गंगा तेरा पानी अमृत

टी. धर्मेन्द्र प्रताप सिंह

संगम में सिमटा वसुधा का कुटुंब यह न सिर्फ अद्भुत, अविश्वसनीय और अकल्पनीय है, बल्कि अद्वितीय भी कि पूरी वसुधा का समागम हो रहा है कर्क रेखा पर। मानो कि जैसे भारत की मानक समय रेखा पर समय आकर ठहर गया है। मकर में सूर्य देव के उत्तरायण होने पर ऐसा लगता है कि जैसे त्रिवेणी के तट पर तीनों लोक उतर आए हैं और ऊपर से पुष्प वर्षा हेलीकॉप्टर नहीं, बल्कि देवता कर रहे हों। पौराणिक कथा कहती है कि कल्पवास के दौरान सभी देवता भी संगम के आस-पास ही होते हैं। सब समय-समय की बात है। पद भी वही है, जनपद भी वही है, पर कद वह नहीं है। कद कहीं बड़ा हो गया है।

दुर्व्यवस्था की राख पर खड़े होकर व्यवस्था से बनाई गई साख ने कद को बहुत ऊंचे प्रतिस्थापित कर दिया है। वह हर छोटी-मोटी बात पर पद की गरिमा के चलते दूसरों की तरह प्रधानमंत्री बोलने नहीं लगते हैं। अलबत्ता, उनके हर काम में एक संदेष होता है, उसी के निहितार्थ तलाशते रहते हैं खबरनवीश व सियासतदां। कई मुद्दों के बीच महाकुंभ नगर पहुंचकर प्रधानमंत्री ने पहली ही डुबकी से कई मुद्दों को डुबो दिया। सनातनियों में ऊर्जा का अतिरिक्त प्रवाह बढ़ गया तो लोग मोदी नाम का नारा लगाते और एक-दूसरे का अभिवादन करते हुए दिखे। लोगों से जो बातचीत कर रहे थे मीडिया कर्मी, उससे साफ लगा कि मोदी और योगी को एक साथ देख उनका संगम नगरी का दौरा गंगा मैया ने सार्थक कर दिया।

दूसरी डुबकी में भगदड़ और संसद में कांग्रेस व सपा के नेताओं की मौतों के आंकड़ों को लेकर की गई बयानबाजी के बाद जो हालात उपजे थे या उपजाने की सियासी कोशिश विपक्ष के द्वारा लगातार की जा रही थी, उसको भी डुबोने (पटाक्षेप) करने में सफल रहे। इस दौरान यदि वह चंद मिनट का समय निकाल लेते हादसे के घायलों व मृतकों के परिजनों से मिलकर दुःख-दर्द बांटने का प्रयास करने का तो एक अलग तस्वीर बन जाती। विपक्षी दलों के पास संभवतः कोई मौका नहीं रहता। हो सकता है कि कैमरे से इतर कहीं पर उनकी इन लोगों से मुलाकात भी कराई गई हो।

प्रोटोकॉल तोड़कर संगम स्नान से उन्होंने ऑल इज वेल का अहम संदेष दिया। वह जब स्नान के लिए पहुंचे थे तो मेला क्षेत्र में 50 लाख श्रद्धालुओं के होने का अनुमान जानकार लगा रहे हैं। 29 जनवरी कीभगदड़ के बाद मोदी के आने से श्रद्धालुओं को कोई दिक्कत न हो, इसके लिए बेहद स्मार्ट प्रोटोकॉल बनाया गया। स्नान व ध्यान के क्रम में प्रधानमंत्री करीब दो घंटे मुख्य मेला क्षेत्र में रहे। इस दौरान किसी को दो सेकेंड के लिए भी नहीं रोका गया। न ट्रैफिक बदलना पड़ा और न ही गंगा भक्तों का स्नान रोकना पड़ा। उक्त बातें दृष्टांत मीडिया हाउस के राजनीतिक संपादक संजय राजन अपने कार्यक्रम “मुद्दे की बात राजन के साथ” में कही। भगदड़ की नई घटना से लगा कि इतिहास खुद को दोहरा रहा है।

