खतरनाक होती रफ्तार

अपनों व सपनों को जोड़ने के लिए बनाए गए हाई-वे और एक्सप्रेस-वे सर्कस वाले मौत के कुएं जैसे साबित हो रहे हैं। वे आज बड़ी संख्या में जवानी व जिंदगी निगल रहे हैं। ज्ञात हो कि देश में हर साल सड़क दुर्घटनाओं में करीब डेढ़ लाख मौत हो रही हैं। हाल ही में श्रृंखलाबद्ध हुई बड़ी सड़क दुर्घटनाओं ने सिस्टम को हिलाकर रख दिया, जिसके बाद कोई एक्सप्रेस-वे के डिजाइन को कोसता नजर आया तो कोई मशीनरी को कठघरे में खड़ा करते हुए। आरोपों की इस रेस में लग्जरी बसों के मालिक भी पीछे नहीं बताए जा रहे हैं। लोगों के पास पैसा बहुत है और कंपटीशन भी बहुत, जिसके कारण जनता की जान की कीमत पर ड्राइवरों पर भी बसें दौड़ाने का दबाव रहता है। इन बसों की औसत स्पीड 100 किमी की बताई जाती है, जबकि देश की बड़ी-बड़ी मेल व एक्सप्रेस ट्रेनों की औसत स्पीड 50 ही मानी जाती है। कुछ ट्रैक हैं, जहां अब यह बढ़कर 60 किमी प्रति घंटे हो सकी है। सौ की औसत स्पीड तो अभी देश की चंद ट्रेन ही निकाल पा रही हैं। जांच से पता चला है कि यांत्रिक खराबी, ड्राइवरों का खराब आत्मानुशासन और सुरक्षा नियमों के क्रियान्वयन की कमी मिलकर मौत का एक ऐसा बवंडर बना रहे हैं, जो हर माह अनमोल जिंदगियों को निगल रहा है। सिर्फ अक्टूबर की बात करें तो देश के कई हाईवे और एक्सप्रेस-वे बस हादसों और आग के गवाह बने। वे सड़क हादसों के पर्याय से नजर आए। शेवेला, कुरनूल, जयपुर, जैसलमेर, उन्नाव, लखनऊ व आगरा के दर्जनभर हादसों में सौ के करीब परिवार दंश झेलते रहेंगे जिंदगी भर, उसका क्या? तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और गुजरात में हुई भयानक दुर्घटनाओं में 75 से अधिक लोग मारे गए।

देश के कुल हादसों के कुल मृतकों की संख्या तो कहीं अधिक होगी। यहां सिर्फ कुछ कुख्यात हावसों की बात हो रही है। दुःखद यह है कि कई दर्जन लोगों के लिए तो जिंदा में ही बस चिता बन गई। इन घटनाओं ने यात्रियों की सुरक्षा पर कई गंभीर सवाल उठाए। भले ही बहुत कुछ गंवाने के बाद सुधार व कार्रवाई देर से हो रही है, पर हो रही है। इन हादसों में मशीन से ज्यादा सरकारी मशीनरी की संलिप्तता पाई गई। कार्रवाई भी हुई, पर इतने बड़े भ्रष्ट तंत्र के लिए हर कार्रवाई ऊंट के मुंह में जीरा साचित हो रही है और जीरा ही साबित होती रहेगी। हर हादसे के बाद सरकार तुरंत जागकर कई नए निर्देश जारी कर देती है, जिन्हें भुलाने में चंद हफ्ते भी हीठता के लिए मशहूर मोटी चमड़ी व मोटी पगार लेने वाली कुख्यात मशीनरी नहीं लगाती है। आगे फिर हादसे होने पर अधिकारी जागेंगे, नमूने के लिए कार्रवाई करेंगे और नोटों के बिस्तर पर फिर सो जाएंगे। खुला खेल फर्रुखाचादी चल रहा है पूरे देश में कि मुट्ठी गर्म कर, फिर चाहे कुछ भी कर। यह एक तरह से संबंधित सरकारी विभागों के लिए वेश्यावृत्ति की तरह है। सरकारे चाहे जितने वेतन आयोग बना दें इन जाहिलों के लिए, फिर भी वेतन से इत्तर व इधर-उधर से, मेज के नीचे ऊपर से और दाएं-बाएं से पैसा जरूर चाहिए, मर चाहे जितने जाएं। ऐसे में क्या बताएं कुछ विकलांग सरकारों को, जो द्वादसे के जिम्मेदारों को जेल भेजने की कटोर सजा नहीं दे पा रही हैं। दंड के कई कुमार सुमित प्रकार होते हैं, जिनमें एक प्रमुख होता है एक को मारो, यो मर जायें व तीसरा खौफ खाकर मर जाए। लोकतंत्र व मानवाधिकार