
देश को आजादी दिलाने में जितना योगदान पुरुष देशभक्तों का वा उनता की महिला देशप्रमियों का था। जो अपनी जान की परवान किए बिना ब्रिटिश सेना के सामने बट कर खड़ी रहीं। ऐसी डी वीरांगनों में नाम आता है रानी चेन्नम्मा का। जिन्होंने देश के लिए ब्रिटिश सेना से मोर्चा लिया। रानी चेन्नम्मा की कहानी लगभग झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की तरह है। इसलिए उनको ‘कर्नाटक की लक्ष्मीबाई’ भी कहा जाता है। वह पहली भारतीय शासक थी जिन्होंने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ सशस्त्र विशेड किया था। भले ही अंग्रेजों की सेना के मुकाबले उनके सैनिकों की संख्या कम थी और उनको गिरफ्तार किया गया, लेकिन ब्रिटिश शासन के खिलाफ बगावत का नेतृत्व करने के लिए उनको अब एक याद किया जाता है। फितूर, कर्नाटक के बेलगाम और बारवाड़ जिलों के गब्य (वर्तमान में बेलगाम जिले में स्थित है। यद्यपि पूर्वक्ती अधिकांश रियासतों की तुलना में यह एक छोटा राज्य था किन्तु भारत के स्वतंत्रता संग्राम में रानी चेन्नम्मा के विशिष्ट योगवान के कारण इसे विशेष ख्याति प्राप्त हुई। रानी चेन्नग्मा राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन से पूर्व सबसे पहले ब्रिटिश शासन के विरुद्ध स्वतंत्रता का संखनाद करने वाली भारतीय स्वतंगता सेनानियों में से एक थीं। रानी चेन्नण्या का जन्म बेलगाम जिले में काकती राजवंश में 1778 में हुआ था। अपनी युवावस्या में भी उन्होंने अद्वितीय दुनिश्चय और स्वतंत्र रूप से कार्य करने की चमता का परिचय दिया। बाद के वर्षों में अपने साहसिक कारनामों के कारण रानी चेन्नम्मा अपने जीवनकाल में ही एक कियर्थती बन गईं। कित्तूर राजवंश के यो सदियों (1585-1824) से भी सम्बे इतिहास में अनेक शूरवीर शासक हुए। रानी चेन्नम्मा का मल्लसरजा से विवाह हुआ। सन् 1782 में मल्लसरणा 17 वर्ष की अल्प आयु में इस राज्य के शासक बने। श्रेष्ठ धनुर्वर चेन्नम्मा विभिन्न सैन्य अभियानों और युद्धों में अपने पति के साथ रहा करती थीं। वे राजघरवार में मल्लसरजा को राजकाज के मामलों पर वाद-विवाद करते देखती थी जिससे उन्हें राज्य के कार्यों और जनता की समस्याओं की सीधे तौर पर जानकारी मिली। शासन कला में निपुण चेन्नम्मा शीघ्र अपने पति की मित्र, दार्शनिक और मार्गदर्शक बन गई। वर्ष 1816 में मल्लसरजा का देहान्त हो गया और राज्य का उत्तरदायित्व रानी चेन्नम्मा पर आ गया। उत्कृष्ट मानवीय गुण से संपन्न चेन्नष्मा ने मल्लसरजा की पहली पत्नी रुरन्मा का अपनी बड़ी बहन के रूप में सम्मान करके न केवल अपने बचन को पूरा किया अपितु उनके दोनों पुत्रों का भी और पुत्रवत् स्नेह एवं प्रेमपूर्वक पालन-पोषण किया। उनका दृढ़ निश्चय या कि रुহম্মা का ज्येष्ठ पुत्र शिवलिंग रुरसरजा ही राजसिंहासन के लिए मल्लसरजा का उत्तराधिकारी होना चाहिए। मल्लसरजा