कफनचोरों का कालखंड

-अनूप गुप्ता

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 2017 में शपथ लेते समय प्रदेश की 24 करोड़ जनता को यह भरोसा दिया था कि भ्रष्टाचार के मामले में प्रधानमंत्री की तरह मेरी सरकार की नीति जीरो टॉलरेंस की रहेगी, न खाऊंगा और न ही किसी को खाने दूंगा। सरकार के साढ़े आठ साल गुजरने के बाद कई कुख्यात लोगों व विभागों के संस्थागत भ्रष्टाचार के किस्से विधानसभा के सदन से गूंजते हुए सड़क तक आ गए हैं। आज ऐसे कई विभाग हैं जिनमें बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार व्याप्त होने के कारण सब कुछ बिकाऊ है, बस… जेब में पैसे होने चाहिए। विभाग का यही सूत्र वाक्य बनने के बाद खरीदार ढूंढ़े जा रहे हैं। यह सब सीएम की साख को दांव पर लगाकर उनकी नाक के नीचे और आंखों के सामने हो रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या योगी आदित्यनाथ का भय खत्म हो गया है? क्या एक मछली पूरे तालाब को गंदा कर रही है? चौंकाने वाला तथ्य यह है कि सीएम के मंत्रिमंडल के अहम व डबल इंजन की सरकारों की प्राथमिकता वाले विभाग एमएसएमई का कैबिनेट मंत्री राकेश सचान 40 40 फीसदी कमीशन लेकर सीएम की ईमानदारी का सौदा कर रहा है। हर युवा हाथ को काम देने के लिए शुरू की गई महत्वाकांक्षी योजना पर बेईमानी के सारे रिकॉर्ड तोड़ते हुए डाका डाल रहा है और योजना के साथ-साथ योगी-मोदी व युवाओं के सपने को ग्रहण लगा रहा है। उनके भविष्य को अंधेरे से ढक रहा है। ईमानदारी से काम किया जाए तो यह योजना प्रदेश और 2027 के लिए ब्रह्मास्त्र सावित हो सकती है। जैसी कि सीएम-पीएम ने भी उम्मीद की थी कि लाखों युवाओं को अपने पैरों पर इसके जरिये खड़ा किया जा सकेगा। उद्यमिता विकास संस्थान लखनऊ का निदेशक पवन अग्रवाल जैसा खरीदार मंत्री राकेश सचान को 40 प्रतिशत कमीशन देकर काम लेकर आया है। इन दोनों कफनचोरों ने मिलकर लूट का ऐसा तांडव मचाया है कि बचपन शुरू होने के पहले ही योजना दम तोड़ने लगी है। शासन को तुरंत ऐसे लोगों पर कार्रवाई करके योजना की भ्रूणहत्या से उन्हें रोकना होगा। आखिर मुख्यमंत्री की ऐसी क्या सियासी लाचारी व बेबसी है कि राजकोष को लुटने से नहीं बना पा रहे है और डाके को नजरअंदाज करना पड़ रहा है? पैसे के मामले में राकेश सचान इतना गिरा हुआ आदमी है कि जब इतने मोटे कमीशन के बाद भी पेट नहीं भरा तो अपने ही विभाग में बेटा, बेटी व भतीजों को ठेकेदार के तौर पर सेट कर रहा है, अधिकारियों पर दबाव बनाकर व धमकी देकर उन्हें तरह-तरह के प्रोजेक्ट दिला रहा है और सीएम की साफ-सुथरी छवि को बट्टा लगा रहा है। पढ़िये इस बार के प्रखर पोस्ट की आवरण कथा में ‘कफनचोरों का कालखंड’…

