दमनक चतुर्थी : चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी

दमनक चतुर्थी की प्राचीन कथा के अनुसार, एक नगर में एक राजा राज करता था, जिसके दो पत्नियां थीं और प्रत्येक पत्नी के एक-एक पुत्र थे। एक रानी के पुत्र का नाम गणेश था और दूसरी रानी के पुत्र का नाम दमनक था। दोनों बच्चों का पालन-पोषण बहुत अच्छे से हुआ, लेकिन उनके जीवन में एक अंतर था।

जब गणेश अपने ननिहाल जाता था, तो वहां सभी उसे अत्यधिक प्रेम करते थे और उसका बहुत ध्यान रखते थे। ननिहाल में उसे ढेर सारी खुशियां और सम्मान मिलता था। दूसरी ओर, दमनक जब भी अपने ननिहाल जाता था, तो उसे वहां पर कोई प्रेम नहीं मिलता था। उसके मामा और मामियां उससे घर के सारे काम करवाते और उसके साथ बुरा व्यवहार करते थे। दमनक का ससुराल में हाल बिल्कुल विपरीत था। वहां भी उसे कोई विशेष सम्मान नहीं मिला और न ही उसे कोई सुखद अनुभव हुआ। दमनक बहुत दुखी था, लेकिन उसकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ।

जब दमनक अपने ससुराल जाता था, तो वहां के लोग उसकी कोई खास खातिरदारी नहीं करते थे। उसे सोने के लिए भी उचित स्थान नहीं दिया जाता था, और बहाने से उसे घोड़ों के बाड़े में सोने के लिए कहा जाता था। इसके विपरीत, गणेश जब अपने ससुराल जाता, तो वहां उसकी बहुत अच्छी खातिरदारी होती और उसे ढेर सारे उपहार और विशेष भोजन मिलते थे। लेकिन दमनक हमेशा खाली हाथ ही लौट आता था, उसे कभी भी कुछ नहीं मिलता था।

बुजुर्ग महिला को इन दोनों की स्थिति का भली-भांति पता था, क्योंकि वह उन्हें बचपन से देखती आ रही थी। दमनक की दयनीय स्थिति को देखकर वह बहुत दुखी होती थी। एक दिन शाम को भगवान शिव और माता पार्वती संसार के दुख-सुख को जानने के लिए पृथ्वी पर आते हैं। उस समय वह बुजुर्ग महिला उनके मार्ग में आकर उनके सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो जाती है और भगवान से दमनक और गणेश के बारे में सारी कहानी बता देती है। वह भगवान से पूछती है कि आखिर क्यों बचपन से ही दमनक को अपने ननिहाल से सुख नहीं मिल पाया और अब उसे ससुराल में भी तिरस्कार सहना पड़ रहा है।

भगवान शिव ने महिला को उत्तर दिया और बताया कि गणेश ने अपने पिछले जन्म में जो भी ननिहाल से लिया था, वह उसने सदैव वापस भी किया। वह किसी न किसी तरीके से मामा-मामी और उनके बच्चों को कुछ न कुछ देता रहता था। इसी तरह, ससुराल में भी उसने जो कुछ लिया था, वह उसने वापस कर दिया। इस कारण वह इस जन्म में न केवल अपने ननिहाल, बल्कि ससुराल पक्ष से भी ढेर सारा सम्मान और आदर प्राप्त करता है।

दूसरी ओर, दमनक अपने पूर्व जन्म में जो कुछ भी ननिहाल और ससुराल से प्राप्त करता था, वह कभी भी उसे वापस नहीं करता था। अपने कामकाज या किसी अन्य कारण से, वह कभी किसी को कुछ भी नहीं लौटाता था। इस वजह से उसे इस जन्म में ननिहाल और ससुराल दोनों से ही कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ और हर जगह उसे निराशा ही हाथ लगी।

यह कथा हमें यह सिखाती है कि हमें हमेशा किसी से प्राप्त हुई वस्तु को लौटाने का प्रयास करना चाहिए। यदि किसी से हमें कुछ मिले, तो हमें उसे अवश्य लौटाना चाहिए, क्योंकि जो चीज़ हमसे मिली है, उसे लौटाने पर हमें दुगना सुख और सम्मान प्राप्त होता है। हमें कभी भी किसी का हक नहीं लेना चाहिए और न ही किसी से प्राप्त वस्तु को अपने पास रखना चाहिए।

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