समर्थकों से बिना डरे ऐसी नजीर प्रस्तुत की जानी चाहिए कि दो नंबर के कामों में लिप्त खौफ से कांपने लगे और उनके समर्थक भी। उनसे भी पूछना चाहिए कि इनव्या नाम, काम, योगदान व इस्तेमाल देश बनाने के लिए होना चाहिए या देश को गर्त में वफेलने के लिए। हर बार और हर हाथले ने उजागर किया कि सरकारी कवायद के बाद भी यात्री परिवहन नाजुक हालत में है और अनिर्वाचित भी। ओवरलोहेड ट्रकों का बसों में पुसना और स्लीपर कोच का मिनटों में आग का गोला बन जाना। यह सब सभ्य समाज पर एक बद्नुमा पच्छ है। खराच कियान्चयन, असुरक्षित वाहन और जवाबदेही के अभाव का एक खतरनाक सम्मिश्रण है व डरावनी कहानी थी, जो बराबर जानलेवा साबित हो रही है। नतीजा वही बाक के तीन पात कि सरकार हरकत में आई, परिवहन मंत्रालय ने आरटीओ को बस सुरक्षा जांच अनिवार्य करने के निर्देश दिए। शोक जताया और मृतकों को इतने लाख व घायलों को इतने हजार और मुफ्त इलाज, तत्काल राहत एवं बचाव कार्य का आदेश आदि। लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस-वे की बात करें तो इस पर रोज ही कुछ न कुछ होता रहता है, पर ईमानदारी से कहूं तो कोई कुछ भी करने की स्थिति में नहीं है कि ऐसा क्यों हो रहा है? बीते गठीने 60 मात्रियों को लेकर दिल्ली से वाराणसी जा रही बत्त उन्नाव के हसनगंज क्षेत्र में रात वी बजे 25 फीट गहरी खाई में जा गिरी। बताते हैं कि चालक को झपकी आ गई थी, बाकी तो सब पहले से ही सो रहे थे। रात के सन्नाटे को दर्जनों लोगों की चीख-पुकार ने तोड़ा। कुछ यात्री कांच तोड़कर बाहर निकले तो कई केबिन में फंस गए। दूसरी तरफ से गुजर रहे वाहन चालकों ने हादसा देखा तो कंट्रोल रूम और पुलिस को सूचना दी। यूपीडा की नाइट पेट्रोलिंग टीम व पुलिस लगभग 25 मिनट में पहुंची। दोनों टीमों ने मिलकर टॉर्च की मदद से रेस्क्यू किया। एक घंटे की मशक्कत से यात्रियों को एक-एक कर बाहर निकाला। रोड पर लाकर 21 पापों को लखनऊ के अस्पताल भेजा। अधिकांश यात्री लखनऊ, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, अंबेडकरनगर, जौनपुर व काही के थे। शेष बचे यात्रियों की पुलिस ने दूसरी बस से गंतव्य को भेज दिया। सारा सार इसी एक लाइन में छिपा है। अगर डम हादसे की दशा में दूसरी बस से यात्रियों को भेजते ही हैं तो फिर नॉर्मल कोर्स में 400-500 किमी की यात्रा के बाद क्यों नहीं भेज सकते? उसी या दूसरे ट्रांसपोर्ट की ऐसी एसी बस में क्यों नहीं शिस्ट कर सकते है, जो कि कुछ घंटे आराम कर चुकी हो? मशीनरी है, लोहा है, गर्म होता है, उसे भी ठंडा करना जरूरी होता है। इंसान की तरह एसी व वायरिंग आदि के तारों की भी एक सीमा होती है ताप को झेलने की। उन्हें भी चालक की तरह आराम वाहिए। यह बात जितनी जल्दी समझ में नीति नियंताओं, अधिकारियों व मोटर मालिकों के आ जाएगी, देश व समाज के हित में उतना ही अच्छा रहेगा। उबर, 14 अक्टूबर को जैसलमेर-जोयपुर हाईवे पर एक भयानक आग का मंजर देखने को मिला। जैसलमेर से निकलने के कुछ ही मिनटों बार 57 यात्रियों से भरी निजी बस वैयात गांव के पास आग की लपटों में घिर गई। इसमें मौके पर ही 22 लोगों की मौत हो गई वी और 16 घायल हो गए। पुलिस को शॉर्ट सर्किट से आग का शक है, लेकिन घायलों की मानें तो बस रुकने रुकने से पहले ही पुआं निकल रहा था और पलभर में ही आग ने बस को चपेट में ले लिया। दमकल के पहुंचने से पहले स्थानीय लोगों और सेना के जवानों ने आग बुझाने की कोशिश की, पर आग नहीं रुकी। सीएम भजनलाल शर्मा घटनास्थल पहुंचे थे और पीड़ितों के परिवार से मुलाकात की थी। पीएम ने भी हादसे पर दुख जताया था। राष्ट्रपति ने कहा था कि आग लगने से कई बस यात्रियों की मृत्यु अत्यंत पीड़ादायक है। उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने भी मौतों पर शोक व्यक्त किया था। 