के देहावसान के पश्चात शिवलिंग रुमसरजा सिंहासनारूढ़ हुए। शिवलिंग रुमसरजा का स्वास्थ्य अच्छा नहीं था। इसके अतिरिक्त, वे अनुभवहीन वे और राजदरवार गुटों में बंटा हुआ था। दूरदर्शी रानी चेन्नम्मा ने प्रतिवन्धी गुटों को एकजुट कर राज दरवार में व्यवस्था कायम करने के लिए प्रयास किए। उन्होंने युवा शिवलिंग रुवतरणा को राजकान के कार्यों में सलाह देकर रोजमर्रा के शासन कार्यों में भी सक्रिय भाग लिया। उन्होंने राज दरबारियों और जनता में देशभवित्त, साहस और विश्वास की भावना पैदा करने का प्रयास किया। राजकार्यों में उनकी सक्रिय भागीदारी के चलते अंग्रेज उनके राजकाज में किसी भी प्रकार से हस्तक्षेप नहीं कर पाते थे। वे राज्य की युद्धक सेना को सबैव युद्ध के लिए तैयार और तत्पर रखती थी। कित्तूर फिर से सुइद्ध एवं समुछ होने लगा और इसके साथ ही रानी चेन्नम्मा की ख्याति भी दूर-दूर तक फैलने लगी। वर्ष 1824 में शिवलिंग कारसरका की मृत्यु के बाद रानी चेन्नम्मा ने कित्तूर राज्य के शासन की बागडोर पूरी तरह से अपने हाथ में से ती और अपने दत्तक पुत्र शिवलिंगण्या की ओर से यह राज्य के रीजेन्ट के रूप में शासन करने लगीं। यह बड़ी शालीनता और निपुणता से सभाओं का संचालन करती थीं। वह शीघ्र और समयोचित निर्णय लेती थीं, गरीब एवं जरूरतमंद लोगों के दिलों का व्यान रखती थी और सदैव सेना से संपर्क बनाये रखती थीं। वह सैनिकों को वीरता के लिए पुरस्कृत भी करती थी। इस बेटे से राज्य की बढ़ती शक्ति ने अंग्रेजों को बेचैन कर दिया और वे इस बात से आतंकित रहने लगे कि सभी दक्षिणी राज्य एकजुट होकर उनके वर्चस्व को चुनौती दे सकते हैं। अंग्रेज किसी न किसी बहाने कितूर के अन्दरूनी मामलों में इस्तक्षेप करने का मौका तलात रहे थे। धारवाड़ में ब्रिटिश सरकार के राजनीतिक एजेंट जान चेकरे ने स्वर्गीय शिवलिंग रुछासरजा द्वारा शिवलिंगप्पा को गोष लिए जाने को एक मुयुषा बना दिया और यह अनुचित राय दी कि कित्तूर का ब्रिटिश राज्य में विलय कर देना चाहिए। रानी चेन्नम्मा ने इसका विरोग किया। अतः राज परिवार के सदस्यों पर कड़ी नजर रखी जाने लगी। जान वेकरे की निरंकुशता निरंतर बढ़ती चली गई और वह कित्तूर राज्य के अधिकारियों और कर्मचारियों का उत्पीड़न करने लगा। उसने राजमहल के मामलों और राजकोष पर नजर रखने के लिए अपने लोगों को नियुक्त कर दिया। रानी चेन्नम्मा राजनीतिक एजेंट द्वारा उठाए गए कदमों से अत्यधिक आहत और अपमानित हुईं। उन्होंने राज परिवार की शिकायतों से अवगत कराने के लिए अपने दूतों को बम्बई के गवर्नर के पास भेजा, लेकिन गवर्नर द्वारा भी इन शिकायतों पर कोई अनुकूल कार्रवाई नहीं की गई। एक सप्ताह तक प्रतीक्षा करने के बाद रानी चेन्नम्मा ने दरवार के सभी सरदारों और अधिकारियों की बैठक बुलाई। इसमें उन्होंने बहुत ही भावप्रवण और प्रेरक भाषण दिया जिससे सभी नागरिकों में