दुनिया में ऐसा कौन है, जिसे कमाऊ पूत अच्छे न लगते हों? इससे इतर यदि कमाऊ पूतों की सामाजिक प्रतिष्ठा आरोही के बजाय अवरोही क्रम में। में हो और ये परिवार के मुखिया की साख को रसातल में ले जा रहे हों तो फिर उनसे किनारा करना ही ठीक होता है, फिर बात चाहे घर की हो, परिवार की हो, रिश्तेदार की हो, समाज की हो, राष्ट्र की हो या फिर दोमुंही राजनीति की। परिवार के संदर्भ में किनारा कर पल्ला झाड़ने के वर्गीकृत विज्ञापनों के रोज ही सुबह समाचार पत्रों में दर्शन हो जाते हैं। इस नुस्खे को सियासत में आजमाने के अतीत में 78 साल में 1018 प्रमाण मिलेंगे, इसलिए सरकार में भी आजमाने में कोई बुराई नहीं है। इतिहास गवाह है कि अनदेखी के नतीजे कभी हक में नहीं रहे, फिर चाहे मामला परिवार का हो, विभाग का हो या फिर सरकार का। सरकारी सिस्टम में दर्जनों ऐसे लोग हैं, जिनके पेट बहुत बड़े हो गए हैं और वे बदहजमी से डरे बिना सबकुछ गटक जाना चाहते हैं। गले तक खाना-पीना ठूंस लेने के कारण गर्दन भी बहुत मोटी हो गई है। उल्लेख उचित होगा कि 2012 से ही जनता स्कूटर पर जयपुर से पत्थर ढोकर लाने वालों को उल्टा लटका कर खाल निकालते हुए देखने को उत्सुक थी। इंतजार करते-करते आंखें पथरा गई और 2017 आ गया था, पर पत्थर के घोटालेबाजों पर कार्रवाई के नाम पर खानापूर्ति की गई थी। उल्टे 2007 से 12 के बीच जिन बड़ी मछलियों ने बहुत मलाई काटी थी, वे मलाई ऊपर तक बांटकर सत्ता पर फिर से पांच साल के लिए काबिज हो गई थीं और भले, भद्र व साफ-सुथरी छवि वाले अधिकारियों को मलाईदार पदों के लायक नहीं समझा गया। सर्वविदित तथ्य है कि ब्यूरोक्रेसी ही शासक को सफल बनाती है तो जनता व मीडिया से असफल घोषित करवाने के लिए भी जमीन वही तैयार करती है। इस घोर आर्थिक युग में लाभ को किनारे रखकर मीडिया जिन चोट्टों की खबर छाप दे, उनसे दूरी बनाने में ही सरकार सहित सभी का लाभ है इसलिए मुख्यमंत्री को ऐसे पतित मंत्री व बेईमान अधिकारियों की गर्दन की नाप के पट्टे जल्द से जल्द तैयार करवाने चाहिए, नहीं तो यह नेक काम सच्चे व सक्षम स्तम्भ के संदर्भ में स्वतः संज्ञान लेने की शौकीन न्यायपालिका को आगे बढ़कर सिस्टम को सही दिशा देने के लिए करना होगा, क्योंकि सरकार का मुखिया ढेर सारी चुनावी चीजों व जातीय समीकरणों से बंधा होता है। पूर्वज एक कहावत कह गए हैं कि चार कदम चोर से, 14 कदम लतखोर से, 74 कदम दोगले ढोर (पशु रूपी इंसान) और 400 कदम चुगलखोर से दूर रहना चाहिए। देश, काल व परिस्थिति के हिसाब से अब इसमें एक बात और जोड़ देनी चाहिए कि 1400 कदम कफनचोर से दूर रहना चाहिए, वरना कभी भी और कहीं भी अपमान हो सकता है और लेने के देने पड़ सकते हैं। यह नेक सलाह जनहित में जारी की गई समझी जा सकती है, क्योंकि एक बार अगर बचपन से ही चिंदीचोरी की आदत लग जाए तो फिर नशे की तरह लत बन जाती है। इतना ही नहीं जनता द्वारा 10-पांच साल में लतियाए बिना लतखोरी की लत जल्दी से जाती भी नहीं है। यह पब्लिक है, सब जानती है और मौके की तलाश में रहती है और बड़े से बड़े बड़बोले व धनपशुओं की सैकड़ों बार अक्ल ठिकाने लगा चुकी है। इससे पहले चीजें बद से बद्तर होकर पूरे सिस्टम को ही पातालपुरी पहुंचा दें, किसी न किसी को आगे आकर सकारात्मक संदेश के लिए सख्त कार्रवाई करनी होगी। यही लोकतंत्र का सिस्टम भी कहता रहा है कि एक खंभे द्वारा सुनवाई न करने पर दूसरे के पास जाना होता है और इसी प्रकार तीसरे व चौथे खंभे के पास। यदि चारों खंभे बेईमान व भ्रष्ट हो जाएंगे और सभी स्तंभों के कुएं में भांग डल जाएगी तो फिर कानून-व्यवस्था का हाथी बीच बाजार में बैठ जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शब्दों में यह बहुत सतर्कता बरतने का दौर है। वैसे भी बराबर देखने व सुनने में आ रहा है कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी की अगुवाई में सैकड़ों पत्रकार व हजारों अर्बन नक्सल एवं देशद्रोही जेन-जी को भड़काने का काम कर रहे हैं ताकि 12 साल से बेरोजगार बैठे गद्दारों को दुकानें चलाने का मौका मिल सके और हर 12 माह में सालाना परीक्षा देने की तरह विदेश तक देश की छवि बिगाड़ने के लिए जाने वाले मेन स्ट्रीम में आ सकें, क्योंकि 12 साल से वे खुड्डेलाइन हैं। देश ने बिना कद के छद्म प्रधानमंत्री को 10 साल तक झेला था और भाजपा नीत राजग ने बराबर मेहनत की व रीति-नीति में आमूल-चूल परिवर्तन करने के बाद 2014 में सत्ता पाई थी, लेकिन उन्हें ऊंचे पाजामे व लंबे कुर्ते वालों की कट्टरता से कुर्सी पर बैठाए गए मो. यूनुस व नेपाल की एनार्की से उपजी सबकी काकी सुशीला कार्की की तरह कुर्सी चाहिए। दुनिया को यह ज्वलंत सवाल इन नीच लोगों से पूछना चाहिए कि उनके बच्चे कहां हैं, वे अपने बच्चों को सड़क पर लाठी खाने व मरने-मारने के लिए क्यों नहीं भेजते और उनका क्रांतिकारी आह्वान क्यों नहीं करते? उल्लेखनीय है कि इन मक्कारों, गद्दार, चिंदीचोरों एवं कफनचोरों में शायद ही कोई ऐसा हो, जिसका बच्चा विदेश में न पढ़ रहा हो या नौकरी न कर रहा हो? इन नीच व महाभ्रष्ट लोगों के चक्कर में पड़ने के बजाय भारत के जेन-जी का मस्तक इस समय गर्व से ऊंचा है और वह विभिन्न क्षेत्रों के वैश्विक मंचों पर प्रतिभा एवं आत्मविश्वास के दम पर प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज करवा रहा है। साथ ही अमेरिका व ब्रिटेन जैसे देशों की राजनीति व चर्चा के केंद्र में है। वेद से लेकर वेदांत तक और संगीत से लेकर खेल के मैदान तक हर क्षेत्र में नाम कमा रहा है। अगर उनके नाम लिखने लगूं तो दसियों पेज भर जाएंगे। राज्य व केंद्र सरकार की दर्जनों कल्याणकारी योजनाओं के जरिये अपने साथ-साथ भारत का भविष्य गढ़ने में लगा है और नौकरी के बजाय नए जोश के साथ स्टार्ट अप में हाथ आजमा रहा है। एक ये नीच कफनचोर हैं, जो कि मोटा माल काटने के लिए उसी डाल को काट रहे हैं और उसी पेड़ की जड़ों को दीमक की तरह चाट रहे हैं, जिस डाल पर बैठे हैं। सपनों को उड़ान देने वाली योजनाओं पर ही ग्रहण बनकर बैठे हैं। वैसे भी कहा जाता रहा है कि देश व प्रदेश में योजनाएं एक से एक क्रांतिकारी चल रही हैं, जो कि थोड़ी सी भी ईमानदारी से काम करने पर युवाओं के साथ-साथ भारत के भी भाल को चमकाने में सक्षम हैं, पर ये संपोला मंत्री दाल में नमक के बराबर लेने के बजाय दाल ही पीये जा रहे हैं। बात हो रही है एक ऐसे कफनचोर मंत्री और उसके चेलों की, जो जनता के खून-पसीने की कमाई से राजकोष में जमा किए गए जीएसटी (टैक्स) से चलाई जा रही प्रधानमंत्री विश्वकर्मा कौशल सम्मान जैसी महत्वाकांक्षी योजना में 40 फीसदी तक कमीशन ले रहा है और बचे हुए 60 फीसद उसके मातहत व चेले ड्रैकुला की तरह चूसे ले रहे हैं। ऐसे में लाभार्थी के हाथ झुनझुने की शक्ल में आ रही है सिर्फ और सिर्फ बाल बनाने (नाई आदि) की किट, जो 1000 से 10 हजार तक की हो सकती है। इस दौरान मंत्री भूल जाते हैं कि पांच साल बाद लौटकर फिर उसी टैक्स पेयर जनता के पास जाना है और हाथ-पैर जोड़कर व माफी मांगकर उनकी सेवा के नाम पर अपनी सेवा के लिए किसी तरह एक और मीका हासिल करना है, अपने लिए न सही तो अपनी आल-औलाद के लिए। गौरतलब है कि पारंपरिक कारीगरों व शिल्पकारों को बड़ी संख्या में गांवों में ही रोजगार देने के लिए केंद्र सरकार ने 17 सितंबर 2023 को उक्त योजना शुरू की थी। सरकार ने इसका क्रियान्वयन सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय के हवाले किया था। यह सुनकर अपने हाथों व औजारों से काम करने वाले लाखों कारीगरों व शिल्पकारों के चेहरे पर मुस्कान तैर जानी चाहिए थी, पर हुआ इसके उलट। अरबों के बजट वाली की योजना के ऐलान मात्र से सैकड़ों कुटिल व कुख्यात ब्यूरोक्रेट और दर्जनों मंत्रियों के चेहरों पर ऐसे मुस्कान तैर गई थी, जैसे- पेट में भ्रूण ठहरने पर माता-पिता व दादा-दादी के चेहरे पर तैर जाती है। दरअसल पाइप लाइन में ही जब योजना होती है तो उसे सूंघकर धूर्तों के चेहरे चमक उठते हैं और फिर समय बीतने के साथ धीरे-धीरे दिलों की कालिमा के साथ चेहरे की लालिमा भी बढ़ती जाती है। 72 प्लॉट के मामले में मंत्री ने सफाई में कहा था कि इसी विभाग का मंत्री हूं। अपने नाम दर्ज प्लॉटों का आवंटन रद करवाऊंगा। तर्क दिया कि जब प्लॉट आवंटित हुए थे तो कोई वहां लेने को तैयार नहीं था तो विभाग ने जबरन दे दिए थे, तब वहां कोई सुविधाएं नहीं थी। अब भी खेत बने हुए हैं। अब कहते हैं कि अन्य उद्यमियों को अलॉट कर बिजली, सड़क व पानी जैसी बेसिक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। राकेश किदवई नगर के रहने वाले हैं। राजनीति की शुरुआत डीएवी कॉलेज से की थी। साल 1993 में सपा टिकट पर घाटमपुर से पहली बार विधायक बने थे। साल 2002 में दोबारा लड़े और जीते, जिसका नतीजा यह रहा है कि 2009 में सपा ने सांसद के चुनाव में फतेहपुर सीट से उतारा और वह जीत भी गए। 2014 में हार गए। 2019 में अखिलेश ने सीट बसपा को दे दी तो नाराज होकर कांग्रेस से लड़े और हारे। 2022 में सही मौका देख बीजेपी में जा घुसे थे। कानपुर की भोगनीपुर सीट से टिकट मिला। जीत गए व कैबिनेट मंत्री बने। 2005 में पत्नी सीमा कानपुर नगर की जिला पंचायत अध्यक्ष बनाने में सफल रहे। 2017 के चुनाव में पत्नी को सिंकदरा सीट से चुनाव, फिर उप चुनाव लड़ाया, पर हार गई। 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले वह तब विवादों में एक बार फिर आ गए थे, जब किसान बीमा योजना के तहत मिलने वाले धन का लाभ उठाने के लिए इलाज में फर्जीवाड़े का सुझाव देते हुए कैमरे में कैद हो गए थे। यह कहते सुना गया था कि गांव वाले मृतक के पैरों पर नकली चोट का निशान बना लें और उसका पोस्टमार्टम कराएं, जिसके आधार पर डॉक्टर नतीजों को ‘संदिग्ध’ करार देंगे और फिर स्लाइड को आगरा फॉरेंसिक प्रयोगशाला में भेजेंगे, फिर वे आसानी से दावा कर सकेंगे। कानपुर की एसीएमएम तृतीय आलोक यादव ने दोषी करार देते हुए फैसला सुरक्षित कर लिया था। मंत्री पर गिट्टी चुराने का आरोप था। सचान ने सरेंडर किया था। जज के फैसला सुनाने से पहले वह फरार हो गए थे, जिसके बाद पुलिस ने तलाश शुरू की। 