1954 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू सिर्फ सैलानी की हैसियत से आए थे तो प्रशासन ने उन्हें खुश करने के लिए लाखों लोगों का मूवमेंट रोक दिया था, जिसके कारण ट्रैफिक खुलते ही एक ही मार्ग पर श्रद्धालु और नागा आमने-सामने हो गए थे। नागाओं को लगा था कि जनता उन पर हमला करने आ रही है तो भगदड़ में दबने से दर्जनों लोगों की जान चली गई थी। मोदी दिल्ली से बमरौली एयरपोर्ट पर उतरे, जहां दोनों उप मुख्यमंत्रियों सहित योगी आदित्यनाथ ने स्वागत किया। अरैल के एक निजी स्कूल में बने हेलीपैड पर हेलीकॉप्टर से उतर कर कार से अरैल घाट पहुंचे। यहां से त्रिवेणी तक स्टीमर से गए और दुर्गा अष्टमी के पावन मुहूर्त में करीब 11:30 बजे संगम में डुबकी लगाकर उसी रूट और मोड से वापसी की। इस दौरान सिर्फ सीएम ही उनके साथ रहे।

दरअसल प्रधानमंत्री यमुना पार कर आए थे व मेला दूसरी ओर लगा था। सवाल उठ सकता है कि प्रधानमंत्री आए भले ही दूसरी ओर से हों, लेकिन स्नान तो संगम में ही किया। महाकुंभ में आए हर श्रद्धालु की भी इच्छा होती है वह संगम पर पहुंचे और डुबकी लगाए इसलिए सुबह से रात तक लगातार भीड़ रहती है। इस दौरान निगरानी के लिए हेलीकॉप्टर तैनात रहा तो 2750 सीसीटीवी से मॉनीटरिंग की जा रही थी। काले कुर्ते पर भगवा वस्त्र पहने पीएम ने डुबकी के बाद सूर्य देव को अर्घ्य दिया। हाथ-गले में रुद्राक्ष की माला था, जिसे भी पांच मिनट तक फेरा। संगम नोज पर गंगा पूजन किया। दूध अर्पित कर साड़ी चढ़ाई। पौष अमावस्या के अमृत स्नान के दिन हादसे के बाद कयास लगाए जा रहे थे कि शायद पीएम न आएं और लाखों श्रद्धालुओं ने भी यात्रा का विचार त्याग दिया हो।

दूसरे, बजट, संसद व चुनाव आदि की व्यस्तता भी थी। कयासों और व्यस्तता को धता बताने का ही नाम है नरेंद्र दामोदर दास मोदी। हालांकि भगदड़ को लेकर कई तरह के इनपुट सामने आ रहे हैं, जिनमें एक प्रमुख है कि कुछ लोगों के समूह ने जान-बूझ कर एक साजिश के तहत भगदड़ जैसा माहौल क्रिएट किया, जिसकी परिणति हादसे के रूप में सामने आई थी। इसमें जहां 30 श्रद्धालुओं की मौत हो गई, वहीं 60 लोग घायल थे, जिनमें से अधिकांश घर जा चुके हैं। मुश्तैद प्रशासन ने किसी को हंसने का मौका नहीं दिया। इसी देश में करोड़ों लोग हैं, जो बदनामी का सिर्फ एक मौका ढूंढ़ रहे थे कई हफ्ते से। चूंकि जनहानि शून्य रही तो सोचा जा सकता है कितने समर्पित लोग करोड़ों लोगों की सेवा में जुटे हुए हैं, जो न दिन को दिन समझ रहे हैं और न रात को रात।

