
मुंबई। एकता कपूर ने जो कहा है, वह बॉलीवुड और उसकी क्रिएटिव अप्रोच पर एक दिलचस्प बहस को जन्म दे सकता है। हंसल मेहता और अनुराग कश्यप को आमतौर पर ऐसे फिल्ममेकर माना जाता है जो कंटेंट और आर्टिस्टिक विज़न को ज्यादा महत्व देते हैं, जबकि एकता कपूर की पहचान मुख्य रूप से कमर्शियल और मास-ओरिएंटेड कंटेंट बनाने के लिए होती है।
अगर देखा जाए, तो दोनों ही अप्रोच सही हो सकती हैं—एक तरफ आर्ट की अहमियत है, तो दूसरी तरफ इंडस्ट्री के लिए फंडिंग और बिज़नेस का पहलू भी जरूरी है। एकता का यह कहना कि “अगर पैसों से ज्यादा आर्ट पर फोकस किया जाए, तो बॉलीवुड भी हॉलीवुड जैसी क्वालिटी दे सकता है,” काफी हद तक सही है, लेकिन सवाल यह भी है कि इंडस्ट्री में प्रॉफिटेबल मॉडल के बिना बड़े प्रोजेक्ट्स कैसे बनाए जाएंगे?
नेटफ्लिक्स पर वेब सीरीज आई है ‘एडोलेसेंस’। इसकी चर्चा हर ओर हो रही है। यहां तक कि डायरेक्टर अनुराग कश्यप तक इस सीरीज के मुरीद हुए नजर आए। साथ ही 15 साल के लड़के ओवेन ने जो इसमें किरदार अदा किया, उनकी परफॉर्मेंस के अनुराग कायल हो गए। हंसल मेहता ने भी एक पोस्ट के जरिए लिखा कि बॉलीवुड को रीसेट होने की जरूरत है।
एकता ने लिखा- जब इंडियन क्रिएटर्स इस बात पर रोते हैं कि हमारे इंडियन कॉन्टेंट में अब दम नहीं रहा है, मुझे ये चीज खराब लगती है। वो लोग इंटरनेशनल टीवी सीरीज और फिल्मों की तारीफ कर रहे हैं। मुझे सोच में पड़ गई हूं कि अगर वो ऐसा कर रहे हैं तो क्या ये उनका ईगो है, गुस्सा है या फिर वो अपने दिमाग में गलत धारणा हमारे सिनेमा को लेकर बनाते जा रहे हैं। जब ‘सुपरबॉयज ऑफ मालेगांव’ और मेरे जिगरी दोस्त हंसल मेहता की फिल्म ‘बकिंघम पैलेस’ थिएटर्स में चल नहीं पाईं तो क्या हम यहां सही चीज को दोष दे सकते हैं? ऑडियन्स की वजह से ये फिल्में नहीं चल पाईं। पर ये भी बात है कि इसमें रियल लोग भी आते हैं जो कॉन्टेंट को पसंद करते हैं, लेकिन जब हम ऑडियन्स को दोष देते हैं तो उसमें वो लोग भी पिस जाते हैं, जिन्हें फिल्म पसंद आई।