
हर साल फाल्गुन माह की पूर्णिमा तिथि को होलिका दहन का पर्व मनाया जाता है। वहीं इसके अगले दिन धुलंडी मनाई जाती है। इस दिन लोग एक-दूसरे को रंग-गुलाल लगाकर गले मिलते हैं और होली खेलते हैं। इस बार यानी की साल 2025 में होलिका दहन का आयोजन विशेष रूप से महत्वपूर्ण होने वाला है। क्योंकि इस बार भद्रा की वजह से होलिका दहन के लिए निर्धारित समय में कुछ जरूर बदलाव हो सकते हैं। क्योंकि ज्योतिष शास्त्र में बताया गया है कि भद्रा के दौरान किसी भी शुभ कार्य को नहीं करना चाहिए।
भद्राकाल” हिंदू पंचांग के अनुसार एक विशेष समय अवधि होती है, जो आमतौर पर दिन के कुछ हिस्सों में होती है, और इसे शुभ कार्यों के लिए अनुकूल नहीं माना जाता। इस समय में किसी भी तरह के महत्वपूर्ण या शुभ कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश, या अन्य धार्मिक क्रियाएं करना ठीक नहीं माना जाता। इसे अक्सर “अशुभ काल” कहा जाता है, क्योंकि इसे राहु और केतू जैसे ग्रहों के प्रभाव से जुड़ा हुआ माना जाता है, जो शुभ कार्यों में विघ्न डालने के लिए जिम्मेदार माने जाते हैं।
भद्राकाल आमतौर पर दिन के दो हिस्सों में आता है: सुबह के समय (सुबह के सूर्योदय से कुछ घंटों तक), रात के समय (रात के कुछ समय के बाद)। इस दौरान अधिकतर पंडित या ज्योतिषी किसी भी बड़े कार्य को टालने की सलाह देते हैं। हालांकि, इसका महत्व विभिन्न स्थानों पर अलग हो सकता है, और कई लोग इसे केवल एक परंपरा मानकर इसे गंभीरता से नहीं लेते। अगर आप भी किसी शुभ कार्य की योजना बना रहे हैं और भद्राकाल के समय में आ रहे हैं, तो इस समय को टालने का विचार कर सकते हैं, ताकि काम में कोई विघ्न ना आए।
भद्रा, विशिष्ट समय अवधि होती है जो पंचांग के अनुसार लगती है। इसे विश्टि करण भी कहा जाता है और यह चंद्रमा की गति पर निर्भर करता है। भद्रा को विश्टि करण भी कहा जाता है, और यह चंद्रमा की गति और तिथियों के करणों पर निर्भर करती है। भद्रा का समय शुभ कार्यों के लिए वर्जित माना जाता है क्योंकि इसे अशुभ फलदायी माना गया है। इस दौरान किए गए कार्यों में बाधाएं, विघ्न और नकारात्मक परिणाम आने की संभावना रहती है।