मतलब साफ है कि वे सिर्फ तन से नहीं, बल्कि मन से ड्यूटी कर रहे हैं। पता चला है कि मौके पर कुछ गाड़ियां खड़ी पाई गई थीं, जिनके मालिकों का पता लगाया जा रहा है। कहते हैं कि भगदड़ की एक वजह यह भी हो सकती है। बहरहाल अब पूरा मामला न्यायिक जांच के हवाले है। लगता है कि कुछ चौंकाने वाला नतीजा रिपोर्ट में देखने को मिलेगा। शायद ऐसे ही कुछ कारणों से सीएम को कहना पड़ा है कि जांच को हादसे की तह तक ले जाएंगे, साजिश करने वाले बेनकाब होंगे। उन्होंने साफ कहा कि कांग्रेस और सपा वाले तो अर्से से चाहते थे कि कोई बड़ी घटना हो जाए। प्रशासन की सक्रियता से जब हालात काबू हो गए और बड़ा हादसा नहीं हुआ तो अब संसद में उक्त द्वय दैत्य पूरी बेशर्मी के साथ गलत बयानबाजी कर महाकुंभ में हुई मौतों पर परिजन को मरहम लगाने और मातमपुर्सी के बजाय मौत का आंकड़ा बढ़ाकर मौज ले रहे हैं। लाशों पर रोटियां सेकने से सत्ता नहीं मिलती। आंकड़ों का यह खेल उन्हें महंगा पड़ेगा। आठ को ही देख लेना।

बातें हैं, बातों का क्या? बात से बात निकलती है तो दूर तलक जाती है, जितने मुंह और उतनी बातें। बात-बात में बात बढ़ जाती है। इस बीच एक बात यह भी निकल आ रही है कि महाकुंभ में कुछ तो गड़बड़ है। अभी तक जो बीते 25 दिन में करीब 50 करोड़ श्रद्धालु पहुंच चुके हैं, वे सब के सब भले ही गंगा भक्त रहे हों, लेकिन हर गंगा भक्त योगी का भी भक्त हो, यह कतई जरूरी नहीं हैं। इनमें से करोड़ों किसी न किसी कारण योगी को नीचा दिखाने के लिए प्रयासरत हैं। यह अगर किसी साजिश का हिस्सा है तो बहुत बड़े स्तर से होगा और यदि शरारत का हिस्सा है तो जरूर आका को खुश करने के लिए ये घटनाएं कारित की जा सकती हैं क्योंकि एक महिला, जिसका बच्चा घटना के बाद गंभीर है, ने कैमरे पर कहा कि वह मदद के लिए चिल्ला रही थी तो कुछ लोग मदद के बजाय हंस रहे थे।

धुआं उठा है तो कहीं न कहीं राख में दबी चिंगारी भी हो सकती है इसीलिए न्यायिक आयोग का गठन कर दिया गया है। उधर, धमकी भी मिल चुकी हैं कई। जांच आयोग, प्रशासन, शासन और प्रबंधन के लिए एक सवाल है। यदि इतने लोग सिर्फ अफवाह से मर जा रहे हैं तो किसी घटना को अंजाम देने की जरूरत ही क्या है? दूसरी ओर, राम मंदिर की तरह मुहूर्त पहले से ही कुछ गड़बड़ लग रहा था, क्योंकि जनवरी के चार हफ्तों में आग लगने की छोटी-बड़ी चार घटनाएं हो चुकी हैं। संगम तो

संगम है, उसे तो चार किमी में फैलाकर 40 घाट नहीं बनाए जा सकते हैं, लेकिन प्रवाह की दिषा में लंबाई और बढ़ाकर प्रचार कर लोगों को जरूर बचाया जा सकता है। कुछ तो करना ही होगा क्योंकि अभी से है ये हाल तो आगे न जाने क्या होगा? 12 साल बाद जब अगला कुंभ होगा तो एक अरब के लिए व्यवस्था करनी होगी और आजादी के सौवें साल में तो डेढ़ अरब का भारत पहुंचेगा कुंभ मेला, जिसे 1500 वर्ग किमी या चार के बजाय 8000 हेक्टेयर में सेवा और सुविधा देने के लिए किसी भी मुख्यमंत्री व मशीनरी को पूरे पांच साल लगाने होंगे इसलिए कोई न कोई तोड़ तो निकालना ही होगा।