27 अक्टूबर को अहमदाचाव-वडोदरा एक्सप्रेस-वे पर एक मामूली दुर्घटना ने तब घातक मोड ले लिया, जब एक तेज रफ्तार ट्रक ने एक खड़ी लग्जरी बस और कार को टक्कर मार दी, जो पहले से ही एक छोटी टक्कर के कारण खड़ी थी। ऐसा ही कुरनूल हादसे में हुआ था कि जब तक बस चालक को दुर्घटनहास्त बाइक दिल्ली, तब तक देर हो चुकी थी। गुजरात हादसे में तीन से में तीन यात्रियों को की मौत हो गई बी और 10 अन्य पावत। पुलिस ने बताया कि ट्रक चालक तेज गति से सूरत से आ रहा था और खाड़ी बस उसे देर से दिखी। इस घटना ने भी देश के सबसे व्यस्त एक्सप्रेस-वे पर छाराव यातायात अनुशासन व सड़क सुरक्षा की कमी को उजागर किया था। तीन नवंबर को एक बजरी से लदे ट्रक ने तेलंगाना स्टेट आरटीसी बस को टक्कर मार दी, जिससे 20 लोगों की मौत हो गई। पुलिस के मुताबिक, ट्रक गलत लेन में था और बस को इतनी जोर टक्कर मारी मारी थी कि बजरी यात्रियों पर जा गिरी थी, जिसमें वे दब गए थे। दूसरी ओर, 28 अक्टूबर को जयपुर-दिल्ली हाईवे पर एक बस मजदूरों को तोड़ी गांव ले जा रही थी, तभी वह हाईटेंशन तार से टकरा गई और जोरवार विस्फोट के साथ आग का गोला बन गई। प्रत्यक्षदर्शियों ने कई पनाकों की बात कही थी। हादसे में दो लोगों की मौत हो गई और वस घायल हो गए। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने बार-बार हो रहे हाईवे की त्रासदी की निंदा की और राजस्थान के मार्यों पर चलने वाले निजी और अनुबंवित्त वाहनों का तत्काल सुरक्षा ऑडिट कराने की मांग की। गौरतलब है कि यही बात सीएम योगी आदित्यनाथ ने कही थी मोहनलालगंज हादसे के बाद, जिसमें आग लगने से पांच की जिंदा जलकर मौत हो गई तो कई घायल हो गए थे। इनमें दो बच्चे, दो महिलाएं और एक पुरुष था। यह बिहार से दिल्ली जा रही स्लीपर बस थी. जिसमें करीच 60 यात्री सवार थे। आग का गोला बनते समय सुबह पांच बजे अधिकांश तो रहे थे। हादसा आउटर रिंग रोड पर हुआ था। पात्रियों के अनुसार चलती बस में अचानक धुआं भरने लगा था, जिससे अफरा-तफरी मची ही थी कि तेज लपटें उठने लगीं। इतने में बस ड्राइवर और कंडक्टर भाग निकले, जबकि नए डीर की इन बसों के दरवाजे भी कार की तरह काफी टेक्निकल कर दिए गए हैं, जिनके बारे में ज्यादा जानकारी स्टाफ को ही होती है। ड्राइवर की सीट के पास एक्स्ट्रा सीट बनाने के कारण यात्री भाग नहीं पाए और फंस गए थे। एसीपी रजनीश वर्मा मौके पर पहुंचे व रेस्क्यू की अमान संभाली और पायलों को अस्पताल भेजा। यात्रियों का सारा सामान जल गया। दमकल पहुंचने तक बस खाक हो चुकी थी। दमकल कर्मियों ने आग पर काबू पाने के बाद पांच जले शव पुलिस की मदद से बाहर निकाले। शुरुआती जांच में पत्ता चला था कि बस का इमरजेंसी गेट नहीं खुलने के कारण पीछे बैठे लोग फंस गए थे। बस में पांच-पांच किलो के साल गैस सिलेंडर भी थे, वे अगर फट जाते तो दूर खड़े व बचे लोगों को भी खतरा हो