देशभक्ति की चिंगारी सुलग उठी। अपने संक्षिप्त किंतु प्रेरक भाषण में उन्होंने बताया कि व्यापार के बहाने इस देश में आए अंग्रेज धीरे-धीरे किस प्रकार चालबाजी से देशवासियों पर शासन करने लगे हैं। चेन्नग्मा कहा कि हमारे देशवासियों के आपत्ती अगड़ों से विदेशी आकान्ताओं को मषद मिल रही है तथा आशा व्यक्त की कि एक दिन वे अपनी इस मूल को स्वीकार करेंगे और इस देश से विवेशियों को खदेड़ने के लिए एकजुट हो जायेंगे। उन्होंने कहा कि उन्हें पूर्ण विश्वास है कि इस लक्ष्य को पाने के लिए फितूर की जनता आखिरी सांस तक संघर्ष करेंगी और अंग्रेजों की दासता स्वीकार करने के बजाय मौत को गले लगाना पसंद करेंगी। उनका यह भाषण इतना ओजस्वी और प्रेरक था कि उसे सुनकर जनता के सभी वर्ग के लोगों का शौर्य जाग उठा। किसूर के सैनिकों ने अंग्रेजों द्वारा कित्तूर सेना को दी गई चेतावनी और धमकियों पर ध्यान नहीं दिया। युद्ध के मैदान में रानी चेन्नम्मा ने अप्रतिम साहस और सैन्य संचालन प्रतिभा की मिसाल कायम की। अश्वारूढ़ रानी चेन्नम्मा के वायें हाथ में चमचमाती तलवार वी और बायें हाथ में घोड़े की लगाम। यह सम्पूर्ण शत्रु सेना का संहार करने को कटिबद्ध थीं। अपनी रानी की उपस्थिति से उत्साहित होकर फितूर के सैनिकों ने शत्रु शिविर पर बाया बोल दिया। जान चेकरै सहित दुश्मन के कई सैनिक मारे गये। कई सैनिक अपनी जान बचाकर रणभूमि से भाग गये। 23 अक्टूबर, 1824 को अंग्रेजी सेना की पराजय के बाद उस रात पूरे कित्तूर में विवय-उत्सव मनाया गया। इस वीच कित्तूर में लोगों ने 27 अक्टूबर, 1824 को किसूर राज्य के नए राजा के रूप में शिवलिंग रुप्रसरणा के यत्तक पुत्र शिवलिंगप्पा का राज्याभिषेक समारोह मनाया। इससे ब्रिटिश अधिकारियों को यह आरांका हुई कि इस विद्रोह में और जागीरदारों के शामिल हो जाने से यह विद्रोह अन्य क्षेत्रों में भी फैल जाएगा। उन्हें यह भी लगा कि ब्रिटिस लोगों के खोये सम्मान व प्रतिष्ठा को कित्तूर कर दमन करके ही हासिल किया जा सकता है। अपनी हार से कुब्ध ब्रिटिश अधिकारियों ने प्रतितोष का रुख अपना लिया। वे अपना वही पुराना राग अलापने लगे कि कित्तूर का कोई कानूनी उत्तराधिकारी नहीं है और उन्होंने कित्तूर किले पर फिर से आक्रमण की तैयारी शुरू कर दी। ब्रिटिश सैनिकों के हमले की भनक लगते ही कित्तूर की सेना ने भी कित्तूर की रक्षा में अधिकाधिक सैनिक जुटाने के लिए भरसक प्रयास शुरू कर किए। जब रानी की युद्ध टालने की सारी कोशितें नाकाम हो गई तो उन्होंने सरवारों और अपनी सैन्य टुकड़ियों को बुलाया जिन्होंने उन्हें आखिरी दम तक लड़ने का भरोसा दिया। वे महत्वपूर्ण स्थानों पर तैनात हो गए। जहां विशाल ब्रिटिश सेना तोपों से लैस थी, वहीं कित्तूर की सेना भी रानी चेन्नम्मा के पराक्रम से प्रेरित देशभक्ति की उत्कृष्ट भावना से परिपूर्ण वी। कित्तूर इस विजय की स्मृति