35 साल पहले वह रेलवे की ठेकेदारी के दौरान गिट्टी चोरी में नामजद किए गए थे। गिट्टी भी उनके कब्जे से बरामद हुई थी। जज चैंबर में चले गए तो सचान भी निकल लिए थे, वरना सजा का ऐलान होते ही गिरफ्तारी का प्रावधान है। मंत्री व उनका वकील अविनाश कटियार होल्ड ऑर्डर को लेकर फरार हो गए थे। बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने भी हस्तक्षेप किया और केस को दबाने में पूरी ताकत लगा दी गई है। भागने के क्रम में इस तरह का मखौल वह करते रहे हैं अदालत के साथ। धारा 389 में आरोप साबित हो जाने पर दस वर्ष कारावास और आर्थिक दंड का प्रावधान है। यह एक जमानती, संज्ञेय अपराध है तो बारा 411 (चोरी की संपत्ति को बेईमानी से प्राप्त करना) के तहत आरोप सिद्ध होने पर तीन वर्ष कारावास या आर्थिक दंड या दोनों सजा का प्रावधान है। पूरे मामले पर कानपुर बार एसोसिएशन अध्यक्ष नरेश चंद्र त्रिपाठी ने बताया कि मंत्री के पेट में दर्द होने लगा था तो वह चले गए थे, जिससे कम नाराज हो गए। हाल ही में संपन्न ग्रेटर नोएडा के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेले के उद्‌घाटन के समय राकेश सथान योगी-मोदी के बराबर में खड़े थे। यह हक मिलना बहुत बड़े सम्मान की बात है, जिसके लिए बहुत त्याग करना होता है, पर इसे पचा नहीं पाए। संभाल नहीं पाए। उन्हें क्या पता कि प्रचारक किस चिड़िया का नाम होता है। सुबह घर से निकलना, दिनभर किसी न किसी के दरवाजे बैठकर देश व समाज की बातें करना एवं सारा दिन चाय-पानी से काम चलाना। शाम होते ही किसी के दरवाजे तब तक बैठना, जब तक कि भोजन का समय न हो जाए और पाने के बाद ही अपने ठिकाने की और जाना। गुड़, सल्लू, चने, शाखा, व्यायाम व बैठकें उनके जीवन का मुख्य व अनिवार्य हिस्सा होती थीं और होती है, तब जाकर कहीं यह मलाई काटने को मिली है आज की कैचिनेट और विधायकों को। कुछ ऐसे ही कारणों से कहा जाता है कि भाजपा में नई भती का हाल बेयल है तो मूल नेता व कार्यकर्ता बदहाल। साथ ही यह भी कि भाजपा है कहां? मूल भाजपा तो एक-तिहाई है, बाकी तो सब कांग्रेसी, सपाई या वसपाई है। मलाई तो आयातित गैर भाजपाई ती ज्यादा काट रहे है, क्योंकि वे संख्या में ज्यादा है और सरकार पर उनका कब्जा है। एक ऐसी विजनरी सरकार, जिसका फोकस ऐसी चीजों पर है, जिनके बारे में बड़े से बड़े तोपची सीएम सोच तक नहीं पाते थे। उसके मूल में एमएसएमई, स्वरोजगार, स्वदेशी मेले, ग्लोवल इनवेस्टर समिट और इंटरनेशनल ट्रेड शो जगह बना चुके हैं। प्रदेश के विकास और जीडीपी के कुल भार का काफी बड़ा प्रतिशत जिन कंधों पर है, वे कंधे पहले से ही इतने बोझिल हैं कि अपने ही ऊपर रखे सिर का भार तक बहुत मुश्किल से उठा पा रहे हैं तो कमोवेश यही स्थिति पैरों की भी है। अगर आरएसएस और उसके सभी आनुषांगिक संगठन अपने 72 कार्यों के अलावा एक 73वां काम आईना विखाने का संभाल ले तो कहना न होगा कि सोने पर सुहागा हो जाए। अगर मीडिया के किसी सवाल या खुलासे पर सरकार पर्याप्त ध्यान नहीं दे रही है तो फिर संघ के पत्र व पत्रिकाएं लेखों के बजाय खुलासों को स्थान देकर सरकार को आईना दिखाने का काम करने लगें तो भगवान राम के साथ-साथ रामराज्य के भी दर्शन इसी दौर में हो जाएंगे और किसी को भी दूसरा जन्म लेने की जरूरत ही नाहीं पड़ेगी। संघ की वेबसाइट पर लिखा है कि 1994 में लघु उद्योग भारती का गठन हुआ था। इसके कामकाज के बारे में ज्यादा जानकारी वेबसाइट पर नहीं है, पर इसका उद्देश्य है नौकरी के बजाय युवाओं को स्वरोजगार की ओर प्रेरित करना और उद्यमिता को बढ़ावा देना। स्वदेशी जागरण मंच के जरिए इसी काम को और बड़े स्तर व ऊंचाई तक ले जाने के लिए स्वावलंबी भारत अभियान संघ की ओर से शुरू किया गया है। सत्येंद्र का दावा है कि देश के 350 से अधिक जिलों में इसकी पूर्ण इकाई है। यह एक ऐसा संगठन है, जी उद्यमियों से जुड़े मु‌द्दों को समय-समय पर उठाता रहता है और शासन से समन्वय बनाने का काम करता है। फतेहपुर में एक साल ही हुआ था काम करते हुए और इतना बड़ा खुलासा हो गया था। उन्होंने बताया कि जब से प्रदेश में इनवेस्टर समिट के आयोजन होने शुरू हुए है, तब से लघु उद्योग भारती की जिम्मेदारी बहुत यह गई है। जिले के उद्यमियों में समिट के प्रचार-प्रसार का जिम्मा इसी संगठन के पास होता है या फिर जिलाधिकारी व उद्योग विभाग के पास। बाल चाहे 72 इंडस्ट्रियल प्लॉट अपनी संस्था अभिनव सेवा संस्थान के नाम कराकर भागने की हो या जज के हाथ से फैसले की फाइल लेकर भागने की हो या गि‌ट्टी चुराकर भागने की। वह छात्रजीवन से ही भाग रहे हैं। आरोप है कि उक्त केस में वह छात्र नेता नृपेंद्र सचान की हत्या में प्रयुक्त अवैध राइफल लेकर भाग रहे थे, लेकिन पुलिस के हत्ये बढ़ गए थे। इससे पहले भी पता बला है कि एक बार अदालत से सजा से संबंचित कुछ कागज लेकर भागे थे। 2010 में राकेश पर बारा 420 के तहत भी केस दर्ज हुआ था। उन पर भू-माफिया, खनन माफिया, करपान, क्रिमिनल केसेस, आर्म्स एक्ट (चोरी के असलहे), गिट्टी चोरी व मर्डर आदि के आरोप लगते रहे हैं, पर वे बचते रहे हैं। सजा जैसे ही घोषित होने को होती है, फैसले की फाइल ही लेकर भाग जाते हैं। मुकदमों का क्या है, घटते और बढ़ते रहते हैं, पर वे व्यक्तित्व का आईना भी होते हैं? जैसे- साहित्य को समाज (तत्कालीन) का दर्पण कहा जाता है। सपा के बाद भाजपा सरकार ने भी उन पर से मुकदमे उठाने के लिए डीएम को लिखा था, पर अभी पेंच फंसा हुआ है। मुख्य रूप से देखा जाए तो शासनादेश में लिखा है कि पारंपरिक कारीगरों एवं दस्तकारों को उद्यम आधारित 10 दिवसीय प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा। प्रशिक्षण कार्यक्रम निःशुल्क एवं आवासीय होगा। प्रशिक्षण स्थल तहसील अथवा जनपद मुख्यालय स्तर पर होगा। प्रशिक्षण पूर्ण होने पर आरपीएल सर्टिफिकेट प्रदान किया जाएगा, तब अंतिम किस्त के रूप में 25 प्रतिशत बनराशि अवमुक्त की जाएगी। कोऑर्डिनेटर प्रशिक्षणार्थियों के लंच एवं डिनर करते हुए रोज के फोटी दिनांक एवं समय सहित ई-मेल के माध्यम से उपलब्ध कराना सुनिश्चित करेंगे। ट्रेनिंग के चौथे दिन जिले के अग्रणी बैंक के प्रबंधक व अन्य बैंक अधिकारियों को आमंत्रित कर उनके व्याख्यान कराने तथा रोजगारपरक केंद्र व राज्य सरकार द्वारा संचालित विभिन्न मार्जिन मनी योजनाओं यथा प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम योजना, मुख्यमंत्री युवा स्वरोजगार योजना, एक जनपद एक उत्पाद मार्जिन मनी योजना एवं प्रचानमंत्री मुद्रा योजना आदि में ऋण प्राप्त करने संबन्धित विस्तृत जानकारी प्रदान कराना सुनिश्चित करेंगे तथा ऋण प्राप्त करने के इच्छुक प्रशिक्षणार्थियों को निर्धारित प्रारूप पर आवेदन पत्र प्राप्त करते हुए ऐसे प्रशिक्षणार्थी जो ऋण प्राप्त नहीं करना बाहते हैं, उनसे स्पष्ट अभिमत प्राप्त करना सुनिश्चित करेंगे, तदोपरांत उपरोक्त की संकलित सूची तैयार करते हुए संबंचित जनपद के उपायुक्त उद्योग को उपलब्ध कराई जाएगी। इसके पश्चात उपायुक्त उद्योग द्वारा संबंचित योजनाओं में नियमानुसार आवेदन कराकर ऋण उपलब्ध कराने की कार्यवाही की जाएगी। सभी प्रशिक्षुओं का प्रमाणीकरण किया जाना अनिवार्य है। अतः यह आवश्यक है कि आप समस्त प्रशिक्षकों का संबंधित सेक्टर स्किल काउंसिल से टीओटी करवाकर ही प्रशिक्षण कराएं। समस्त प्रशिक्षणयायी संस्थाएं प्रशिक्षणार्थियों की बॉयोमैट्रिक अटेंडेंस अनिवार्य रूप से सुनिश्चित करेंगी। चूंकि इतने नियमों का पालन होगा तो फिर बचेगा क्या इसलिए लूट की छूट के रास्ते बनाने के लिए ही नीचे से ऊपर तक बाई लाख प्रति वैच का बंदरबांट हो रहा है। प्राप्त प्रशिक्षण के आधार पर एक-एक प्रोटोटाईप मॉडल भी बनाना होगा। यह कार्य सुनिश्चित कराना संस्थाओं की जिम्मेदारी होगी। प्रशिक्षणदायी संस्थाओं को भुगतान से पूर्व उद्योग एवं उद्यम प्रोत्साहन निदेशालय कानपुर द्वारा यह भी तथ्य संज्ञान में लिया जाए। इससे पहले प्रशिक्षण प्रारंभ होने की सूचना प्रदेश के समस्त जिलाधिकारियों को भी दी जाए एवं प्रशिक्षण का समुचित प्रचार-प्रसार कर प्रशिक्षण का शुभारंभ या उदघाटन जनप्रतिनिधियों से कराया जाए। प्रशिक्षणोपरांत टूलकिट प्राप्त इच्छुक लाभार्थियों को केंद्र व राज्य सरकार द्वारा संचालित विभिन्न मार्जिन मनी योजनाओं यथा प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम योजना, मुख्यमंत्री युवा स्वरोजगार योजना, एक जनपद-एक उत्पाद मार्जिन मनी योजना एवं प्रधानमंत्री मुद्रा योजना आदि के माध्यम से ऋण उपलब्ध कराने में आवश्यक हैंड होल्डिंग की जाए। ऋण प्राप्त करने के इच्छुक लाभार्थियों की निर्धारित प्रारूप पर आवेदन पत्रों की सूची तैयार करते हुए संबंधित जनपद के उपायुक्त उद्योग को उपलब्ध कराई जाए तथा उक्त सूची उपायुक्त उद्योग द्वारा जिला अग्रणी बैंक प्रबंधक को अग्रिम कार्यवाही के लिए अग्रसारित की जाए। सवाल यह है कि शासनादेश में तो सब अच्छी ही बातें रामचरितमानस व गीता की तरह लिखी होती हैं, पर यह निर्भर करता है कि सामने वाले पर कि क्या पड़ा, कितना पड़ा और कितना समझा? यानी कि कौन कितना सीखना चाहता है, यह कोई शासनादेश तय नहीं कर सकता? ऐसे लोगों को अगर कफन खरीदने का जिम्मा दे दिया जाए तो उसमें भी दलाली लेने से न हाथ कांपेंगे और न रूह। इसीलिए मंत्री व अधिकारियों की नीयत को कफनचोरों का कालखंड कहा जा रहा है।