जाता। बताते हैं कि आग इतनी भीषण थी कि लपटें एक किलोमीटर दूर से दिखाई दे रही थी। सीएम के डर के बार सरकारी कारिंदे कई दिन तक डरकत में रहे थे और बहुत जांच हो रही थी, फिर समय के साथ अन्य आदेशों की तरह यह भी गर्त में चला गया। अचानक से डाइसों की आई बाढ़ के कारण लोग सकते में आ गए तो केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय भी हरकत में आया। केंद्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने चेतावनी दी थी कि आरटीओ को नियमों का पालन न करने पर जवाबदेह ठहराया जाएगा। बस एंड कार ऑपरेटर्स कंफेडरेशन ऑफ इंडिया ने भी ऑपरेटरों से बहाने नहीं, जिम्मेदारी लेने की बात कही। उन्होंने चेतावनी दी कि लगातार लापरवाही से भारत में स्लीपर कोचों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा सकता है। मंत्रालय ने हाल की आग की घटनाओं के मद्देनजर राज्यों के आरटीओ को लग्जरी कोच बसों के लिए अनिवार्य सुरक्षा जांच सूची लागू करने का निर्देश दिया था। कुरनूल बस हादसे जांच में एक ऐसा तथ्य एजेंसियों ने उजागर किया, जिसके बारे में पूरे देश को पता है और इसकी सर्वाधिक जानकारी पुलिस व जीएसटी विभाग को है। इसके मुताबिक, हादसे में बस इसलिए और प्लास्टिक की तरह पिघल गई थी, क्योंकि उस पर 234 मोबाइल फोन से भरा कार्टन भी लदा था, जिन्हें राजस्व चोरी करके हैदराबाद से बेंगलुरू भेजा जा रहा था। आग लगने के बाद उक्त सभी फोन की बैटरी एक के बाद एक धमाके के साथ फट गई थीं, जो आग भड़कने की बड़ी वजह बने। इस पार्सल को फ्लिपकार्ट को भेजा जा रहा था। फॉरेंसिक विशेषज्ञों ने बताया कि फोन की बैट्रियों में विस्फोट ने बस में आग को और भड़का दिया था। देर से जागे राजस्व अधिकारियों की मानें तो बस में 46 लाख रुपये के 234 स्मार्टफोन लदे थे। इन फोन को हैदराबाद के कारोबारी मंगानाथ ने भेजा था, जिन्हें कस्टमर या छोटे दुकानदारों को दिया जाना था। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि फोन की बैट्रियां एक-एक करके फट रही थीं। ज्ञात तथ्य यह है कि देश में जितनी भी निजी बसें चल रही हैं, उनकी छत और डिक्की में राजस्व चोरी के इरादे से कभी-कभी तो सवारियों के भार से अधिक वजन का सामान लदा होता है और इसमें कुछ भी गुप्त नहीं है। आंध्र दम कल सेवा के डीजीपी वेंकटरमण ने बताया कि आग पहले टैंक में लीकेज के कारण लगी थी, पर मोबाइल फोन की पचासों बैट्री और बस में एसी के लिए लगी इलेक्ट्रिकल बैट्री में विस्फोट के कारण आग तेजी से फैली। गौरतलब है कि इस हादसे में 19 यात्रियों की बस में जलकर मौत हो गई थी। डीजीपी के मुताबिक, कुछ लोगों की नशेबाजी के कारण यह हादसा पेश आया। एक बाइक बस के अगले हिस्से में फंस गई थी, जो कि तेज रफ्तार होने के कारण काफी दूर तक घिसटती चली गई, जिससे बस व बाइक के फ्यूल टैंक में आग लग गई थी। बस में सवार 44 यात्रियों में से 19 की जलकर मौत हो गई थी। आग फैलते ही बस का दरवाजा जाम हो गया था, जिससे यात्री अंदर फंस गए और ज्यादातर की मौत दम घुटने व जलने से कुछ ही मिनटों में हो गई थी। घटना ने निजी स्लीपर कोचों में सुरक्षा मानकों की कमी पर सवाल फिर खड़े कर दिए। कुरनूल रेंज के डीआईजी कोया प्रवीण का दावा था कि बस में अग्निशामक यंत्र नहीं था। फॉरेंसिक विभाग ने पुष्टि की कि बाइक सवार दो व्यक्ति (शिवशंकर