
भारत की आजादी के बाद इतिहास में सत्ताधारी दल के नेताओं के योगदान का जिक्र होता है। लेकिन कई नेता ऐसे भी होते हैं, जो विरोधी दल के होने के बाद अच्छा-खासा प्रभाव छोड़ जाते हैं। जब भी भारतीय जनसंघ या भारतीय जनता पार्टी की सत्ता रही, तो पंडित दीन दयाल उपाध्याय का जिक्र होता है। आज ही के दिन यानी की 11 फरवरी को पंडित दीन दयाल उपाध्याय का निधन हो गया था। लोग उनको भारतीय जनता पार्टी का गांधी कहते हैं। पंडित दीनदयाल दार्शनिंक और विचारक के रूप में फेमस थे। उनहें भारतीय जनसंघ के सह-संस्थापकों में से एक माना जाता था।
उत्तर प्रदेश के मथुरा के नागदा में एक ब्राह्मण परिवार में 25 सितंबर 1916 को पंडित दीन दयाल उपाध्याय का जन्म हुआ था। लेकिन पंडित दीन दयाल का लालन-पालन उनके मामा-मामी ने किया था। उन्होंने कानपुर से बीए और आगरा में अंग्रजी साहित्य में एमए की पढ़ाई पूरी की थी। फिर साल 1937 में वह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में शामिल हुए और साल 1952 में जनसंघ के महामंत्री बनाए गए।
जनसंघ से जुड़ने के बाद उपाध्याय के मार्गदर्शन में पार्टी संगठन का काम चलता रहा। जनसंघ के जनता पार्टी में विलय के बाद बना राजनीतिक दल भारतीय जनता पार्टी पर पंडित जी की विचारधारा का आज भी असर दिखाई देता है। यह भी कहा जाता है कि जिस जनसंघ को सत्ता में आने में दशकों लग गए, अगर पंडित जी जिंदा होते तो यह बहुत काम पहले ही हो जाता।
दरअसल, मई 1964 में जब पंडित नेहरू की मौत हो गई, तो उसके बाद लाल बहादुर शास्त्री अगले पीएम बनें। फिर भारत और पाकिस्तान का युद्ध शुरू हो गया। युद्ध खत्म होने के समय ताशकंद में शास्त्री जी का निधन हो गया। तब देश की अगली प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी बनीं और पूरे देश में एक तरह का अस्थिरता का माहौल था। साल 1967 के चुनावों में कांग्रेस बहुत कम अंतर से जीती और इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी हुई।
बता दें कि जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कहा था कि ‘मुझे दो दीनदयाल दे दो, मैं पूरे भारत की सूरत बदलकर रख दूंगा।’ उपाध्याय के जनसंघ के अध्यक्ष बनने वाले साल में पहली बार ऐसा हुआ कि भारत के राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारों के बनने का सिलसिला शुरू हुआ।
पंडित दीन दयाल उपाध्याय का शव 11 फरवरी 1968 में वाराणसी के करीब मुगलसराय जंक्शन पर लावारिस स्थिति में पाया गया था। पंडित दीन दयाल उपाध्याय की संदिग्ध हालात में हुई मौत आज भी रहस्य बनी हुई है। बताया जाता है कि उनकी हत्या का इरादा चोरी करना बताया गया है। लेकिन इससे शायद ही किसी को तसल्ली हुई। वहीं जनसंघ के ही एक बड़े नेता ने पंडित दीन दयाल उपाध्याय की मौत को एक राजनीतिक हत्या तक कह दिया था।