राजीव गांधी के उल्लेख से भी एक प्रतिशत ज्यादा

बड़े सपने के साथ प्रधानमंत्री विश्वकर्मा कौशल श्रम सम्मान योजना शुरू की गई थी। यह तो ध्रुव सत्य है कि अगर ईमानदारी से काम किया जाए तो एक से बढ़‌कर एक कायापलट करने वाली योजनाएं देश-प्रदेश में डवल इंजन की सरकारें चला रही हैं, पर मंत्री व उनके चेले-चपाटे हैं कि इंजनों की ही हवा निकालने पर तुले हुए हैं। गालों की गोलाई व पेट की ऊंचाई बढ़ाने की कोई सीमा नहीं होने के कारण बुढ़ापे में भी उनके ललाट लपलपा रहे है। पता ही नहीं चलता है कि 60 साल के जवान हैं या 60 साल के बूढ़े इसीलिए उन्हें इस बात का भी डर नहीं है कि ऐसी-ऐसी 75 वीमारियां चल रही है, जो कि 75 तक बड़े-बड़े सात्विकों को भी नहीं पहुंचने दे रही हैं। इस तरह दिन पर दिन चेहरे की लालिमा के साथ दिलों में कालिमा बढ़ती ही जा रही है। दृष्टांत मीडिया हाउस के हाच लगे सुबूत बताते हैं कि ऐसा ही एक चूर्त कैबिनेट मंत्री है राकेश सचान, जिनके पास खावी, ग्रामोद्योग, रेशम उत्पादन, वस्त्र उद्योग व एमएसएमई जैसे अहम मंत्रालय है। प्रधानमंत्री विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना में वह खुलेतौर पर 40 फीसदी कमीशन ले रहे हैं। राजधानी के बड़े बाबुओं व विभाग के बड़े बाबुओं को 22 फीसदी जा रहा है, विधीलियों को कुल का 14 फीसदी और जिलों के उद्योग उपायुक्तों व स्टाफ को 10 फीसदी। यह कुल 86 प्रतिशत बनता है, जो कि सिर को चकराने वाला है, क्योंकि यह 80 के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के उल्लेख (85) से भी एक प्रतिशत अधिक है। विभाग में कुख्यात इस हाई एलोकेशन रेट के कारण लाभार्थी तक सिर्फ टूलकिट, सिलाई व वाशिंग मशीन, आयरन प्रेस ही पहुंच पा रही है क्योंकि कचित्त कोऑर्डिनेटर के हिस्से आए 35 हजार में से उसे सारे खर्चे भी निकालने हैं। राजीव गांधी ने कहा था कि केंद्र से भेजे गए एक रुपए में सिर्फ 15 पैसे ही लाभार्थी तक पहुंचते हैं। इस मामले में तो 14 पैसे ही मौके तक पहुंच रहे हैं इंफ्रा, फूड व ट्रेनिंग के नाम पर। अभी इस बात की जांच जारी है कि पूरे के पूरे काई लाख तो ठिकाने नहीं लगाए जा रहे हैं। नीचे से ऊपर तक जब सभी का हिस्सा लग गया तो क्या जरूरत है फर्नीचर व भवन की, भोजन की और प्रशिक्षण की, क्योंकि सत्यापन के लिए उद्योग उपायुक्त पैसे ले रहा है। उक्त तीन मव रूपी खंभों पर ही टिकी है पूरी योजना की स्लैब। माना कि इन खंभों को सारे चोर मिलकर उठा ले गए तो मोदी-योगी की महत्वाकांक्षी योजना हवा में टंगी नजर आने लगी है। चौथा अक्ष्म खंभा है दूख किट का, जिसका टेंडर अलग से होता है। उसकी अथ श्री भ्रष्टाचरण कया आगे। मागते भूत का लंगोटा पाकर लाभार्थी भी गदगद है कि न कुछ करना पड़ा और न दर्द लेना पड़ा और टूल किट भी मिल गई। उसे इस बात से क्या मतलब कि उस एक बंदे के नाम पर बेचारे सी लोगों के घरों का चूल्हा जल रहा है। इस तरह हो गया प्रशिक्षण और देश से रफूचक्कर हो गई बेरोजगारी। कफनचोरों के इस कालखंड में ऐसे ही कतिपय कुख्यात कुत्सित कुटिल कालियों के काले कारनामों व कारणों से प्रधानमंत्री ने डिजिटलाइजेशन के तहत सब कुछ ऑनलाइन कर दिया था। इसके बाद से डीबीटी के जरिये राशि सीधे लाभार्थी के खाते में भेजी जाने लगी थी, जो कि पूरी दुनिया के एक नजीर भी है और कीर्तिमान भी। हालांकि डाल-डाल व पात-पात की तर्ज पर चोट्टों ने इसमें भी गड्ढे ढूंढ़ लिए हैं और उन्हीं का लाभ उठाकर किसी तरह बच्चे पाल रहे हैं, वरना भूखों मर गए होते। इस कारण से ही वर्तमान समय को कफनचोरों का कालखंड कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी, क्योंकि भ्रष्टाचार के खिलाफ मुख्यमंत्री की जीरो टॉलरेंस पॉलिसी के बाद भी कोई सुधरने के लिए तैयार नहीं दिख रहा है।

भ्रष्ट अधिकारियों की जेब में है तबादला नीति

सरकार कुछ भी कर के और कितनी भी नीतियां बना ले, पर जो बेहा गर्छ करने पर तुले हुए हैं, वे थोनों हाथों से पैसा बटोरने में लगे हैं। एमएसएमई विभाग में ट्रांसफर एवं पोस्टिंग में सवान के भ्रष्टाचार ने मुख्यमंत्री की तमायता नीति को भी ताक पर रख दिया है। खबरें गवाह है कि तबादला भीति को बता तथा पैसे ने भी बताई है। कई विभागों में खेला तो यहां तक होता है कि ऑनलाइन आवेदन के दौरान राजधानी से ही सर्वर तक डाउन कर दिया जाता है। यही अप्त रावबानी के कई अस्पतालों का भी है, नहीं दुनिया की एक मात्र अनूठी व सबसे बड़ी योजना के तहत लाभार्थी को प्रवान किया गया आयुष्मान कार्ड तब तक कंप्यूटर स्वीकार नहीं करेगा, जब तक कि आप जेब में हाथ डालकर बड़े नोट खिदमत में नहीं पेश करेंगे। ऐसे परिवेश वालों का भला देश के बाहर के दुश्मन क्या विगाड़ सकेंगे? शासनादेश है कि जिले में अविकारी तीन वर्ष रहेगा तो कमिश्नरी में पांच वर्ष की रह सकता है, परंतु पवन अग्रवाल जैसा घाथ सात वर्ष से अधिक समय से लखनऊ में सटा है, क्योंकि हर वर्ष मोटी रकम मंत्री को खिलाता है। साथ ही ट्रेनिंग के एवज में भी मोटा पैसा मंत्री को सीधे पहुंचाता है, जिसके किस्से पूरे विभाग में चटखारे लेकर सुनाए जाते हैं। घोटाले के आरोप में यदि जेल नहीं भेजा गया तो 2025 में भी इसी या इससे बड़े पर पर राजधानी में ही सत्कार व सिस्टम के सीने पर लात रखकर मूंग चलेगा। यह हाल तब है कि जब कई बार सीएम ने सीधे खबरों का संचान लेते हुए कई विभागों व विभागीय अविकारियों पर सख्त कार्रवाई की है और पात्वर्जिता के लिए कई अहम जगहों पर उनके द्वारा भगवाए गए कैमरे भी सत्ता के गलियारों में चर्चा के केंद्र में रहे हैं। यही कारण है कि पवन ज्यादा जिलों के प्यादा लोगों को ट्रेनिंग का ‘ठेका’ लेने में सफा रहा। मुख्यमंत्री का सख्त आदेश है कि जनपद में तीन साल तथा भंठत में सात साल से अधिक जमे अधिकारियों का ट्रांसफर हो जाना चाहिए, फिर भी एमएसएमई विभाग में मोटी रकम लेकर कई अविकारियों का ट्रांसफर नहीं किया गया एवं वे अपने पदों पर जमे हुए हैं। इतना ही नहीं ज्यादा पैसे वाले वड़े अधिकारियों को मंत्री की अतिरिक्त कृपा के कारण साथ में वितों का अतिरिक्त चार्ज भी दिया गया है। पूछने पर तुर्रा यह कि कि विभाग में अधिकारियों की कमी है, जबकि आंकड़े गवाह है कि ऐसा कुछ भी नहीं है। ऐसे ही मोटे कारण से कई का प्रमोशन रोका गया है तथा कई जूनियर अधिकारियों को जिले का चार्ज दिया गया है। उक्त और निम्न ट्रांसफर सीजन में राजधानी लखनऊ में ही डेरा डाले मिलते हैं। 1- श्रीनाथ पासवान मेरठ मंडल में लगभग भी साल से तैनात है। 2- पवन अग्रवाल लगभग सात साल से राजयानी लखनऊ में तैनात है। – अमित कुमार लगभग उस साथ से गौतमबुद्धनगर में तैनात है। 4 मनोज चौरसिया लगभग पांच साल से लखनऊ में तैनात है। – रामेत्र कुमार लगभग पांच साल से मथुरा में तैनात है। 6- आगरा में अनुज के पास ज्वॉइंट कमिश्नर के साथ विते का चार्ज है। – अवीगढ़ में वीरेंद्र प्वॉइंट कमिश्नर के साथ जिले का चार्ज भी किए है। – जनपद मुरादाबाद में योगेश सचान ज्वॉइंट कमिश्नर के पद पद पर तैनात है। साथ ही जिले का चार्ज भी किए हैं। – विचागीय सूत्रों ने बताया कि वर्ष अविकारियों का प्रमोशन चूस न मिक्षणे के कारण रोका गया था। उनके कोर्ट आने के 1.5 वर्ष भाद प्रमुख सचिव द्वारा प्रमोशन किया गया। ! (उपर्युक्त सभी बिंदुओं का विभाग के रिकॉर्ड से मिलान किया जा सकता है) जिले के एक अधिकारी ने नाम न छापने की वर्त पर पीड़ा मताई कि प्रत्येक जनपद में ट्रांसफर व पोस्टिंग में 30 लाख तथा महत्वपूर्ण अभनपदों का एक से डेढ़ करोड़ का रेट है। मंत्री के भांजे, भतीजे मानवेंद्र व अभिषेक एवं थो-तीन अन्य वोग विभा डर के अधिकारियों को कांच करके ट्रांसफर पोस्टिंग के लिए बनउगाही करते हैं और पूरी ईमानदारी से ठेका लेते हैं। भात तो यहां तक बसी गई है कि कई अधिकारियों को मंत्री ने स्वयं कॉल कर जमकर का। शाल ही में चर्चा में आए संवार एप से ऐसे लोगों करें जोड़ना बहुत जरूरी था, पर वो नंवरियों के विशेष के कारण उसे खारिज कर दिया गया है। उक्त ने बताया कि जूनियर अविकारियों को सीनियर कुर्सी का चार्ज देने के उपरांत प्रत्येक वर्ष 10-15 लाख भी वसूत्री की जाती है, जिसकी पुष्टि इस तथ्य से होती है कि एमएसएमई विभाग में पिछले दो वर्ष से ट्रांसफर शून्य कर दिया जाता है। इसकी पुष्टि जनपद के अधिकारियों तथा एमएलएमई के आयुक्त एवं निदेशक से की जा सकती है। सारी बातों और तथ्यों को एक न्यूज चैनल ने भी प्रमुखता से उठाया वर और कया था कि मंत्री अपने अधीनस्थ अधिकारियों एवं अन्ध जोगों से वन एवं अनुचित मांग करते हैं, जब अधिकारियों एवं अन्य लोगों द्वारा उनकी मांगों की मानने में असमर्थमता जाहिर की जाती है तो मंत्री फर्जी शिकायतें करते हुए उन पर मानसिक दबाव बनाते हैं। पवन अग्रवाल राजधानी लखनऊ में पवेन रहने के लिए प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए पहुंचा रहा है औए सेटिंग के थम पर ही तथावता भीति को ताक पर रखकर सात साल से जम है। इसी से लगता है कि सारे कानून सिर्फ उनके लिए हैं, जिन भए व पुराने अविकारियों के पास अभी इतना वन नहीं है।