और एरीस्वामी) नशे में थे। दोनों ने पहले एक ढाबे पर खाना खाया था, जहां स्वामी ने शराब पी। शंकर 24 अक्टूबर की भोर दो बजे के बाद लक्ष्मीपुरम गांव से दोपहिया वाहन से स्वामी को तुग्गली गांव छोड़ने जा रहा था। कुरनूल के पुलिस अधीक्षक विक्रांत पाटिल की मानें तो एक कार शोरूम के पास 2.24 बजे पेट्रोल भराया। शंकर का लापरवाही से वाहन चलाते हुए वीडियो भी वायरल हुआ था, जिससे लगता है कि वह भी नशा पीए हुए था। कुछ देर बाद दोपहिया फिसल गया, जिससे शंकर कुरनूल जिले के चिन्ना टेकुरु गांव के पास दाहिनी ओर गिरकर डिवाइडर से टकरा गया। इतने में शंकर का नशा हिरन हो चुका था। यह सड़क के बीच से बीब उसको व बाइक को किनारे कर ही रहा थाकि तभी बस तेजी से आई और उसको कुबतते हुए कुछ दूर तक घसीटती हुई ले गई। यह देख यह पैदल ही मौके से तुग्गली के लिए भाग निकला था। डीजीपी यूपी ने राजीय कृष्ण ने एक निर्देश में सभी पुलिस कप्तानों से कहा है कि अपने जिलों में हादसों को कम करने पर काम करें, बौक स्पॉट को ठीक कराएं और यदि इसमें वे सफल होते हैं तो इसे लाइफटाइम अचीवमेंट माना जाएगा।

ढांचे से खेल : जिम्मेदारों को है पूरे खेला की खबर

नाम न छापने की शर्त पर हरदोई के एक बड़े लग्जरी बस बेड़े के मालिक ने बताया कि उत्तर प्रदेश के कानपुर, लखनऊ, अलीगढ़, मेरठ, हापुड़ और दिल्ली बस बॉडी बनाने और मोडिफाई करने के बड़े केंद्र हैं। इनमें से लखनऊ व दिल्ली इस समय नंबर एक पर चल रहे हैं। बताना जरूरी है कि कहने को तो सभी के पास जीएसटी नंबर हैं और सभी सरकार को टैक्स भी दे रहे हैं। कुछ-कुछ उसी तरह, जैसे जुएं-सट्टे के गेमिंग एप चलाने वाली कई कंपनियां देती रही हैं, पर यह भी कम अहम नहीं है कि बस मालिकों की मांग पर कई लोग खेल भी करते रहते हैं। उल्लेखनीय है कि तीन दशक पहले वाली बसों में दो दरवाजे होते थे। चढ़ने के लिए अलग व उतरने के लिए अलग, ड्राइवर के लिए अलग और आपातकालीन द्वार अलग, पर कालांतर में पता नहीं किस सिरफिरे को क्या सनक चढ़ी कि दरवाजों में ही कटौती कर दी? चढ़ने व उतरने के लिए एक ही दरवाजा करके यात्रियों को अनावश्यक कष्ट से जूझने के लिए मजबूर कर दिया गया। अब जान की कीमत पर आमदनी बढ़ाने के लिए आपातकालीन द्वार पर भी कुठाराघात कर दिया गया है, जिसके कारण चार की जगह दो ही द्वार बसों में बचे हैं। इसके आगे जिंदगी बेबस होकर रह गई है, फिर भी लाखों लोग रोज बस का सफर कर रहे हैं। नए डिजाइन के मुताबिक ड्राइवर की खिड़की से पब्लिक का कोई लेना-देना नहीं है। कई हादसों की जांच में पाया गया है कि आपातकालीन द्वार को बंद कर सोने या बैठने की सीट लगाई गई थी, जिससे लोगों को जान बचाने तक का मौका नहीं मिला और उसी में जलकर असमय ही काल के गाल में समा गए थे। इसी तरह चढ़ने वाले दरवाजे को बंद कर उसकी जगह सीट लगा दी गई हैं। पहले हर सौ-50 किमी पर सौ-50 यात्रियों में से कोई न कोई पेशाब आदि करने के लिए बस रोकने की गुहार लगाता था, जो कि अब खत्म हो गया है क्योंकि अब ट्रेन की तरह लग्जरी बसों में भी शौचालय बनाया जाने लगा है। दूसरे, दो ड्राइवर रखे जाने लगे हैं, लिहाजा रात के घटाटोप अंधेरे में एक सांस में दो से तीन सौ किमी तक बसें दौड़ाई जा रही हैं। चलती बस में ड्राइवर बदलता देख जाड़े में भी पसीना आ जाता है। यह कमोबेश वैसा ही है, जैसे एक फाइटर