सड़कों व ट्रेन में जब आज जगह नहीं है और श्रद्धालुओं के लाखों वाहनों के कारण 150-200 किमी दूर के काशी, अयोध्या, जौनपुर, बांदा, बाराबंकी, फतेहपुर, रायबरेली, लखनऊ व कानपुर की जाम ने हालत खराब कर रखी है तो 2037 में 45-50 करोड की व्यवस्था जलमार्ग से करनी पड़ेगी, क्योंकि 45-50 करोड़ के लिए की गई रेल-बस व पार्किंग की व्यवस्था अंततः ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रही है। अमृत काल की अमृत बेला में अमृत स्नान के लिए संगम घाट पर ही सो रहे लोगों पर एक अफवाह के चलते भीड़ कूद पड़ी थी और इतने लोग अमृत धाम सिधार गए। एक ओर घायल नवजीवन के लिए संघर्ष कर रहे थे व करीब ढाई दर्जन शवों को घर भेजने के लिए प्रयास किए जा रहे थे तो दूसरी ओर आठ-10 करोड़ लोग उन्हीं 12-14 घंटे में मोक्षदायिनी में पुण्य की डुबकी लगा रहे थे।

इसी को कहते हैं कि जीवन चलने का नाम, जो कि हर हाल में चलता रहता है। तीर्थराज प्रयाग में गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती नदियों का संगम ही नहीं होता है, बल्कि भारत के विभिन्न प्रदेशों व क्षेत्रों की पचासों संस्कृतियों का मिलन गवाह न होकर, दुनिया के पचासों देशों की संस्कृतियों का मिलन स्थल बन गया है। मेला क्षेत्र के कमोबेश हर टेंट में एक अलग संस्कृति के दर्शन। यह जितना सुनने में अद्भुत है, उससे कहीं ज्यादा देखने में। करोड़ों श्रद्धालु सौ-दो सौ व हजार-दो हजार किमी से मोटी रकम खर्च कर संगम नहाने आए हैं तो सिर्फ गंगा या यमुना नहाकर क्यों जाएंगे? यदि यही करना था तो पीछे की करीब हजार किमी की लंबाई में कहीं भी नहाकर पुण्य अर्जित कर लेते।

देश-विदेश से हजारों वीआईपी, वीवीआईपी एवं सेलेब्रिटी को न्योता देकर कुंभ स्नान के लिए बुलाया गया, हजारों आए भी। कई लोग तो विवादों को जन्म देकर निकल लिए तो हजारों लोग छाप छोड़ने में सफल रहे। कोई बिहार से साइकिल से चला आया। अखिल विश्व नहीं, बल्कि अखिल ब्रह्मांड के सबसे बड़े आयोजन में दर्जनों मुस्लिम एवं बौद्ध देशों के सनातनी तो बीसियों ईसाई देषों के करोड़ों लोग श्रद्धा न सही तो सिर्फ कौतूहल के कारण स्नान के लिए पहुंचे और अब भी पहुंच रहे हैं। पाकिस्तान के 68 लोगों ने कल ही स्नान किया है। नेपाल के निरंजनी अखाड़े के संत नौ माह में 750 किमी पदयात्रा करके तीर्थराज पहुंचे तो स्विटजरलैंड के भक्त हिमाचल प्रदेष से पैदल चलकर पहुंचे।

कई विदेशी सनातन अपनाते नजर आए। कहां तक और किन-किन देशों के नाम गिनाए जाएं? सरकार आंकड़ा दे रही थी कि करीब 40-45 करोड़ श्रद्धालु कुंभ में आएंगे, पर 50 करोड़ का आंकड़ा पार हो चुका है। इसमें दुनिया के दूसरे बीसियों देशों के करोड़ों लोग भी शामिल हैं तो दर्जनों देशों के राजनयिक और वीवीआईपी। कई शासना व राष्ट्राध्यक्ष भी पहुंते। भूटान नरेश ने भी योगी के साथ स्नान किया और दुनिया के बड़े कलाकार इतने अद्भुत व विशाल आयोजन की भूरि-भूरि प्रशंसा ही करते नजर आए हैं। कुछ कमियां भी रह गई होंगी, जिन्हें धोने के लिए योगी का रुंधा गला, सूजी हुई आंखें और भर्राई आवाज ने दूर कर दिया है।