सचान की नकद लाओ, ज्यादा पाओ योजना

पारंपरिक हुनर को बढ़ावा देने व बेरोजगारों को हुनर सिखाने के बाद काम पर लगाकर परिवार चलाने व जीडीपी में योगधान देने के लायक बनाने के लिए बहुत महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री विश्वकर्मा कौशल सम्मान योजना 17 सितंबर 2023 को शुरू की गई थी। हालांकि कुछ आलोचक इसे नई बोतल में पुरानी शराब इसलिए कहते थे, क्योंकि किसी न किसी रूप में पहले से चल रही थी, बस पीएन ने इसमें कुछ सुधार करके व कुछ नई चीजें जोड़कर ऐसे लांच की थी, जिसके बाद लाखों युवाओं ने इसे हाथों-हाथ लिया था। वाईएसएसवाई के तहत 75,000 युवाओं को प्रति वर्ष ट्रेनिंग कराकर, किट देकर व जरूरत पर लोन उपलब्ध करवा कर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करना था। योजना के तहत प्रशिक्षण के लिए चार कार्यदायी संस्थाएं नामित की गईं बादी बोर्ड, आईईडीयूपी, यूपिकॉन व यूपीआईडी। इनके बीच 75,000 के लक्ष्य का बंटवारा किया गया था। नोडल एजेंसी बनाने के साथ ही भ्रष्टाचार की काली छाया के ग्रहण के साये में योजना आ गई थी। इस दौरान जिसने सबसे ज्यादा पैसा पहुंचाया, उसे सबसे ज्यादा लक्ष्य आवंटित कर दिया गया। यह बातें प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तक भी पहुंची थीं, पर बेशर्म लोग शर्मनिरपेक्ष हो चुके थे इसलिए उनकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा। 40 प्रतिशत के हिसाब से 20 करोड़ रुपए नकद देने के पश्वात् 44 जिले 44,800 प्रशिक्षुओं का लक्ष्य उद्यमिता विकास संस्था के पवन अग्रवाल को आवंटित किया गया, जो कि गत वर्ष से इस बार अधिक है। इसी हिसाब से 75 जिले का काम चार नोडल एजेंसी को आवंटित किया गया। कहते हैं कि मतभेदों के कारण मंत्री की बेटी के राशि फाउंडेशन को ट्रेनिंग प्रोग्राम नहीं मिल पा रहा है और इस वर्ष कमीशन के चक्कर में यूपीएसआईसी एक रुपए का बजट आवंटित नहीं किया गया है। कमीशन की लड़ाई के ही कारण टूलकिट वितरण के लिए भी बजट नहीं पास हो रहा है और हजारों प्रतिषु सालभर से बजट और टूलकिट का इंतजार कर रहे हैं। उन्हें रोजगार लायक बनाने के लिए 25 लोगों का वैच बनाकर 10 दिवसीय प्रशिक्षण दिया जाता है। इस दौरान उनके खाने के साथ नाश्ते व रहने की भी व्यवस्था शासनादेश द्वारा की गई है, पर शासनादेश मानता कौन है। कम से कम वह तो बिल्कुल नहीं मानता है, जो पैसा देकर काम लाता है और पैसा देकर काम चलाता है। सबके लिए सरकार ने 10-10 हजार रुपए की राशि तय की है, जो कि ढाई लाख रुपए प्रति बैच बनती है। इसी पर डाका डाला जा रहा है। शासनादेश के गड्‌ढों का लाभ उठाते हुए शात्तिर किमियागर अपने लाभ की व्यवस्था में जुट गए थे। चूंकि एनजीओ को काम देने पर रोक है इसलिए उद्यमिता विकास संस्थान लखनऊ के निदेशक पवन अग्रवाल ने अपने यहां पंजीकृत संस्थाओं के ही मुख्य कर्ता-धर्ता अध्यक्षों व डायरेक्टर के माध्यम से करवाया। इस तरह कान को घुमाकर पकड़ने के बाद वित्तीय नियमों की अनदेखी कर बगैर निविदा व प्रतियोगिता के मनमाने तरीके से चहेती संस्थाओं के प्रतिनिषियों को कार्य आवंटित कर शासकीय धनराशि का बंदरबांट किया जा रहा है। इनका व्यक्तिगत वेंडर के रूप में चयन किया गया है। यही कार्यपद्धति पिछले वित्तीय वर्षों में भी अपनाई गई और अब भी उसी तरह से पारवर्तिता के बिना काम किया जा रहा है। विभाग उनको कोऑर्डिनेटर बताकर योजना चलया रहा है व करोड़ों के भुगतान किए जा चुके हैं, जिसे नकय के रूप में वापस लेने के पर्याप्त प्रमाण उनके ही खातों की जांच में मिल जाएंगे। अग्रवाल द्वारा मनचाही और सुचारू लेन-देन वाली संस्थाओं के खाते में इंफ्रास्ट्रक्चर (बुनियादी ढांचे) व खान-पान की मद में प्रति वैच 1,55,000 (एक लाख 55 हजार) रुपए काले जाते हैं और महज 5,000 रुपए छोड़कर यह कहते हुए पूरे वापस ले लिए जाते हैं कि यह धनराशि मंत्री व उच्चाधिकारियों को भेजनी है। पवन के पास वाले 44 जिले का लक्ष्य 44,800 है। हर वैच में विभिन्न योजनाओं के 25 प्रशिशु होते हैं। 44,800 में 25-25 व्यक्तियों के 1,792 बैच बनते हैं। इसे 1,50,000 से गुणा करने पर करीब 27 करोड़ की लूट कथित रूप से मंत्री व उच्चाधिकारियों के लिए की जा रही है। इस तरह 75 जिले के हिसाब से 45 करोड़ रुपये की खुली लूट चल रही है। बाकी बचे 95,000 रुपए तीसरी पानी प्रशिक्षण मद में प्रप्ति वैच दिए जाते हैं, लेकिन वह भी सिर्फ कागजों पर। शासनादेश में इस रकम का उल्लेख उद्घाटन समापन, स्टेशनरी, टीओटी, कच्चा माल व यात्रा व्यय आदि के रूप में किया गया है। विभागीय शातिर यह भुगतान भी तीन अलग-अलग तरीके से जीएसटी फर्म, व्यक्तिगत खाते व सोसायटी फर्म के खाते में करते हैं, जिससे साबित हो कि पैसा कोऑर्डिनेटर को ही जा रहा है और घोटाला पकड़ में न आए। चौंकाने वाला तथ्य यह है कि उक्त में से भी 35,000 रुपए प्रति बैच (25 प्रशिखु) कमीशन के रूप में वापस ले लिए जाते हैं, जिसे 3000 बैच से गुष्णा किया जाए तो घोटाला धनराशि 10 करोड़ 50 लाख बनती है। साफ है कि बाई लाख का काम 60,000 रुपए प्रति बैच की दर से कोऑर्डिनेटर को दिया जाता है। यह जानकर और हैरानी होगी कि इसमें से भी 25,000 रुपए प्रति वैच (25 लोग) योजना चलाने एवं सत्यापन आदि के नाम पर जिला उपायुक्त उधोग द्वारा हर जिले में लिए जा रहे हैं, जिसे भी 3000 मैच से गुणा करने पर सात करोड़ 50 लाख रुपए बनते हैं। सोचने की बात है कि बाकी 35,000 रुपए से 25 लोगों के बैच को पेट भरने के लिए कैसे हुनर सिखाकर कुशल बनाया जा सकेगा, जब जिले से लेकर राजधानी तक के विभागीय लोगों का ही पेट नहीं भर पा रहा है। ऐसे में कार्य कैसा हो रहा है, कैसे किया जा रहा है और सरकार की प्राथमिकता वाली योजनाओं का मंत्री के नेतृत्व में विवीलियों ने क्या हाल बना रखा है, इसे आसानी से समझा जा सकता है? अहम है कि 35,000 रुपए में से कोऑर्डिनेटर को मुनाफा निकालना है, ट्रेनर की फीस, चाय-नास्ता व बिजली का बिल, बैठने के अलावा अस्तुओं के हिसाब से हवा-पानी का प्रबंध, यात्रा व्यय व भवन का किराया आदि देना है। इंफ्रा व फूड की मद में 1,55,000 रुपए डालकर निकालने की जांच करवा ली जाए कि कितने के विल व वाउचर विभाग व संस्थाओं के पास है? कितने रुपए के राशन आदि की खरीद हुई है और कितने की जीएसटी भरी गई है? इतना ही नहीं, कोऑर्डिनेटर से बिल बुक के इनवॉइस नंबर लेकर बताया जाता है कि इस नंबर से इस नंबर तक के बिल आपको नहीं काटने हैं। उन नंबरों के बिलों की विभागीय कर्मचारी अपने हिसाब से काटते (विलिंग) हैं। इस बारे में न कोऑर्डिनेटर को पता होता है और न ही संस्था को कि किस मद में बिल काटे गए हैं? चोर का दिल कितना बड़ा होता है, पूछताछ मात्र से ही हिल जाएगा और दूध का दूध व पानी का पानी हो जाएगा। इस तरह मंत्री व विभाग की मशीनरी 75 जिले में प्रति वर्ष करीब 45 करोड़ की डकैती डाल रहे हैं। इस बारे में सवाल करने पर अधिकारी दबी जुबान स्वीकार कर रहे है कि हम मजबूर है पैसे की वसूली के लिए, क्योंकि उच्चाधिकारियों को मंत्री को भेजना है। सूत्रों ने बताया कि 20 करोड़ रुपए नकद देकर पवन 44 जिले के लाभार्थियों को प्रशिक्षण देने का काम लेकर आया है। उसकी नोडल एजेंसी का नाम है उद्यमिता विकास संस्थान, जिसका वह निदेशक है। चूंकि पैसा है इसीलिए सात साल से लखनऊ में जमा है, नहीं तो कौन सा सुर्खाव के पर लगे हैं गंजे सिर पर। ये बातें जब जनता तक पहुंचती हैं तो आज के सोशल मीडिया के दौर में रोज चर्चा का विषय बनती है, जिनका जवान देते नहीं बन रहा है भाजपा के समर्थकों व सक्रिय कार्यकर्ताओं को। उस वक्त न कोई मंत्री सचान आगे आता है, न कोई पवन, न ही मंत्री के परिजन और न ही मंत्री के नूर से रोशन चांदी जैसी चांदनी की चमक चूमने व चाटने-पोछने वाली चांडाल चौकड़ी चठिया के चरण चुंवक चंदन, नंदन व वंदन चमचे। सुबूत चीख रहे हो तो फिर जनहित में जनता की खुशी के लिए क्यों एसआईटी गठित कर पूरे प्रकरण की जांच करवा ली जाए? क्यों न दोषी पाने जाने वालों से उक्त घोटाले की धनराशि की वसूली की जाए और क्यों न दंडात्मक कार्रवाई करते हुए जेल भेजकर जनता की नजर में नजीर स्थापित की जाए? इससे जहां हजार गुना ज्यादा ईमानवार जनता द्वारा खून-पसीने की कमाई से भरे जा रहे टैक्स से भरे गए राजकोष की लूट को रोका जा सकेगा, वहीं सरकार की भी साख जनता के बीच गिरने से बची रहेगी, जिससे करोड़ों लोग बाबा की बम-बम करेंगे। साथ ही अरबों रुपए खर्च कर युवाओं को रोजगार देने के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सपने को भी साकार किया जा सकेगा।