प्लेन में दूसरा हवा में ही तेल भर रहा हो। आमदनी में ग्रहण के कारण जो हवाई जहाज में कभी नहीं बैठ पाए हैं कभी भी, वे बस में ही हवाई जहाज का आनंद प्राप्त कर रहे हैं। हालांकि यह जोखिम महंगा पड़ता देखा गया है हाल के साल में। यह शोध का विशय है कि दोषी कौन है? आजकल की बसें कुछ-कुछ वैसी ही हैं, जैसे साबरमती रिपोर्ट फिल्म में दिखा था कि गोधरा में जलाई गई दोनों बोगी के दरवाजों को बाहर से कंटीले तार से कसकर बंद कर दिया गया था, जिसके कारण लोग जल-भुन कर मर गए थे। ऐसा ही था कुरनूल व छह माह पहले का लखनऊ बस हादसा कि आग लगने की दशा में लोगों को भागने का मौका नहीं मिला था। आंध्र दमकल के डीजीपी वेंकटरमण ने भी पुष्टि की थी कि बस के निर्माण में गड़बड़ी थी। यानी कि बॉडी निर्माता ने बस के ढांचे के निर्माण में काफी छेड़छाड़ की थी। बॉडी में जहां पर लोहे का इस्तेमाल होना चाहिए था, वहां भी अपेक्षाकृत कम भार के हल्के एल्युमिनियम का इस्तेमाल किया था ताकि बस की स्पीड बढ़ सके। बस की फ्लोर में आग लगने के बाद एल्युमिनियम सीट पिघल गई थीं। पिघली सीट से हड्डियां व राख गिर रही थी, जिससे हादसे व लापरवाही की भयावहता का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।

अधिकारियों को निर्देश व बड़े हादसे

  • आपातकालीन निकास लम्बी दूरी की बस में कम से कम चार आपातकालीन निकास होने चाहिए और यात्रियों के बाहर निकलने के लिए गलियारे कम से कम 450 मिमी चौड़े होने चाहिए।
  • अग्निशमन प्रणाली: साज-सज्जा और वायरिंग में आग प्रतिरोषी विद्युत प्रणाली का इस्तेमाल किया जाए। दो अग्निशामक यंत्र और आग का पता लगाने और बुझाने की प्रणाली होनी चाहिए।
  • सुरक्षा उपकरण: हर बर्ष के पास हथौड़े, परावर्तक टेप और आपातकालीन प्रकाश व्यवस्था का इंतजाम तुरंत किया जाए।
  • अनुमोदन : सितंबर 2025 के बाद बनने वाली सभी बड़ी और लग्जरी बसों के लिए सख्त प्रकार का अनुमोदन अनिवार्य किया गया है। पहले की स्व-प्रमाणन की खामी खत्म की जाएगी।
  • चौदह अक्टूबर को जैसलमेर-जोधपुर के बीच एक निजी बस में शॉर्ट सर्किट से आग लग गई, जिसमें 22 लोग जिंदा जल गए।
  • 24 अक्टूबर को कुरनूल में एक बाइक से टकराने के बाद स्लीपर कोच बस में आग लग गई, जिससे 20 लोग जलकर मर गए।
  • 27 अक्टूबर को अहमदाबाद-वडोदरा एक्सप्रेस-वे पर तेज रफ्तार ट्रक ने खड़ी बस और कार को टक्कर मार दी, जिसमें तीन मरे।
  • 28 अक्टूबर को जयपुर ग्रामीण में मजदूरों से भरी एक बस की हाईटेंशन लाइन के टकराने से आग लग गई और दो मारे गए। तीन नवंबर को एक बजरी से लदे ट्रक ने तेलंगाना स्टेट आरटीसी बस को टक्कर मार दी, जिससे 20 लोगों की मौत हो गई।

ऐसे कम होंगे सड़क हादसे

हाईवे व एक्सप्रेस-वे की कमियों को दूर करने के उपाय के साथ हादसों के कारण व निवारण भी बता देता हूं। हादसे की हाईवे पर और वजह होती है और एक्सप्रेस-वे पर और। एक बार स्पीड पकड़ने के बाद आगे-पीछे कम ट्रैफिक होने के कारण स्टियरिंग, क्लच, ब्रेक एवं गियर में करने के लिए कुछ होता नहीं है और जब कुछ करने को नहीं होगा, सिर्फ बैठे रहना पड़ेगा तो नींद आना स्वाभाविक है। नतीजतन हादसे हो जाते हैं। इन्हें रोकने के लिए कैमरे हर पांच किमी पर लगाए जाएं। इससे जहां आमदनी बढ़ेगी, वहीं लोग ओवर स्पीड की दशा में पहले से सचेत हो सकेंगे। आम