
धार्मिक ग्रंथों के मुताबिक क्षीर सागर से समुद्रमंथन के समय महालक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था। जिसके बाद महालक्ष्मी ने श्रीहरि विष्णु को अपने वर के रूप में स्वीकार किया था। बता दें कि महालक्ष्मी को श्री के रूप में भी जाना जाता है। तमाम धार्मिक ग्रंथों में देवी महालक्ष्मी को सप्त ऋषियों में से एक महर्षि भृगु की पुत्री बताया गया है। महालक्ष्मी का समुद्रमंथन के समय पुनर्जन्म हुआ था। जिसके बाद वह वैकुंठ लोक में वास करने लगी थीं। वहीं महालक्ष्मी ने श्रीहरि विष्णु के श्रीराम अवतार में मां सीता और श्रीकृष्ण अवतार में देवी राधा का अवतार लिया
महालक्ष्मी का समुद्रमंथन के समय पुनर्जन्म हुआ था। जिसके बाद वह वैकुंठ लोक में वास करने लगी थीं। वहीं महालक्ष्मी ने श्रीहरि विष्णु के श्रीराम अवतार में मां सीता और श्रीकृष्ण अवतार में देवी राधा का अवतार लिया था।मां आदिलक्ष्मी इस सृष्टि की सर्वप्रथम माता हैं।मां धनलक्ष्मी धन और संपत्ति प्रदान करती हैं।मां धान्यलक्ष्मी अन्न और आहार प्रदान करने वाली हैं। मां गजलक्ष्मी सभी को शक्ति और सामर्थ्य प्रदान करती हैं।मां संतानलक्ष्मी वंश वृद्धि और संतान प्रदान करती हैं।
मां वीरलक्ष्मी साहस और वीरता प्रदान करने वाली हैं।मां विजयलक्ष्मी सभी शत्रुओं पर विजय प्रदान करने का आशीर्वाद देती हैं।मां ऐश्वर्यलक्ष्मी सभी तरह के भोग-विलास प्रदान करने वाली हैं।मां लक्ष्मी के इन महालक्ष्मी स्वरूपों को अष्टलक्ष्मी के नाम से जाना जाता है। इन अष्टलक्ष्मी के स्वरूपों के अलावा मां लक्ष्मी की अन्य रूपों में भी पूजा-अर्चना की जाती है।मां विद्यालक्ष्मी सभी को ज्ञान और विद्या प्रदान करने वाली हैं।मां राज्यलक्ष्मी राज्य और भू-संपत्ति प्रदान करने वाली हैं।मां सौभाग्यलक्ष्मी सौभाग्य देने वाली हैं। मां वरलक्ष्मी वरदान प्रदान करने वाली हैं।मां धैर्यलक्ष्मी धैर्य प्रदान करने वाली हैं।
लक्ष्मी बीज मन्त्र ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीभयो नमः॥ महालक्ष्मी मंत्र ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मयै नम:॥ लक्ष्मी गायत्री मंत्र ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु पत्न्यै च धीमहि, तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ॐ॥