जवाबदेही : लोकतंत्र का पांचवां स्तम्भ

सरकार ने प्रदेश के लाखों बेरोजगार हाथों को काम देकर समाज में सिर उठाकर सम्मान से जीने का मौका प्रदान करने के लिए पीएम विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना शुरू की थी, जिसने दो साल की ही आयु में दम तोड़ दिया है। उसकी हत्या के जिम्मेदार हैं सरकारी चोट्टे, पर कोई भी चोर जिम्मा नहीं ले रहा है। लोकतंत्र में सवाल होंगे और जवाब भी किसी न किसी फोरम पर देना होगा। जवाबदेही के बिना कैसा लोकतंत्र, क्योंकि यही पांचवां स्तम्भ है, जिसके बारे में सिर्फ जागरूक लोग ही जानते हैं और जो चोट्टे जानते भी हैं, वे घटिया लोग अंजान बनने का स्वांग रचते हैं एक नौटंकी के नचनिया (कलाकार) की तरह। इसके जानने में मंत्री व उनके चिंटू का करोड़ों का घाटा है, क्योंकि राजकोष इन सबके पिता जी ही तो छोड़ गए थे चाटने-पोछने के लिए। इन मामलों में कोई चोट्टा यह भी नहीं कहता कि पिता तक नहीं जाना। कह भी नहीं सकता, क्योंकि बेशर्मी के कारण गैरत मर गई है। राजकोष के लुटेरों की जवाबदेही तय न होने के ही कारण चीजों से लोगों का विश्वास उठता जा रहा है। जज के घर से नोट जलने का वीडियो लोकल से ग्लोबल होने के बाद आज तक कोई कार्रवाई न होने के कारण से लोग कहने लगे हैं कि सभी चोर-चोर मौसेरे भाई हैं। यह तथ्य कम ही लोगों को पता है कि लोकपाल की व्यवस्था नख व दंत विहीन जैसी है और शासन के पास करीब 300 छोटे, बड़े व मंझोले अधिकारियों की फाइलें जांच की मंजूरी के लिए पड़ी हैं, जिन पर बीते तीन दशक में तीन किलो मोटी धूल जम चुकी है। सूत्रों ने बताया कि कई की फाइलें गायब हो चुकी हैं। इनमें से एक-तिहाई के करीब रिटायर हो चुके हैं। नियमों की बात करें तो रिटायरमेंट के चार साल बाद सरकार भी जांच कराने का आदेश देने का हक खो देती है। चेक एंड बैलेंस के लिए ही दायित्वों को तीन स्तंभों के बीच बांटा गया था ताकि कोई भी अराजक न होने पाए, पर यहां तो कुएं में ही भांग गिर पड़ी है। जैसे, सभी खंभों में कोई प्रतियोगिता चल रही हो कि कौन है सबसे बड़ा लुटेरा? सरकारी खजाना जनता की जागीर है और जनता के पिता की जागीर है, न कि किसी किसी लुटेरे के पिता की। इसमें बढ़ई, लोहार, धोबी, कुम्हार, दर्जी, सुनार, मोची, हलवाई, नाई व राज मिस्त्री आदि के नामों से जानी जाने वाले लोग भी बड़ी संख्या में शामिल हैं। सनातन परंपरा में उनका अपना महत्व है। इनमें से अधिकांश अच्छे के साथ बुरे कार्यक्रमों का भी अभिन्न अंग हजारों साल से रहे हैं। किसी के बुरा मानने की बात नहीं, राजा के साथ प्रजा का सदा-सदा से उल्लेख होता रहा है यानी कि राजा भी उनके बिना अधूरा था। शास्त्रों में भी उनका उल्लेख मिलता है। उक्त को प्रशिक्षण देकर उनके हुनर को सम्मान प्रदान करने का काम सरकार ने युद्ध स्तर पर शुरू किया था। यह जानकर सुधी लोग माथा पीट लेंगे कि सिस्टम के तथाकथित इन अभिजात्य ने प्रजा के हक पर डाला डाल दिया है इसीलिए इन्हें कफनचोर की संज्ञा दी जा रही है। वैसे कथाकार मुंशी प्रेमचंद्र और धर्मवीर भारती ने अपनी कथाओं में विभिन्न तरीकों से कफनचोर की व्याख्या की है। किसी ने गरीबी से जोड़ा है तो किसी ने गलीची से। इन दोनों का श्रेष्ठ साम्य देखना हो तो फिर सियायत है न।

