता हैं, जिनका वोट गांव की लिस्ट में भी है और शहर में भी। अगर वे दोनों जगह से फार्म भरते हैं तो कानून की जद में आ सकते हैं। निर्वाचन विभाग दो जगह से एसआईआर फार्म भरने वालों पर कानूनी कार्रवाई का मन बना रहा है। इसका प्रावधान लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 में है। उसे एक साल तक की सजा और जुर्माना हो सकता है। इससे बचने के लिए एक जगह से नाम हटवाना होगा। इसके लिए चुनाव आयोग की वेबसाइट पर वोट डिलीट कराने का विकल्प है। वेबसाइट पर फार्म-7 भरकर ऑनलाइन सबमिट कर सकते हैं। लोगों के मन में सवाल उठ रहा है कि निर्धारित समय सीमा के भीतर फार्म नहीं भर पाए तो लिस्ट से नाम गायब हो जाएगा? यूपी में निर्धारित 11 दिसंबर तक फार्म जमा करना था, नहीं हो पाता चिंता की बात नहीं। कोर्ट के आदेश पर समय सीमा बढ़ा दी गई है। यूपी में ड्राफ्ट सूची का प्रकाशन 16 दिसंबर को होगा। अगर इसमें नाम नहीं आता तो तो है है या घबराएं नहीं। यदि नाम पिछली वोटर लिस्ट में था। फार्म नहीं भरा है बीएलओ ने संपर्क नहीं किया है तो भी जनवरी 2026 तक क्लेम-ऑब्जेक्शन पीरियड के दौरान अपना नाम दोबारा जुड़वा सकते हैं। सतर्क रहकर अपना नाम वोटर लिस्ट में जुड़वा सकते हैं। चुनाव आयोग ने साफ कर दिया है कि फॉर्म न भरने पर कोई जुर्माना या पेनाल्टी नहीं ली जाएगी। हालांकि वेरिफिकेशन के लिए नोटिस मिल सकता है। इस स्थिति में निर्धारित प्रपत्रों में से एक आयोग के अधिकारियों के समक्ष पेश करना होगा। हाथरस पहुंचे डिप्टी सीएम बृजेश पाठक ने बीएलओ की मौत पर कहा कि चुनाव आयोग काम कर रहा है और सरकार पीड़ितों के साथ खड़ी है तथा उन्हें पूरा सहयोग देगी। अगर कोई विशेष शिकायत (उत्पीड़न की) है तो उसकी जांच की जाएगी और सख्त कार्रवाई भी की जाएगी। उधर, हरियाणा में अखिल भारतीय राज्य सरकारी कर्मचारी महासंघ ने एसआईआर में अनावश्यक दबाव से परेशान दो दर्जन से अधिक बीएलओ की मौत का दावा किया। आक्रोशित राज्य कर्मचारियों ने प्रदर्शन किया और कहा कि कुछ बीएलओ ने कम समय में एसआईआर का कार्य पूरा नहीं करने के कारण प्रशासन की प्रताड़ना से परेशान होकर आत्महत्या की तो कई की मानसिक तनाव के कारण हुए ब्रेन हेमरेज व हार्ट अटैक से मौत हो गई। मुरादाबाद जिले के बहेरी गांव में 46 वर्षीय बीएलओ सर्वेश सिंह की आत्महत्या ने दबाव को बहस का मुद्दा बना दिया। परिवार का कहना है कि लगातार फील्ड विजिट, देर रात तक डेटा फीडिंग और समय सीमा के दबाव के चलते 30 नवंबर को यह घातक कदम उठाया था। भोपाल के एक बीएलओ ने कहा कि एक दिन सुबह सात बजे से घर-घर घूमकर फार्म बांट रहे थे। करीब पौने दस बजे अचानक बाएं हाथ में तेज दर्द उठा, जो कुछ ही सेकंड में सिर तक फैल गया। डॉक्टरों ने कहा कि यह दिल का दौरा था और वक्त रहते इलाज मिलने से जान बच गई। काम के दबाव के कारण अगले ही दिन फिर फील्ड पर जाना पड़ा। भोपाल की एक शिक्षिका ने बताया कि सुबह सात बजे निकलते हैं और आने का कोई समय नहीं है। हर घर में चार-चार बार जाना पड़ रहा है। हर दो घंटे में एक बार व्हॉट्सएप ग्रुप में तस्वीर भेजने की अनिवार्यता ने उन्हें और थका दिया है। ऊपर से हर दिन निलंबन की चेतावनी भी मिलती रहती है, जिससे कोई भी टूट सकता है। आम आरोप है बेहूदा संदेशों के कारण बीएलओ में बहुत बेचैनी पाई गई है। उल्लेखनीय है कि एक माह में देश के 12 राज्यों के 321 जिलों के 843 विधानसभा सीटों के 51 करोड़ से अधिक मतदाताओं की जांच करनी है। करीब 5.3 लाख बूथ लेवल अफसर इस काम में लगाए गए हैं। काम के दबाव में मौतें और आत्महत्या की खबरों ने बैठे-ठाले कांग्रेस, समाजवादी पार्टी व टीएमसी समेत कई विपक्षी दलों को मुद्दा दे दिया है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, देश के अलग-अलग राज्यों में अब तक 15 बीएलओ की मौतों को एसआईआर से जोड़ा जा रहा है, जिसे बढ़ा-चढ़ा कर विपक्षी दल व कर्मचारी यूनियनें दावे करती रहती हैं। उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्धनगर (नोएडा), बहराइच और बरेली में काम में लापरवाही का हवाला देते हुए बीएलओपर मुकदमे दर्ज हुए थे, जिन्हें वापस लेने पर विचार हो रहा है। नोएडा में 60 से अधिक कर्मचारियों को नामजद किया गया है।

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