
काल भैरव जयंती का विशेष महत्व हिंदू धर्म में है, खासकर उन भक्तों के लिए जो भय, मानसिक तनाव या कष्ट से मुक्ति की इच्छा रखते हैं। यह पर्व मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है और इसे कालाष्टमी या महाकाल भैरव जयंती भी कहा जाता है। इस दिन काल भैरव की पूजा विशेष रूप से की जाती है, जो भगवान शिव के रुद्र रूप माने जाते हैं।काल भैरव का रूप अत्यंत क्रूर और रुद्र है, वे भगवान शिव के आठ महाशक्तिशाली रूपों में से एक माने जाते हैं। उनका स्वरूप बहुत भयंकर होता है, लेकिन वे अपने भक्तों के लिए सभी प्रकार के भय, मानसिक पीड़ा और असुरक्षाओं से मुक्ति देने वाले माने जाते हैं। उनका पूजन विशेष रूप से विपत्ति, डर और भय से छुटकारा पाने के लिए किया जाता है। काल भैरव को रात्रि के स्वामी के रूप में भी पूजा जाता है। उन्हें खासकर न्याय, नियंत्रण, और संतुलन के देवता के रूप में पूजा जाता है। साथ ही, काल भैरव को सभी प्रकार की नकारात्मक शक्तियों और बुरी आत्माओं से बचाने वाला माना जाता है।
काल भैरव जयंती का व्रत करने से व्यक्ति मानसिक और भौतिक कष्टों से मुक्त हो सकता है। यह व्रत नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षा प्रदान करता है और जीवन में शांति लाता है। इस दिन पूजा करने से किसी भी प्रकार के भूत-प्रेत या नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति मिलती है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है यह पूजा खासकर उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो किसी प्रकार की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहते हैं, या जिन्हें रात के समय डर लगता है। चूंकि काल भैरव भगवान शिव के अवतार हैं, इस व्रत को करने से भगवान शिव की कृपा मिलती है, जिससे जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं।
व्रत की शुरुआत से पहले सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और शरीर को शुद्ध करें। फिर पूजा स्थल को स्वच्छ करें। व्रत का संकल्प लें और प्रार्थना करें कि आप काल भैरव से सभी प्रकार के भय, संकट और दुखों से मुक्ति चाहते हैं। संकल्प के बाद पूजा विधि शुरू करें। पूजा स्थल पर काल भैरव की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित करें। यदि प्रतिमा न हो तो सिर्फ उनके मंत्र का जाप भी कर सकते हैं। भगवान की पूजा करते वक्त दीपक और धूप लगाएं। इस दिन खासकर काले तिल, मलयालम चंदन या काले फूल चढ़ाने का महत्व है।पूजा करते समय विशेष रूप से “ॐ कालभैरवाय नमः” या “ॐ ह्लीं कालभैरवाय नमः” मंत्र का जाप करें। इन मंत्रों का जाप करने से भगवान काल भैरव की कृपा प्राप्त होती है।पूजा के बाद भगवान को सिंघाड़ा, सुपारी, तुलसी के पत्ते और काले तिल का भोग अर्पित करें। फिर उन भोगों को प्रसाद के रूप में वितरित करें। यह व्रत विशेष रूप से रात्रि जागरण के साथ किया जाता है। व्रत रखने वाले भक्त रात्रि को जागकर भजन-कीर्तन करते हैं और काल भैरव के मंत्रों का उच्चारण करते हैं। पूजा के बाद प्रसाद का वितरण करना चाहिए और इस दिन गरीबों को काले तिल और खाद्य सामग्री दान करना शुभ माना जाता है। व्रत के दौरान अधिक से अधिक संयम और ध्यान बनाए रखें। खाने में काले तिल, चने, मूली और हल्दी का सेवन करना विशेष रूप से लाभकारी होता है।
वैदिक पंचांग के अनुसार, मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की शुरुआत 22 नवंबर को संध्याकाल 06 बजकर 07 मिनट पर शुरू होगी। वहीं, अष्टमी तिथि का समापन 23 नवंबर को संध्याकाल 07 बजकर 56 मिनट पर होगा। अत: 22 नवंबर को काल भैरव जयंती मनाई जाएगी। इस शुभ अवसर पर काल भैरव देव की पूजा की जाएगी।
काल भैरव को सरसों का तेल अत्यंत प्रिय है। जयंती के दिन उनके मंदिर में या घर में उनकी मूर्ति या चित्र के सामने सरसों के तेल का दीपक जलाएं। इस दीपक को रातभर जलते रहने दें। यह उपाय विशेष रूप से शत्रुओं से रक्षा करने, धन हानि रोकने और परिवार में सुख-शांति बनाए रखने में सहायक होता है। पंडितों के अनुसार भगवान काल भैरव की सवारी कुत्ता है। जयंती के दिन काले कुत्तों को मीठा रोटी, दूध, या पेडे़ खिलाना शुभ माना जाता है। इससे न केवल काल भैरव की कृपा प्राप्त होती है, बल्कि जीवन में आने वाले अनहोनी घटनाओं से बचाव भी होता है।
पंडितों के अनुसार वैसे तो भगवान कालभैरव को किसी भी चीज का भोग लगा सकते हैं, लेकिन भगवान काल भैरव को कुछ चीजें अत्यंत प्रिय हैं जिन्हें भोग स्वरुप पाकर भैरव अत्यंत प्रसन्न होते हैं एवं व्यक्ति के समस्त संकट, मृत्युभय एवं आर्थिक संकट आदि सभी खत्म कर देते हैं। काल भैरव जयंती या कालाष्टमी का व्रत भगवान शिव के रुद्र रूप काल भैरव की पूजा का पर्व है। इस दिन विशेष रूप से भय और मानसिक परेशानियों से मुक्ति पाने के लिए काल भैरव की पूजा की जाती है। यह पूजा घर में सकारात्मक ऊर्जा और शांति लाती है। यदि आप इस दिन पूजा विधि को सही से पालन करें तो आपके जीवन में आने वाली परेशानियों और कष्टों का निवारण हो सकता है।