अपनों को रेवड़ी बांटने में अद्वितीय हैं सचान

प्रदेश के एमएसएमई मंत्री राकेश सचान ऐसे मंत्री हैं, जो योगी सरकार की किरकिट कराने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। बेरोजगारी दूर करने व प्रदेश की जीडीपी में बड़ योगदान देने वाली विभाग की एमएसएमई, ओडीओपी व वीएसएसवाई जैसी फ्लैगशि योजनाओं की भी ऐसी-तैसी करने पर तुले हुए हैं। सीएम व पीएम का नाम जुड़ा होने क बाद वह शर्म व संकोच से परे होकर सपरिवार उगाही में लगे हुए हैं। 2022 में मंत्री बनने के बाद से ही राकेश बनउगाही में जुट गया था। कई कुख्यात मंत्रियों का इतिहास गवाह कि परिजन साले व भाई-भतीजे जब-जब विभाग में मंडराने लगें तो समझो कि मामला गड़बड़ है। शासन की नाक के नीचे बैठकर सरकार द्वारा गरीब वयस्कों के लिए चलान जा रही उक्त योजना के तहत दिनदहाड़े डाका डालने का काम चल रहा है। बेटे, बेटी और भतीजे को विभाग में लहलहा रही करोड़ों की फसल को दोनों हाथों से काटने क ठेका दे दिया है। शुरुआती दौर में ही मंत्री ने अपने भतीजे मानवेंद्र एवं अभिषेक सचा को फिट कर दिया था, जो विभाग में आम ठेकेदारी से लेकर ट्रांसफर व पोस्टिंग की ठेकेदारी भी करने लगे थे। ओडीओपी, विश्वकर्मा श्रम सम्मान के प्रशिक्षण कार्य हिस्सेदारी, टूलकिट की खरीद और मैनपॉवर आउटसोर्सिंग कर्मियों की सैलरी में हिस्सा लेने लगे थे। आलम यह है कि अधिकारी भी उनके आगे-पीछे लगे रहते हैं व कोपभाजन बनने से बचने के लिए जी-हुजूरी करते हैं और उनका हर तरह से पूरा ख्याल रखते हैं प्रपत्रों से पता चला कि राकेश सचान ने खादी विभाग में मैनपॉवर आउटसोर्सिंग की बिक अपने बेटे अभिनव तथा भतीजे मानवेंद्र व अभिषेक सचान की फर्म नील डेटा प्रो आईट सोल्यूशन प्राइवेट लिमिटेड को दिलाने के लिए विभाग के अधिकारियों को आदेश दिया क्योंकि उनका वास्ता चाल, चरित्र व चेहरे से कभी रहा नहीं। याद होगा कि प्रधानमंत्री सुचिता के तहत कई मंत्रियों के सजातीय या रिश्तेदार ओएसडी तक को बदलने क आदेश दिया था। इसके बावजूद यह भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा ही है कि विभाग का मंत्री एक खादी बोर्ड का पदेन अध्यक्ष अपने बेटे तथा भतीजों की फर्म को विभाग में ही बिड दिलान के लिए जोर लगाए। उन्होंने नियमों एवं शर्तों में कई बदलाव को मंजूरी देते हुए बिड क क्यूसीबीएस फार्मेट में प्रकाशित कराते हुए फर्म को बिड एलॉट कराने का पुनः प्रयास किया, जिसकी पुष्टि खादी बोर्ड में संरक्षित पत्रावलियों से की जा सकती है। मंत्री को मुंब की तब खानी पड़ी, जब अन्य फर्मों के भारी विरोध के कारण मजबूरन विड कैसिल करनी पड़ी। दृष्टांत मीडिया हाउस के हाथ लगे साक्ष्यों के मुताबिक, सारा खेला संस्थाआ को नोडल एजेंसी नामित कराने का है। उद्यमिता विकास संस्थान लखनऊ के निदेशक पवन अग्रवाल ने नोडल एजेंसी बनने के लिए 20 करोड़ रुपये नकद मंत्री राकेश सचान को दिए हैं, तब उक्त संस्थान को 44 जिलों के 44,800 लाभार्थियों को ट्रेनिंग देने क जिम्मा मिला है। चूंकि दूसरे संस्थान नोडल एजेंसी बनने के लिए इतना नहीं दे पाए ता अपेक्षाकृत उन्हें कम यानी कि 14 जिले में 14,825 का लक्ष्य, 11 जिले में 10,150 क और छह जिले के करीब 6,000 लाभार्थियों को प्रशिक्षित करने का जिम्मा मिला है। अन्य संस्थाओं के क्रमशः नाम हैं, यूपी इंडस्ट्रियल कंसलटेंट लिमिटेड (यूपिकॉन), उत्तर प्रदेश खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड तिलक मार्ग लखनऊ व यूपीआईडी लखनऊ। अन्य की कुंडल पर भी विभाग में शोय चल रहा है। बताते तो यहां तक हैं कि मनमानी से आजिज आक आयुक्त एवं निवेशक उद्योग के. विजयेंद्र पांडियन ने ओडीओपी योजना का काम अन्य संस्थाओं के हवाले किया था। इसे लेकर मंत्री और निदेशक में खींचतान की भी विभाग स लेकर मीडिया तक खासी चर्चा रही। मंत्री दबाव बनाकर ऑर्डर कैंसिल कराने में सफल हो गए थे, जिसका नतीजा है कि साल खत्म होने पर है और आज तक ट्रेनिंग शुरू नहीं हो पाई है। मौखिक सुबूत के लिए इतना ही काफी है कि जो विभाग या संस्थाएं सीब मंत्री के अधीनस्थ आती हैं, उन्हें कुल 75 में से 61 जिले के 61,000 के करीब प्रशिक्षुआ को प्रशिक्षण देने का जिम्मा मिला है। विभाग के बाहर की संस्था को काफी पापड़ बेलने क बाद सिर्फ 14 जिले का काम मिल सका है। मोटे बजट में मोटा हिस्सा पाने वाली संस्थाम उद्यमिता विकास संस्थान तथा यूपिकॉन के भ्रष्टाचार की वजह से ही दोनों संस्थाओं प इनकम टैक्स विभाग की रेड भी पीछे पड़ी थी एवं भारी गोलमाल के कारण विभाग क एक सीनियर अधिकारी राजेश यादव सस्पेंड भी किया गया था। शायद ऐसे ही कारण स छह जिले का काम बाहर की भी एजेंसी को दे दिया गया है। ज्ञात हो कि दो वर्ष विश्वकर्मा योजना के तहत टूलकिट भी प्रशिक्षुओं को नहीं बांटी जा सकी है। विभाग के ह सूत्रों ने बताया कि 40 फीसदी कमीशन पर कोई काम करने के लिए तैयार नहीं है क्योंकि शासनादेश में टूलकिट में दी जाने वाली मशीनों के ब्रांड तक साफ-साफ लिखे हैं यानी कि उसमें तीन-पांच (लूप होल्स) करने का अभी कोई रास्ता मंत्री के किमियाग चेले नहीं बना पाए हैं और कमीशनखोरी के चक्कर में टूलकिट की फाइल समय से साइन नहीं हो पाई है। इस तरह 2024 के लाभार्थियों को टूलकिट नहीं बटि जाने के कारण सरकार की लाभकारी योजना का जरूरतमंदों को सीधा फायदा नहीं मिला पा रहा है। कल जनपदों के एक बहुत बड़े वंचित वर्ग में सरकार के प्रति नाराजगी पाई जा रही है।

आठ माह से योजना ठप, संपत्ति नौ गुना बढ़ी

इस वर्ष भी जो प्रशिक्षण अप्रैल तक शुरू हो जाना चाहिए था, वो नवंबर माह तक भी शुरू नहीं हो पाया है। ओडीओपी का प्रशिक्षण टारगेट आवंटित होने के उपरांत टारगेट वापस ले लिया गया, क्योंकि मंत्री के चहेते विभागों को टारगेट मन मुताबिक नहीं मिला था, जिसकी पुष्टि आयुक्त एवं निदेशक से की जा सकती है। कई जिले के लाभार्थियों ने शिकायत की है कि उनके चयन में 500, मानदेय में से आधी धनराशि तथा टूलकिट के लिए 2,000-3,000 धनराशि की मांग की है। कुछ लाभार्थियों के शिकायत के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल भी हुए हैं, जिनकी पुष्टि दृष्टांत मीडिया हाउस नहीं करता है। जनपद ललितपुर में लगभग 200 महिलाओं ने इसी भ्रष्टाचार के चलते एमएसएमई के जिला कार्यालय को घेर कर धरना व प्रदर्शन किया था, जिसका वीडियो न्यूज चैनलों पर भी प्रमुखता से दिखाया गया। इसी जनपद के विभागीय अधिकारी सूर्यवंशी को एंटी करप्शन टीम ने घूसघोरी में गिरफ्तार किया। एक अन्य अधिकारी ने बताया कि मंत्री द्वारा जिले के विभागीय अधिकारियों से प्रत्येक माह वसूली के कारण जिले के अधिकारियों ने प्रशिक्षण कार्यक्रम में यूपीआईडी के डिजाइनरों से धनराशि मांगी। कई जनपदों में जहां प्रशिक्षण चल रहा था, वहां के उपायुक्त उद्योगों को पैसा देना पड़ा। उनसे पूछा गया तो बताया कि हर माह मंत्री को जो पैसा जाता है, वो हम जेब से तो नहीं देंगे। उल्लेखनीय है कि मंत्री के पीआरओ भरत उत्तम द्वारा प्रत्येक माह यूपीआईडी से धनराशि मांगी जा रही है, जिस पर संस्थान ने हाथ खड़े कर दिए हैं इसीलिए उसका काम सिर्फ छह जिले तक सीमित कर दिया गया है, जबकि चहेती संस्थाओं उद्यमिता विकास संस्थान एवं यूपिकॉन को मंत्री के कहने पर कुल का 80 प्रतिशत से अधिक टारगेट (ओडीओपी एवं विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना) दिया गया है। ऐसे में जरूरी हो गया है कि मंत्री के होटल, स्कूल-कॉलेज, लखनऊ में कांप्लेक्स, प्लॉट, मकान, जमीन-जायदाद व नामी-बेनामी सहित गेस्ट हाउस व पेट्रोल पंप आदि की जांच संपत्ति लोकहित में तुरंत कराई जाए ताकि कानून के राज में लोग राहत की सांस ले सकें और उन्हें लगे कि कानून हर छोटे-बड़े के लिए बराबर है व विभेद नहीं करता है। यह सब यूं ही नहीं है, बल्कि 2007 में राकेश की घोषित संपत्ति 3,61,86,633 थी, जो 2019 में सीधे करीब 10 गुना बढ़कर 35,06,70,770 हो गई थी। उसके बाद के छह साल में क्या कहने, क्योंकि कमाऊ विभाग के तीन साल से मंत्री जो हैं। बिड की तरह ही मीडिया में आम हुए किस्से के मुताबिक, एमएसएमई विभाग के 72 प्लॉट भी अपनी संस्था के नाम पर एलॉट कराए थे, जिन्हें शिकायत के बाद वापस लौटाना पड़ा था, पर लज्जा नहीं आई।