में, प्रतिवर्ष, 23 अक्टूबर को ‘कित्तूर रानी चेन्नम्मा पुरस्कार’ वित्तरित किये जाते है। सेना के हर एक सिपाही ने अपने वृढ़ संकल्प और पूर्ण साहस से ब्रिटिश सेना पर हमला बोल दिया। रानी चेन्नम्मा के सिपाही रानी के जोश भरे उत्प्रेरक शब्दों की गूंज में ‘करो या मरो’ की भावना से लम्हे परंतु विशाल ब्रिटिश सेना कितूर की सेना पर हावी हो गई। कित्तूर के अधिकांश सिपाही मारे गये, जो बच गये वे वापस किले में लौटकर किले की रक्षा में जुट गये। यथपि कित्तूर के बहादुर सिपाहियों ने ब्रिटिश सेना का डटकर मुकाबला किया पर वे किला नहीं बचा पाए और अंततः ब्रिटिश सेना 4 दिसम्बर, 1824 को किले में सेंध लगाने में सफल रही। कित्तूर के सिपाही पराजित हुए। उनमें से अधिकांश बहादुरी से लड़ते-लड़ते शशीय हो गये। अंततोगत्या ब्रिटिश सेना ने 5 दिसम्बर, 1824 को कित्तूर किले पर कब्जा कर लिया। रानी चेन्नग्मा और राज परिवार के अन्य सदस्यों को अग्रेजों द्वारा नजरबंद रखा गया। वहां उन पर किसूर राज्य को अंग्रेजी राज्य में मिलाने के लिए दबाव डाला गया। तदनन्तर उन्हें वहां से बेलहोंगल दुर्ग में स्थानांतरित कर दिया गया, जहां उन्हें राजनीतिक कैदियों के तौर पर रखा गया। कैद में भी कित्तूर की स्वतंत्रता की उत्कट लालसा संजोये रानी चेन्नम्मा अपने स्वतंत्रता संग्राम को जारी रखने के लिए पड़ोसी शासकों की सेनाओं को एकजुट करने का प्रयास करती रहीं। चार वर्ष की कैग के बाद 2 फरवरी, 1829 को रानी चेन्नम्मा का देहान्त हो गया। रानी चेन्नम्मा द्वारा प्रज्वलित देशभक्ति की मताल उनके बाद भी कित्तूर में समय-समय पर उदीप्त होती रही। कित्तूर सिंझसन के वाजिब उत्तराधिकारी शिवलिंगप्पा ने भी कित्तूर को स्वतंत्र कराने के लिए 1857 तक ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अनेक प्रयास किए। उनके ये प्रयास भले ही विफल हो गए किन्तु निसदिह इनसे देश को विदेशी शासकों से मुक्त कराने के लिए किये गये परवतीं प्रयासों की शुरुआत हुई। रानी चेन्नम्मा द्वारा अपने अनुयायियों में इतनी प्रक्त देशभक्ति की भावना जागृत की गई थी। शौर्य, बलिदान और अदम्प पराक्रम की भावनाओं से परिपूर्ण रानी चेन्नम्मा का जीवन हमारे राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय है। निस्संदेह रानी चेन्नम्मा ‘भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की अग्रदूत’ थीं। उनकी एक प्रतिमा नई दिल्ली के पार्लियामेंट कंप्लेक्स में लगी है। कित्तूर की रानी चेन्नम्मा की उस प्रतिमा का अनावरण 11 सितंबर, 2007 को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने किया था। प्रतिमा को कितुर रानी चेन्नम्मा स्मारक कमिटी ने पान दिया था जिसे विजय गौड़ ने तैयार किया था। देश ऐसे बलियानियों के योगदान को युवाओं को आत्मसात करना चाहिए जिससे देशभक्ति का दीप दिल में जल सके।