प्रयोग धर्मिता के इस युग में प्रयोगों से घबराना क्या? एक प्रयोग यह भी करके देखना चाहिए था कि सारे 40-50 करोड़ जो श्रद्धालु आए, उन्हें बुलाने पर 240 करोड़ खर्च करना जरूरी है या उनके दिल में गंगा जी व सनातन को लेकर दबी-कुचली कोई चिंगारी पहले से है या सब के सब न्योता, निमंत्रण कार्ड, रोड शो, करीब डेढ़ सौ करोड़ के पीआर व विभिन्न विभागों के दसियों करोड़ के होर्डिंग, वाल-वाहन स्टीकर व विज्ञापन के बाद ही उनमें श्रद्धा पैदा हुई है या पहले से भी दिल में कुछ था। लोकसभा चुनाव (प्रचार) की तरह 45 दिन के महाकुंभ में यदि आंकड़ा 45 करोड़ (सीट) के नीचे जाता है तो समझ लीजिए कि छोटी-छोटी घटनाओं ने मिलकर बड़ा खेला कर दिया है। अभी दो हफ्ते का समय कुंभ में बचा है और आंकड़ा पार तो बेड़ा भी पार।

धर्म संसद में सनातन बोर्ड की मांग

दरअसल धर्म संसद में सनातन बोर्ड की मांग के पीछे अहम वजह है। बड़े-बड़े मठ व मंदिरों का अर्थ प्रबंधन। उनके अरबों-खरबों की संपत्ति व चढ़ावे का इस्तेमाल कैसे सनातनियों के हित में किया जाए आदि बिंदुओं पर चर्चा की गई। मसलन गरीब सनातनी के रोजी-रोजगार से लेकर अस्पताल और स्कूल आदि की सुविधाएं मुहैया कराना ही उद्देष्य है ताकि जरूरतमंद हिंदू धर्मावलंबी धर्म परिवर्तन के लिए सोच भी न सके, क्योंकि उक्त मदद करके ही धर्मांतरण के लिए प्रेरित किया जाता रहा है। दूसरे सरकार उक्त की आमदनी देखकर काबिज होना चाहती है, पर दूसरे धर्मो के स्थलों के बारे में ऐसा कभी नहीं सोचती है। लगातार हिंदू राष्ट्र की बात भी मौका मिलने पर संत वृंद रखते रहे हैं, लेकिन संविधान की मूल भावना पंथ निरपेक्षता के कारण संभव नहीं लगता है, पर सनातन बोर्ड की बात भविष्य में परवान चढ़ते हुए जरूर दिख सकती है। धर्म संसद में प्रस्ताव पास हुआ है कि सीधे केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा जाए। किसी भी धर्म या समुदाय या धर्मस्थल की संपत्ति को कानून के दायरे में लाने के बाद देशहित में उसका बेहतर इस्तेमाल हो सकेगा, क्योंकि अभी तक खरबों कैश व खरबों की संपत्ति डंप पड़ी है। अभी देखिए, आगे होता है क्या? फिलवक्त तो बुद्धिजीवियों में गर्मा-गर्म बहस और नफे नुकसान के कयास का दौर जारी है।