72 प्लॉट के मामले में होते-होते बचा था अपमान

‘भाजपा के समीकरणों में फिट राकेश सचान को अनफिट (अविकसित) फतेश्पुर का प्रभारी मंत्री बनाया गया है। मुख्यमंत्री ने उन्हें एमएसएमई, चाची, ग्रामोधोग, रेशम उत्पादन व वस्त्र जैसे अहम विभाग दिए थे, जिनके वारे में सपने में भी उन्होंने सायद ही सोचा हो। मुख्यमंत्री द्वारा दी गई अहमियत को वह पचा नहीं पाए। गलत कामों के कारण जहां नकारात्मक सुर्खियों में रहते हैं, वहीं कई बार सरकार को भी नीचा दिखा चुके हैं। आरएसएस के एक संगठन लघु उद्योग भारती के जिला अध्यक्ष सत्थर सिंह ने पूरे मामले का खुलासा किया था। उद्योग आयुक्त से शिकायत में कहा था कि फतेहपुर औद्योगिक आस्थान के 72 प्लॉट उन्होंने अपने नाम करवा लिए थे। भौकाल ऐसा कि विभाग के चंगू-मंगू पैसे भी नहीं जमा करवा पा रहे थे और खौफ ऐसा कि भीए तक का जरा सा इशारा भर होने पर कर्मचारी-अधिकारी खुद ही पैसा जमा कर देते। आलम यह है कि सार्वजनिक मंचों पर बात की जाती है प्रदेश व प्रदेशवासियों के भले की, जबकि हालात ठीक उलट है। मंत्री तक अपने ही कल्याणा में लगे हुए हैं। कई मंत्रियों पर आरोप लगते रहे हैं कि वे जनहित के बजाय स्वहित के लिए जी रहे हैं। प्लॉट वम के फटने के बाद जिले से लेकर लखनऊ होते हुए दिल्ली तक मंत्री महोदय की काफी यू-यू हुई थी, क्योंकि तब वह सांसद थे। उन्होंने कहा था कि हम प्लॉट वापस कर रहे हैं। यहां कोई (प्लॉट) लेना नहीं चाहता था तो विभाग ने सब जबरदस्ती दे दिए थे। मंत्री के इस कूश्य से ज्याषा आश्चर्यजनक रहा प्रदेश के विपक्षी दलों का मौन शायद इसीलिए सियासत के बारे में नया जाता है ‘चोर-चोर मौसेरे भाई’। चाल, चरित्र और चेहरे के दावे के बीच जिलाध्यक्ष ने जो बम फोड़ा है, उसके वाब तो कुर्सी चली जानी चाहिए वी, पर न जाने वाणियों को भी गले लगाकर रखने की कौन सी मजबूरी है। संघ जैसी सुचिता हालांकि सियासी इलों में कहां रखी, लेकिन अगर होती तो चार चांद लगने से भला कौन रोक सकता था? सत्येंद्र सिंह का कहना था कि हम चाहते हैं कि फतेहपुर आगे बढ़े। छोटे उद्यमियों को आगे बढ़ने का पूरा मौका और माहौल दिया जाए। हम लोग सब्वाई की राह पर हैं। गलत को गलत बताने में संकोच कैसा? नैतिकता के आधार पर इस्तीफा के सवाल पर मुस्करा कर सत्येंद्र का जवाब था कि मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री की साफ छवि है। अष्ट नेताओं को देखकर लगता है कि उन्हें सिर्फ अपने विकास से मतलब है। देश को योगी-मोदी जैसे नेताओं की जरूरत है तो एक मंत्री के लिए सरकार को दोष नहीं दिया जा सकता। संगठन के जिलाध्यक्ष का कहना था कि जिले में उद्योगों को बढ़ाया देने वाली सरकारी नीति के प्रथार के दौरान स्थानीय मुद्रयों को समझने के नजरिए से बात की तो पता चला कि उद्योग लगाने के लिए तैयार है। औद्योगिक स्थानों में कई को प्लॉट भी आवंटित कर दिए गए हैं, पर एक भी इकाई नहीं चल रही है और एमएसएमई मंत्री के नाम पर 72 प्लॉट आवंटित है। पत्र में सत्येंद्र ने लिखा था कि जिले के फूल आठ औद्योगिक क्षेत्रों में से एक मिनी क्षेत्र चकडाता में 36 भूखंड है, जिनमें से 32 आवंटित हैं और चार रिक्त। अहम है कि 32 में एक भी इकाई स्थापित था संचालित नहीं है और सारे के सारे 32 (एक से 17 और 22 से 36) एक ही व्यक्ति राकेश सथान के नाम आवंटित हैं, जिनका पता अक्षात है। मिनी औधोगिक क्षेत्र सुबवापुर में कुल 45 भूखंडों में से 40 आवंटित तथा पांच रिक्त है। आवंटित में से एक इकाई है, जो संचावित नहीं है। है और 40 मूखंड (नंवर एक से 40) एक ही व्यक्ति राकेश सथान के नाम है, जिनका पता जशात है। सत्येंत्र का दावा था कि कुल मिलाकर 7,000 से 7,500 वर्ग मीटर भूमि मंत्री को आवंटित वी और निर्धारित शुल्क तक नहीं जमा है। बताते हैं कि यह आवंटन 2012 का है, जब वह सांसद हुआ करते थे। झलांकि विभाग की कृपा से भूखंड आवंटन का सात पक्के तौर पर क्लियर ALL M नहीं हो पा रहा है। चूंकि उनका विभाग वही है तो लोगों का कहना है कि दावे में कोई झोल है। आवंटन विवादं से जुड़ी तस्वीर वायरल हुई थी, जिसमें चकहाता में एक अस्थायी गोशाला नजर आ रही थी। सत्थद्र ने कहर था कि मंत्री के औद्योगिक प्लॉट पर अत्यापी गोशाला पाई गई थी। दूसरे, नई प्लॉट पर मौरंग के ढेर लगे हुए ये। चले ही राकेश ने कहा हो कि आवंटन खुली प्रक्रिया है। डीएम की अध्यक्षता में चयन समिति है, परे आवेदन करेगा, उसे मिलेगा। अभी एक में गोशाला बना रखी है। कोई वहां लेना ही नहीं चाहता, हमें भी जबरन दिए गए थे। एक सवाल पर मंत्री ने कहा था कि बेरोजगार हो या कोई और, भी में थोड़े ही न आवंटित हो रहे थे। विना यस प्रतिशत राशि के भुगतान के आवंटन पर मंत्री ने इधर-उधर की बातें करते हुए कहा था कि लोग अब भी नहीं ले रहे हैं। इतने खाली पड़े हैं, हम तो कह रहे हैं कि आकर लीजिए। उद्योग विभाग के जीएम अंजनीश प्रताप सिंह के अनुसार आवंटन की रकम जमा नहीं थी, जिसकी रिकवरी की कार्रवाई शुरू की गई थी। उससे पहले ही मंत्री ने लॉट सरेंडर कर दिए थे। अहम वात है कि इन 72 प्लॉट का जिक्र राकेश सचान ने कानपुर देवत (अकबरपुर) की भोगनीपुर सीट से नामांकन दाखिल करने के दौरान नहीं किया था। यह कोई हवा-हवाई दावा न होकर एसोसिएशन फॉर डेमोकेटिक रिफॉर्म्स की वेबसाइट पर उपलब्ध कागजात से पता चला है। इससे हासिल चुनावी हलफनामे में राकेश सवान ने इन संपत्तियों का जिक्र नहीं किया है, जो कि अपराध है। यह ठीक वैसा ही है, जैसे किसी पर 72 मुकदमे दर्ज हों और वह सारे के सारे पचा जाए औरं एक भी न बताए। दूसरी ओर, राकेश की जिन संपतियों का विवरण उपलब्ध है, उसमें गाणियाचार, नोएडा, कानपुर और लखनऊ में कुल छह गैर कृषि भूखंडों का जिक्र है। इस बारे में सचान की तरफ से कोई आधिकारिक बयान नहीं आ सका है, क्योंकि उनके निजी सचिव कुछ न कुछ कयाएं बताते रहते हैं।

अवैध राइफल केस में सजा होने पर फाइल लेकर भागे

अदूचे और कटू‌टे सारे के सारे एक ही थैली के चट्टे-बटूटे हैं इसीलिए उन्हें चोर-चोर मौसेरे भाई भी दशकों से कहा जाता रहा है। अवैष राइफल के साथ कानपुर में पकड़े गए सवान से चो‌ट्टों की कितनी ट्यूनिंग वन गई है, विश्वकर्मा योजना उसकी बानगी भर है? बात हो रही है उन्हीं मंत्री की, जिन्होंने अपने नाम 72 सरकारी प्लॉट का आवंटन करवा लिया था सांसद बनने के बाद। किस्मत के इतने धनी निकले कि समीकरणों में फिट होने के कारण मुख्यमंत्री की कृपा से बाद में वही विभाग भी मिल गया, फिर क्या अगर कहीं कागजों में कोई कमी रह भी गई होगी तो वावुओं ने खुप्त करने के लिए दूर कर दी होगी। इतना ही नहीं, एक बार मन के मुताबिक, कानपुर के जज ने फैसला नहीं देने व सजा होने पर फाइल ही लेकर भाग खड़े हुए थे। ऐसे में हमारे लोकतंत्र के खेवनहार मंत्री, जिनका अतीत इतना शानदार रहा है। राकेश दबंग रहे हैं व छात्र नेता भी। इसी कारण विवादों से उनका पुराना नाता रहा है। उन पर छात्र जीवन से ही कई मुकदमे चल रहे हैं। रोचक है कि अवैध असलहा (राइफल) रखने के 1991 के एक मामले में उनको दोषी करार दिया गया तो वह वकील की मदद से फैसले की मूल कॉपी ही लेकर फरार हो गए थे। ज्ञात हो कि कानपुर के नौबस्ता इलाके में 31 साल पहले नृपेंद्र सचान व दो अन्य की हत्या हो गई थी। उस समय उनको नौबस्ता एसओ ने राइफल के साथ पकड़ा था, जिसका लाइसेंस उनके पास नहीं था। उन्होंने राइफल नाना की बताई थी। यही मुकदमा तव से चल रहा था। 2022 में एसीएमएम-थर्ड ने एक साल की सजा देने के साथ 1500 रुपए जुर्माना लगाया तो राकेश पत्रावली खेकर भाग गए थे, जिसके बाद कोर्ट की रीडर ने मंत्री पर एफआईआर की तहरीर दी थी। तीन मुकदमे और चल रहे हैं। इनमें थो ग्वालटोली थाने में दर्ज हुए थे, जबकि एक कोतवाली में। यह भी आर्म्स एक्ट का केस है, जबकि दूसरे मारपीट व इमले के। तीसरा हिंदी भवन में बवाल करने का है। राकेश ने 2014 में शपथ पत्र में आठ मुकदमों का जिक्र किया था। एक में बरी हो चुके हैं। राकेश से मुख्यमों का बोझ कम करने के प्रयास सपा ने अपने दौर में किया था तो भाजपा ने भी वैसा ही किया, लेकिन मामल किन्हीं कारणों से लटका है। ज्ञात हो कि सचान पहले फतेहपुर से सपा सांसद रह चुके हैं, तभी उक्त पाप किया था, क्योंकि उनकी सरकार थी और इसी कारण तूती बोलती थी। उनकी भाजपा में एंट्री 2022 के विधानसभा चुनाव में हुई। उन्हें फतेहपुर में कुर्मी बिरादरी का कद्दावर नेता माना जाता है। घाटमपुर से सपा से चुनाव जीतने के बाद मंत्री बनाए गए थे। राजनीतिक पारी 1993 में सपा से शुरू हुई थी। 2009 में लोकसभा पहुंचे थे, पर 2014 में हार गए। 2019 में कांग्रेस में पहुंच कर प्रदेश महासचिव बने व 2022 में चुनाव से ठीक पहले बीजेपी से जुड़ गए थे। बाद में फतेहपुर के प्रभारी मंत्री बना दिए गए थे।

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