तौर पर देखा गया है कि एक्सप्रेस-वे कैमरा देखते ही ड्राइवर कम तो कार मालिक ज्यादा सतर्क हो जाते हैं। बस चालक भी सतर्क रहना शुरू कर देंगे। अगर इसके लिए पैसे खजाने में कम हों तो हर दो के बीच एक डमी कैमरा भी लगाया जा सकता है व उसके प्रचार पर भी कुछ रुपए खर्च किए जाएं। नींद भगाने के लिए आधा सेमी ऊंची सफेद या पीली पेंट की पट्टियां हर किमी पर बनाई जाएं। इनसे गुजरते समय गाड़ी के साथ चालक के भी अस्थि पंजर हिलने से नींद भाग जाएगी। हर 10 किमी पर ट्रक ले-बाय बनाएं। एक बंदे को सौ वर्ग फीट से कम जगह किराए पर आवंटित करें, जहां केवल चाय व पानी का इंतजाम हो आम पब्लिक के लिए। खास के लिए तो पहले से ही महंगे फूड प्लाजा बने हैं कमोबेश हर जिले की सीमा में। डिजिटल दौर में आगाह करने के लिए एनएचएआई की टोइंग वैन के जरिए या स्थायी तौर पर म्यूजिक, वार्निंग या शॉवर सिस्टम का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके विपरीत हाईवे पर भारी ट्रैफिक होता है, कोई दाएं से निकलता है, कोई बाएं से निकलता है, कोई हॉर्न देता है तो कोई गाली देकर भाग जाता है तो गलत ड्राइविंग पर कहीं आप 50 लोगों को गाली देते हैं इसलिए नींद आने का सवाल कम उठता है और हादसे कम होते हैं। अगर उक्त उपायों में से कुछ भी समझ में न आए जिम्मेदार बड़े बाबू एक सपत्नीक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल गठित कर यूरोप व अमेरिका के स्टडी टूर पर भेजें, उसकी रिपोर्ट लागू करें, पर लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस-वे के एट लेन का शिगूफा वापस लेने का ऐलान कर प्रदेश पर दया करें, क्योंकि आजादी के 100वें साल तक इसकी कोई जरूरत (कम ट्रैफिक के कारण) नहीं है। सिक्स लेन से पूरे देश का काम चल रहा है। दूसरे, दूसरे प्रदेशों में भी वरिष्ठ आईएएस बैठे हैं, नजीर हाथ लगने के बाद उनके भी बेलगाम होने का डर है। हैरानी इस बात से है कि कैबिनेट ने हादसे कम होने के हवा-हवाई दावे के आधार पर 1938 करोड़ का बड़ा प्रोजेक्ट कैसे पास कर दिया? घटिया तर्कों की बानगी पर एक नजर क्यों नहीं डाली? किसी की भी बात पर इतना भरोसा करने के बजाय एक बार निजी आंखों से भी देखना जरूरी क्यों नहीं समझा? भारी वाहनों (ओवरलोडिंग का कानून लागू है) की लेन धंस गई है, जिससे होकर गुजरने पर छोटे वाहन दुर्घटनाग्रस्त हो रहे हैं। यह कोरा झूठ है। हैवी वाहन लेन फिर बनाई जाएगी, जबकि जिसका जिस लेन पर मन होता है, वहां चल रहा है। कुछ भी फिक्स नहीं है। वाहनों की गति नियंत्रित करने के लिए स्पीड गवर्नर लगेंगे, अभी लगा दो, किसने रोका है? स्वतः चालान के लिए स्पीड लेजर गन लगेंगे, सिक्स लेन पर ही तुरंत लगा दो, कोई कानूनी या संवैधानिक रोक नहीं है। शराब पीकर गाड़ी चलाने वालों के डीएल निरस्त होंगे, आज रात से शुरू करें, क्या बाधा है? ईवी के लिए चार्जिंग स्टेशन बनेंगे, जरूर बनें सिक्स लेन पर भी स्वागत है। अगले साल दूसरा किमियागर आएगा, वह भी गलत परंपरा का पालन करते हुए इसे 10 लेन करवाने लगेगा या किसी दूसरे सिक्स लेन को एट लेन करने का प्रस्ताव पास करा लेगा। रिटायरमेंट के ठीक पहले नए प्रोजेक्ट की कथा तो कुछ और ही कहानी कहती है। रोना आ रहा था कि कितने गलत हाथों में खेल रहा था मेरा प्रवेश? इसके विपरीत यदि 2000 करोड़ से दो के बजाय 4000 पिलर इसी