पं. नेहरू आए थे, पर नहीं छुआ था गंगाजल

महाकुंभ को लेकर इतिहास में एक ऐसा काला सच भी दफन है, जिसे संगम में ही प्रवाहित करने की बहुत कोशिश की गई, पर हो नहीं सका, क्योंकि फटे कपड़े में पहुंचे एक फोटोग्राफर को किसी तरह से तस्वीर खींचने में उस दिन सफलता मिल गई थी। साल था 1954। यानी कि आजाद भारत का पहला प्रयागराज (तब इलाहाबाद) कुंभ था और तारीख थी तीन फरवरी व तिथि थी कुंभ स्नान का खास दिन मौनी अमावस्या। लाखों लोग संगम पहुंचे हुए थे। सुबह करीब नौ बजे का वक्त था। बारिश की वजह से कीचड़ और फिसलन थी। अचानक ट्रैफिक खोलने से नियम ध्वस्त हो गए और लोग वन वे सड़क पर दोनों तरफ से भागने लगे। इसी बीच खबर फैली कि प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू आए हैं। उन्हें देखने के लिए भीड़ टूट पड़ी तो दूसरी ओर इस बात से अंजान बनकर स्नान के लिए नागा संन्यासी जा रहे थे। अपनी तरफ भीड़ आती देख तलवार और त्रिशूल लेकर मारने दौड़ पड़े। भगदड़ मच गई।

चंद भाग्यशालियों को छोड़ दें तो भीड़ का सीधा नियम है, जो एक बार गिरता है तो फिर वह कभी उठ नहीं पाता है। जान बचाने के लिए लोग बिजली के खंभों पर चढ़कर तारों पर लटक गए। बताते हैं कि भगदड़ में असमय ही करीब एक हजार लोगों की मौत हो गई थी। बेषर्मी की हद तब हो गई थी, जब उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से कहा गया कि कोई हादसा नहीं हुआ, लेकिन उस फोटोग्राफर की एक तस्वीर ने अगले दिन के अखबार में जगह बनाकर सरकार को झूठा साबित कर दिया था। इसके बाद संगम से लेकर दिल्ली तक राजनीतिक दलों ने हंगामा खड़ा कर दिया था। संसद में नेहरू को बयान देना पड़ा। करीब 65 साल बाद 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उसके लिए पं. नेहरू को जिम्मेदार ठहराया था, तब कहीं मौजूदा पीढ़ी जान पाई, वरना करोड़ों लोगों ने उसके बारे में सुना ही नहीं था। चूंकि वह आजाद भारत का पहला कुंभ मेला था, लिहाजा सूबे की सरकार ने तैयारियों में अपनी समझ में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी। यहां तक कि संगम के करीब ही अस्थायी रेलवे स्टेशन बनाया गया था। बड़ी संख्या में टूरिस्ट गाइड भी तैनात किए गए थे।

पहली बार कुंभ में करीब हजार बिजली के खंभे लगाए गए थे व नौ अस्पताल खोले गए थे। उस समय कुंभ में 40-45 लाख श्रद्धालुओं के शामिल होने का अनुमान जताया गया था, जो कि सात दषक बाद बढ़ते-बढ़ते 40-45 करोड़ तक पहुंच गया है। यह सौ गुना है। आंकड़े बताते हैं कि तब से लेकर आज तक दुनिया का यह सबसे बड़ा मेला बना हुआ है। अब तो 40-45 लाख श्रद्धालु सिर्फ विदेषी से आते हैं। ध्यातव्य है कि एनआरआई का आंकड़ा इससे इतर है। उस दिन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के साथ प्रधानमंत्री नेहरू भी कुंभ पहुंचे थे। यह अपने आप में अनूठा उदाहरण है कि राष्ट्रपति रहते हुए उन्होंने महीने भर संगम क्षेत्र में कल्पवास भी किया था। गांधीवादी लेखक राजगोपाल पीवी अपनी किताब ‘मैं नेहरू का साया था’ में लिखते हैं- उस रोज मौनी अमावस्या थी।

लाल बहादुर शास्त्री ने पं. नेहरू से कहा था कि प्रयाग जाएं और कुंभ में स्नान करें। इस प्रथा का पालन लाखों लोग करते रहे हैं। आपको भी करना चाहिए। नेहरू का जवाब था कि जाऊंगा, पर तय कर लिया है कि नहाऊंगा नहीं। पहले मैं जनेऊ पहना करता था। फिर उतार दिया। यह सच है कि गंगा मेरे लिए बहुत मायने रखती हैं। गंगा भारत में लाखों लोगों के जीवन का हिस्सा हैं, लेकिन कुंभ के दौरान स्नान नहीं करूंगा। राजगोपाल लिखते हैं कि उस रोज सुबह नेहरू नाव में बैठे। परिवार के लोग भी साथ थे। सभी ने संगम में डुबकी लगाई, लेकिन नेहरू ने खुद पर गंगाजल तक नहीं छिड़का था। सीनियर फोटो जर्नलिस्ट एनएन मुखर्जी 1954 के कुंभ में मौजूद थे।

1989 में मुखर्जी की आंखों देखी रिपोर्ट ‘छायाकृति’ नाम की हिंदी मैगजीन में छपी। इसमें मुखर्जी ने लिखा है कि प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के एक ही दिन संगम पहुंचने से यह दुर्व्यवस्था हुई थी, क्योंकि पुलिस व प्रशासनिक अधिकारी उनके आगे-पीछे व्यवस्था में व्यस्त हो गए थे। संगम चौकी के पास एक टावर पर खड़ा होने के कारण वह सब कुछ क्लिक करने में सफल हो सका था, जो किसी के पास नहीं था। करीब 10:20 पर राजेंद्र प्रसाद और नेहरू की कार त्रिवेणी की तरफ से आई और किला घाट की तरफ निकल गई।

स्नान करने वाले घाट पर बैरिकेड लगाकर बड़ी संख्या में लोगों को रोका गया था। नेहरू के जाने के बाद श्रद्धालु बैरिकेड तोड़कर घाट की तरफ तेज गति से दौड़ने लगे। उसी रोड पर दूसरे छोर से नागा संन्यासियों का जुलूस आ रहा था। भीड़ के कारण जुलूस बिखर गया। बैरिकेड की ढलान से लोग ऐसे गिरने लगे जैसे तूफान में खड़ी फसलें गिरती हैं, जो गिरा, वह फिर उठ नहीं सका गिरा ही रह गया और कुचलने से सैकड़ों की जान चली गई। चारों तरफ से बचाओ-बचाओ की चीखें गूंज रही थीं। वह कहते हैं कि कई लोग तो कुएं में गिर गए थे। खुद को बचाने के लिए लोग न बच्चों पर पैर रखने में दया कर पा रहे थे और न ही महिलाओं पर।

कोई तीन साल के बच्चे को कुचलते हुए जा रहा था तो कोई बिजली के तारों पर झूलकर खुद को बचा रहा था। तस्वीर खींचने के चक्कर में खुद भी भगदड़ में गिरे हुए लोगों के ऊपर गिर गया। कुल मिलाकर उस हादसे में एक हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे। अखबार के साथी डरे हुए थे कि मुखर्जी भी हादसे का शिकार तो नहीं हो गए। दोपहर करीब एक बजे किसी तरह दफ्तर पहुंचा तो अखबार के मालिक ने गोद में उठा लिया व जोश में चीख पड़े ‘नीपू हैज कम बैक अलाइव। नीपू जिंदा लौट आया है, तब उन्हें बताया कि हादसे के फोटोग्राफ्स भी लाया हूं। हादसे के बाद सरकार ने कहा कि हजार लोगों के मारे जाने की खबर झूठी है। कुछ भिखारी मरे हैं।

अधिकारियों को तस्वीरें दिखाईं, जिसमें गहने पहने महिलाएं भी थीं, जो तस्दीक कर रही थीं कि मरने वालों में हर वर्ग के श्रद्धालु थे। प्रयाग के सीनियर जर्नलिस्ट और मुखर्जी के साथ काम कर चुके स्नेह मधुर ने कहा था कि अस्सी के दशक में दादा ने 1954 कुंभ में मची भगदड़ का किस्सा सुनाया था। नेहरू के आने के घंटों पहले ही मूवमेंट रोक दी गई थी, जिससे निरंतर श्रद्धालुओं का दबाव बढ़ता जा रहा था। आम लोगों के साथ हजारों नागा साधु भी घोड़ा गाड़ी, हाथी, ऊंट लिए हुए घंटों इंतजार करते रहे थे। दोनों तरफ जनसैलाब जमा था तो बीच में नेहरू की कार थी। नेहरू और बाकी वीवीआईपी लोगों की कार जब गुजर गई तो बिना किसी योजना के भीड़ को छोड़ दिया गया। प्रशासन की तरफ से यह बड़ी चूक थी। इंतजार से परेशान लोग दोनों तरफ से हजारों की संख्या में एक ही सड़क पर आमने-सामने आ गए।