एक्सप्रेस-वे के डिवाइडर पर बनाकर बुलेट ट्रेन चलाने की बात होती तो पूरा प्रदेश ताली बजाकर स्वागत करता। अगर यह किमियागर तेज धूप, तेज बारिश, ओलावृष्टि, थकान से बाइक सवारों को बचाने या राहत देने के लिए महज दो करोड़ से दो-दो या 10-10 किमी पर दो-दो सौ वर्ग फीट के टिन या एजबेस्टस शेड बनवा देता आगरा एक्सप्रेस-वे के किनारे और स्तनपान या अन्य समस्याओं के समाधान के लिए कुछ करवा देता तो सारे पाप धुल जाते। इसके बजाय उक्त समस्याओं को दूर करने पर दो पैसे खर्च कर दिए जाते, जिनके कारण वाकई हादसे हो रहे हैं तो ज्यादा अच्छा होता। ऐट लेन का यह प्रोजेक्ट तो बिना सिर व पैर का लगता है। जैसे-कटी सड़क या फटी सड़क या सिरकटी रोड या पैर कटा हाईवे। यह किसी कॉमेडी फिल्म के लिए अच्छा टाइटिल हो सकता है, पर प्रदेश के लिए कतई नहीं? एक-चौथाई पैसे से सर्विस लेन पूरी यहां से वहां तक बना दी जाए तो 300 किमी के लाखों लोकल लोगों व किसानों को निश्चित रूप से ज्यादा फायदा होगा। धन की कमी हो तो लाभान्वित होने वाले चार राज्यों के लोगों से चंदा जुटाकर यदि आगरा एक्सप्रेस-वे पर चढ़ने या उतरने वाले ट्रैफिक को किसान पथ, शहीद पथ या पूर्वांचल एवं कानपुर हाईवे व एक्सप्रेस-वे से चार पैसे से जोड़ दिया जाता तो चार राज्यों के करीब चार करोड़ लोगों को फायदा होता। पैसे का दुरुपयोग रोको, बचो और बचाओ। आग से न खेलो क्योंकि टैक्सपेयर कई बार पहले कह चुके हैं कि कमाए हम और खाएं और। यह सब और नहीं चलेगा। वक्त है सुधर जाओ और अफलातूनी हरकतें व तुगलकी फरमान पिता व अपने पैसे से करो बड़े बाबुओं। शैतानी खोपड़ी को अब विराम दो, अगर पब्लिक के मतलब की न रह गई हो तो पूर्ण विश्राम लो, पर भगवान के वास्ते हमको हमारे हाल पर छोड़ दो। कहीं अगर पब्लिक की खोपड़ी धूम गई तो मुश्किल होगी। हाल के साल व दशक में सूबे में ट्रेंड देखा गया है कि अपने खेतों या मनमानी जगहों से घुमाते हुए एक्सप्रेस-वे बनाने का। योजना जब पाइप लाइन में होती है, तभी फाइल सूंघने के बाद अरबों की बेनामी संपत्ति खरीद ली जाती है या अपनों को खरीदवा दी जाती है, फिर शासन की आंख में धूल झोंकते हुए मनमाने दर पर मुआवजा दिला दिया जाता है। 10-20 किमी दूर ले जाकर एक्सप्रेस-वे में मनमाने मोड़ देकर अपनों को नाजायज लाभपहुंचाया जाता है तो परायों को नुकसान। सरकार जाने के बाद 2017 में किसी ने पूछा कि इतना बड़ा और ऐतिहासिक काम करने के बाद भी सरकार क्यों गई तो मजाकिया लहजे में आधी लाइन का जवाब था कि एक्सप्रेस-वे में अपशकुन जैसा बहुत बड़ा इंजीनियरिंग फाल्ट था, बोले क्या? यही कि न बदायूं से होकर निकला और न आजमगढ़ से, सीधे कन्नौज, इटावा (सैफई-जसवंत नगर) व मैनपुरी पहुंच गया, काहे का एक्सप्रेस-वे, तो सख्त लहजे में बाकी आधी लाइन थी कि ब्यूरोक्रेसी खा गई? माना कि लूट की एक घटना नहीं हुई है एक्सप्रेस-वे पर, पर आज भी सन्नाटे और कम ट्रैफिक के कारण जेब में टोल प्लाजा भर के पैसे न होने के बावजूद यह डर हमेशा बना रहता है कि कहीं कोई सात साल पुरानी गुड़िया (फोन), 14 साल पुरानी फटफटिया और 21 साल पुरानी बुढ़िया न लूट ले। यह डर इसलिए ज्यादा महसूस होता है कि कई लुटेरे भी जेब में पैसा सोच से कम प्राप्त होने पर मारते कम हैं और घसीटते ज्यादा हैं।

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