भगदड़ मच गई और इतना बड़ा हादसा हो गया था। अगले दिन चार फरवरी को अमृत बाजार पत्रिका अखबार में हादसे की खबर छपी। एक तरफ भगदड़ में लोगों के मारे जाने की खबर और दूसरी तरफ राजभवन में राष्ट्रपति के स्वागत में रखी गई पार्टी की तस्वीर। सरकार ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं, अखबार को खंडन छापना चाहिए। स्नेह मधुर के मुताबिक हादसे के दूसरे दिन प्रशासन शवों का ढेर बनाकर उन्हें आग से जलाने में व्यस्त रहा तो लोग उसी ढेर में अपनों को ढूंढ़ना चाहते थे, पर उन्हें मौके तक जाने ही नहीं दिया गया था। किसी भी फोटोग्राफर या पत्रकार को भी वहां जाने की इजाजत नहीं थी। चारों तरफ बड़ी संख्या में पुलिस मुस्तैद थी और बारिश हो रही थी।

ऐसे में मुखर्जी एक गांव वाले की वेशभूषा में छाता लेकर वहां पहुंचे। उनके हाथ में खादी का झोला था, जिसके भीतर उन्होंने छोटा सा कैमरा छिपाया हुआ था। झोले में एक छेद कर रखा था ताकि लेंस न ढकने पाए। मुखर्जी ने पुलिस वालों से रोते हुए कहा कि आखिरी बार दादी को देख लूं। सिपाहियों के पैर परों गिरकर मिन्नतें करने लगे, तब एक पुलिस अधिकारी ने जल्दी लौटने की शर्त पर जाने दिया। वह तेजी से शवों के ढेर की तरफ दौड़े व चारों ओर घूमकर दादी को ढूंढ़ने के नाटक के क्रम में गिरती जलती लाशों की फोटो खींचने में सफल रहे थे। अगले दिन अखबार में जलती हुई लाशों की फोटो छपी। फोटो देख उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत गुस्से से लाल हो गए व पत्रकार को गाली देते हुए कहा था कि कहां है वह ह… फोटोग्राफर।

1989 में छपी ‘छायाकृति’ मैगजीन में भी इस किस्से का जिक्र है। कुछ पुछल्लों व दुमछल्लों ने दावा किया कि हादसे के दिन पं. नेहरू कुंभ में मौजूद नहीं थे। बीबीसी में छपी रिपोर्ट में हादसे के वक्त मौजूद रहे नरेश मिश्र ने बताया था कि पं. नेहरू हादसे से एक दिन पहले प्रयाग पहुंचे थे और संगम क्षेत्र में तैयारियों का जायजा लेने के बाद दिल्ली लौट गए थे। राष्ट्रपति संगम क्षेत्र में ही थे और सुबह के वक्त किले के बुर्ज पर बैठकर दशनामी संन्यासियों का जुलूस देख रहे थे। हालांकि कई लेखक व पत्रकारों के अलावा 15 फरवरी 1954 को खुद नेहरू ने संसद में माना था कि हादसे के वक्त कुंभ में मौजूद थे, पर किले की बालकनी में। वहां खड़े होकर कुंभ आए श्रद्धालुओं को देख रहा था। अनुमान लगाया गया था कि कुंभ में 40 लाख लोग पहुंचे हुए थे। दुःख की बात है कि जिस समारोह में इतनी बड़ी संख्या में लोग जुटे थे, वहां ऐसी घटना हो गई और कई लोगों की जान चली गई।

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